द्रोण नगरी से वापस कृष्ण नगरी को रवाना हुए कर्ण-अर्जुन, साथ में हैदर

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मालिक ने तीनों को हजार रुपए दिए और कह दिया घर जाओ

गुरुग्राम(संजय मेहरा / सच कहूँ )। वे कृष्ण नगरी मथुरा से द्रोण नगरी गुरुग्राम में कैरियर बनाने आए थे। काम तो अभी उनका खाना बनाने का था, लेकिन काम को गति मिलने से पहले ही कोरोना वायरस ने ब्रेक लगा दिए। जिसके मालिक के पास वे काम कर रहे थे, उसने भी पनाह देने से इंकार कर दिया और एक हजार रुपए थमाकर कह दिया कि घर जाओ। यह कहानी नहीं, बल्कि हकीकत है उन तीन युवाओं की, जो करीब एक महीने पहले ही कई तरह के सपने बुनकर मथुरा से गुरुग्राम में आकर आए थे। यहां गगनचुम्बी इमारतें, दिन-रात दौड़ते-भागते लोग और यहां की चकाचौंध को उन्होंने अभी ठीक से देखा भी नहीं था कि कोरोना वायरस उनके लिए अभिशाप बनकर आ गया।

अभी काम में निपुण ही हुए थे और आन पड़ी विपदा

यहां एमजी (महरौली-गुरुग्राम) रोड से सिकन्दरपुर मेट्रो स्टेशन के पास जब हमें ये तीनों युवा मुंह पर रुमाल बांधे और पीठ पर बैग लटकाए जा रहे थे। जब उनसे ऐसे लॉकडाउन में सड़क पर पैदल ही जाने कारण पूछा तो उनकी दर्द भरी बातों ने हमें भी विचलित कर दिया। क्योंकि अपनी कई परेशानियां उन्होंने सांझा की। उनके नाम पूछने पर पता चला कि इनके नाम कर्ण, अर्जुन और हैदर थे। यानी दो हिन्दू और एक मुस्लिम। हिन्दू-मुस्लिम के भेद को नहीं मानते तीनों जिस देश में जाति-धर्म के लिए कत्लेआम हो जाते हैं, उस देश में इन तीनों युवाओं की जोड़ी एक मिसाल भी कही जा सकती है।

तीनों ने हिन्दू-मुस्लिम के भेद को मिटा रखा था। वे सिर्फ दोस्ती का हाथ थामे किसी तरह से अब इस सपनों के शहर से निकलकर अपनी नगरी में पहुंचना चाहते थे। इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि जिस नगरी में गुरू द्रोणाचार्य ने अर्जुन जैसे योद्धाओं को महाभारत काल में धनुष बाण थमाकर उन्हें धर्नुधारी बनाया, आज उन्हीं गुरू द्रोणाचार्य की नगरी से ये कर्ण, अर्जुन खाली हाथ जा रहे थे। उनके साथ हैदर भी।

चलते-चलते दर्द किया बयां

खास बात यह है कि जब उनसे हमने बात करने की शुरूआत की तो वे सिर्फ आधी मिनट ही ठहरे। उसके बाद चल दिए। क्योंकि वे ठहर कर अपना समय बर्बाद ना करके जाने की जल्दी में थे। उनके साथ करीब एक किलोमीटर तक पैदल चलते-चलते जब हमने उन्हें कुरेदा तो वे एकाएक भावुक हो गए। वे बोले बहुत कुछ करने के लिए आए थे, पर कुछ भी नहीं कर पाए। अब वे घर पहुंचना चाहते हैं। जब चल पड़े हैं तो दो दिन में मथुरा पहुंच ही जाएंगे। गुरुग्राम से मथुरा की सड़क मार्ग से दूरी करीब 160 किलोमीटर है।

यहां बहुत हैं ऐसे कर्ण, अर्जुन और हैदर

बेशक हम लाख बार कहें कि लॉकडाउन से किसी को कोई परेशानी नहीं होगी। हकीकत तो यही है कि परेशानी हो रही है। सुबह से लेकर शाम तक आपको गुरुग्राम से बाहर की ओर निकलने वाली सड़कों पर अनेक युवा अपनी पीठ पर बैग लटकाए नजर आ जाएंगे। उनमें बहुत से कर्ण, अर्जुन और हैदर होंगे, जो कि मजबूरी में अपने घर की ओर रवानगी करते हैं। अब चाहे कितनी भी तकलीफें आएं, यह हमारे देश की सेहत का सवाल है। हमें इस तरह की कड़वी दवा लेनी होगी।

 

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