अनशन से अंग्रेजों को दहलाने वाला युवा क्रांतिकारी!

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बहुत कम ऐसे लोग होते हैं जो देशहित के लिए अपनी जान तक दे देते हैं। उन्हीं में से एक थे जतीन्द्रनाथ दास जिन्होंने देश की आजादी के लिए जेल में अपने प्राण त्याग दिए और शहादत पाई। संगी-साथी इन्हें प्यार से ‘जतिन दा’ कहा करते थे। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने जो बम केन्द्रीय असेम्बली में फेंके थे, वे इन्हीं के द्वारा बनाये गए थे। जेल में क्रान्तिकारियों के साथ राजबन्दियों के समान व्यवहार न होने के कारण क्रान्तिकारियों ने 13 जुलाई, 1929 से अनशन आरंभ कर दिया। जतीन्द्रनाथ भी इसमें सम्मिलित हुए। अनशन के 63वें दिन जेल में ही इनका देहान्त हो गया। जतीन्द्रनाथ दास का जन्म 27 अक्टूबर, 1904 ई. को कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता), ब्रिटिश भारत में एक साधारण बंगाली परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम बंकिम बिहारी दास और माता का नाम सुहासिनी देवी था। जतीन्द्र नौ वर्ष के थे, तभी उनकी माता का स्वर्गवास हो गया।
जब जतीन्द्रनाथ अपनी आगे की शिक्षा पूर्ण कर रहे थे, तभी महात्मा गांधी ने ‘असहयोग आन्दोलन’ प्रारम्भ किया। जतीन्द्र भी इस आन्दोलन में कूद पड़े। लेकिन जब चौरी-चौरा की घटना के बाद गांधीजी ने आन्दोलन वापस ले लिया तो निराश जतीन्द्रनाथ फिर कॉलेज में भर्ती हो गए। कॉलेज का यह दौर जतीन्द्र के जीवन में निर्णायक सिद्ध हुआ। 1928 की ‘कोलकाता कांग्रेस’ में वे ‘कांग्रेस सेवादल’ में नेताजी सुभाषचंद्र बोस के सहायक थे। वहीं उनकी भगत सिंह से भेंट हुई और उनके अनुरोध पर बम बनाने के लिए आगरा आए। 14 जून, 1929 को जतीन्द्र गिरफ्तार कर लिए गए और उन पर ‘लाहौर षड़यंत्र केस’ में मुकदमा चला। जेल में क्रान्तिकारियों के साथ राजबन्दियों के समान व्यवहार न होने के कारण क्रान्तिकारियों ने 13 जुलाई, 1929 से अनशन आरम्भ कर दिया। जतीन्द्र भी इसमें सम्मिलित हुए। अनशन के 63वें दिन 13 सितम्बर, 1929 को जतीन्द्रनाथ दास का देहान्त हो गया। जतीन्द्र के भाई किरण चंद्रदास ट्रेन से उनके शव को कोलकाता ले गए। सभी स्टेशनों पर लोगों ने इस शहीद को श्रद्धांजलि अर्पित की। कोलकाता में शवदाह के समय लाखों की भीड़ एकत्र थी। उनकी इस शानदार अहिंसात्मक शहादत का उल्लेख पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में भी किया है।

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