राष्ट्रीय कलाकारों की दुर्दशा क्यों

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हमारे देश में यह कहावत बन गई है कि जीवित व्यक्ति को कोई पूछता नहीं लेकिन मरने के बाद वाहवाही जरूर होती है। विशेष रूप से कला और साहित्य के मामले में कुछ ज्यादा ही दुर्दशा है। वरिष्ठ लेखकों व गायकों, जिन्होंने देश की संस्कृति की सेवा की वे अपने परिवारों के लिए रोजी-रोटी का जुगाड़ तक नहीं कर सके। कई तो इलाज के अभाव में अपने प्राण त्याग गए। ताजा मामला ईदू शरीफ का है जिन्होंने पारंपरिक गायकी को अपना जीवन समर्पित किया और प्रसिद्ध गायकों की भांति ईदू को सरकारों ने खूब पुरुस्कार व सम्मान भी दिए, लेकिन अपेक्षित आर्थिक मदद व रोजगार नहीं दिया गया ताकि वे अपने कला के शौंक व परिवार की जिम्मेवारी को बराबर चला सकें।

उन्हें भारतीय-संगीत व नाटक अकादमी के राष्ट्रीय पुरुस्कार से भी सम्मानित किया गया है लेकिन उनके अपने राज्य ने ही उनकी सुध नहीं ली। ईदू की गायकी का जादू ऐसा था कि मरहूम प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने डेढ़ घंटे तक उसकी गायकी का आनंद लिया था। यूं भी गायकों/लेखकों को भी जुनून है कि उन्होंने कला की विरासत को संभालने के लिए अपनी, आवश्यकताओं की भी परवाह नहीं की। यह भी बात नहीं कि देश में कला की संभाल के लिए कोई मार्गदर्शक इतिहास नहीं है। प्राचीन से लेकर मध्यकाल तक कलाकारों/साहित्यकारों को समय के शासकों द्वारा जागीरें देकर सम्मान देने की परंपरा रही है तब पुरुस्कार कम व आवश्यकता की वस्तु जैसे पैसे व जायदाद को अधिक महत्व दिया जाता था। आज पुरुस्कार के नाम तो बड़े हो गए हैं और सम्मान भी सरकारों के मंत्री देते हैं, लेकिन सुखद जीवन व्यत्तीत के लिए अपेक्षित मदद आवश्यकता अनुसार नहीं दी जाती। कई बार तो पुरुस्कार हर साल देने की बजाय 4-5 वर्षों के बाद ही इकठ्ठे दिए जाते हैं।

सरकारों के पास पुरुस्कार देने के लिए 2 घंटों का समय नहीं होता दूसरी तरफ नेताओं के 10-20 मिनटों के समारोह पर करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं। देश की विरासत को बचाने के लिए राजनीतिक पार्टियां कई मोर्चों पर अप्रत्यक्ष लड़ाई तो लड़ रही हैं लेकिन विरासत को अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने वाले सेवकों का अपमान हो रहा है। केंद्र व राज्य सरकारों को मिलकर कला क्षेत्र के लिए ठोस नीति तैयार करनी चाहिए जिसके अंतर्गत कलाकार को वेतन व बुढापा पैंशन व अन्य सुविधाएं मुहैया करवाई जाएं।

 

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