मायावती का क्यों उमड़ा भाजपा प्रेम ?

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Why Mayawatis BJP love rose
मायावती हमेशा राजनीतिक अभिशाप के घेरे में रहती हैं जिससे निकलने की वह पूरी कोशिश तो करती है पर निकल नहीं पाती हैं। पहला राजनीतिक अभिशाप केन्द्रीय सरकार के समर्थन में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रहना और दूसरा अभिशाप मायावती के विधायकों-सांसदों का टूटना, विरोध कर दूसरी राजनीतिक पार्टियों के साथ चला जाना है। ये दोनों अभिशापों के काट के लिए मायावती कभी-कभी आश्चर्यजनक ढंग राजनीतिक पैंतरेबाजी भी दिखाती है।
राजनीतिक पैंतरेबाजी के कारण उन्हें भारतीय राजनीति में सर्वाधिक अविश्वसनीय राजनीतिज्ञ माना गया है। फिर भी मायावती की राजनीतिक हैसियत बनी रहती है, कभी वह महत्वहीन की श्रेणी में नहीं होती है। इसका कारण क्या है? इसका कारण दलित अस्मिता का प्रहरी होना है। निश्चित तौर पर मायावती दलित राजनीति की सर्वश्रेष्ठ और हस्तक्षेप कारी प्रहरी है। उत्तर प्रदेश जैसे देश के बड़े राज्य पर वह स्वयं के बल पर कभी अपनी सरकार बनाने में वह कामयाब हो चुकी हैं, करिश्मा कर चुकी है। कभी भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी भी उत्तर प्रदेश में मायावती के साथ गठबंधन कर चुकी है।
अविश्वसनीय हो जाना, बार-बार निष्ठांए बदल देना एक नुकसानकुन राजनीतिक प्रक्रियाएं हैं जिस पर चलने वाली राजनीतिक पार्टियां और राजनेता लंबे समय तक अपने आप को भारतीय राजनीति में हस्तक्षेपकारी भूमिकाओं में असफल ही साबित होते हैं। जब तक काशी राम की छत्रछाया थी तब तक दलित संवर्ग पूरी तरह आंख मूंदकर बसपा पर विश्वास करते थे, बसपा के समर्थन में उफान उत्पन्न करते थे, राष्ट्रीय राजनीति में बसपा के समर्थक अपनी उपियोगिता और भूमिका में चर्चित रहते थे। काशी राम की छत्रछाया उठने के बाद मायावती के सामने बसपा को भारतीय राजनीति में हस्तक्षेपकारी भूमिका निभाने में कामयाबी नहीं मिली है। बसपा का जनाधार धीरे-धीरे घट रहा है, बसपा की उफान की राजनीति भी लगभग दम तोड़ चुकी है।
मायावती का भाजपा प्रेम क्यों जागा? इस पर विचार करेंगे तो पायेंगे कि यह तो मायावती की राजनीतिक चरित्र में शामिल है। वह केन्द्रीय सत्ता के साथ कभी प्रत्यक्ष तो कभी अप्रत्यक्ष तौर साथ रहती है। मायावती कभी भी केन्द्रीय सरकार के विरोध में रह ही नहीं सकती है। उदाहरण भी देख लीजिये। कांग्रेस के दस साल की सरकार का वह बाहर से अप्रत्यक्ष तौर पर समर्थन कर रही थी। कांग्रेस के पास पूर्ण बहुमत भी नहीं था फिर भी कांग्रेस ने बसपा से समर्थन भी कभी नहीं मांगा। फिर मायावती समर्थन में खड़ी रही। संसद में बसपा कभी जरूरत के अनुसार बायकॉट कर देती थी तो कभी जरूरत के अनुसार संसद के अन्दर कांग्रेस के समर्थन में बसपा खडी हो जाती थी।
ऐसा इसलिए करती थी कि उन पर कांग्रेस सरकार की तलवार हमेशा लटकती रहती थी? अब आप कहेंगे कि कैसी तलवार? मायावती के भ्रष्टचार और आय से अधिक संपति रखने का हथकंडा कांग्रेस पकड़ कर रखती थी। जब-जब मायावती कांग्रेस के खिलाफ जाने की कोशिश करती तब तब कांग्रेस भ्रष्टचार और आय से अधिक संपत्ति रखने का हथकंडा चला देती थी, फिर मायावती कांग्रेस के पक्ष में मिमियाती रहती थी। नरेन्द्र मोदी सरकार के समय में मायावती के भाई के घर आयकर का छापा पड़ा था। छापे में जो कुछ बरामद हुआ और सामने आया उससे देखकर लोग आश्चर्यचकित थे। मायावती के भाई का कोई बड़ा व्यापार नहीं था, उसकी कोई फैक्टरी नहीं थी, सोना उगलने वाला कोई खान नहीं था फिर भी उसके यहां से चार सौ करोड़ से अधिक की संपत्ति पायी गयी थी। अगर इस पर आयकर विभाग की वीरता होती और इसके घेरे में मायावती को लिया जाता तो फिर शशिकला की तरह मायावती भी जेल की चक्की पिसती रहती और फिर मायावती की राजनीति पूरी तरह से समाप्त हो जाती।
भाजपा प्रेम से मायावती को क्या मिलेगा? शायद मायावती को कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है। केन्द्र में भाजपा को पूर्ण बहुमत है, उत्तर प्रदेश में भी भाजपा को पूर्ण बहुमत है। इसलिए भाजपा को काई खास लाभ होने वाला नहीं है। रही बात 2022 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव की तो उसमें भी भाजपा को कोई खास लाभ होने वाला नहीं है। भाजपा यह जानती है कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी अलग-अगल लड़ती है तो फिर उसका लाभ भाजपा को ही मिलेगा। मायावती जितना भी अखिलेश यादव और कांग्रेस के खिलाफ बोलेंगी उतना ही भाजपा को लाभ होगा। भाजपा को मुस्लिम वोटों के एकीकरण से परेशानी होती है।
समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी अलग-अलग लडेÞगी तो फिर मुस्लिम वोटों का विभाजन होगा। मुस्लिम वोट तो वहां जरूर बंटेगा जहां पर मुस्लिम प्रत्याशी टकरायेंगे या फिर सामने होंगे। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बसपा मुस्लिम वोटों को अपने पाले में डालती रही है। इसलिए मायावती से अलग रहना ही भाजपा के लिए फायदेमंद हैं। इस समीकरण पर मायावती का भाजपा प्रेम घाटे का सौदा हो सकता है। क्षणे रूष्टा, क्षणे तुष्टा की राजनीति से कोई विश्वसनीयता नहीं बनती है। मायावती को इससे हानि होती है, उनकी राजनीति विश्वसनीयता की सहचर नहीं होती है बल्कि विश्वासघात की श्रेणी में खड़ी हो जाती है।
मायावती को अब राजनीति के संपूर्ण पक्ष को आत्मसात करना चाहिए। सिर्फ दलित उफान और मुस्लिम तुष्टिकरण से सरकार बनाने की शक्ति हासिल नहीं हो सकती है। यदि ऐसा होता तो मायावती निश्चित तौर पर हमेशा सरकार में बनी रहती। ऐसा माना जा रहा है कि दलितों का भी अब मायावती से मोह भंग हो रहा है। दलित वर्ग पर भाजपा का वर्चस्व बढ़ रहा है। इसलिए मायावती को विश्वसनीय बनने की जरूरत है।

 

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