अंग्रेजी की गुलामी से कब मिलेगी आजादी?

When will the freedom of English get freedom?

त्रिभाषा फॉमूर्ले से केन्द्रीय सरकार पीछे हट गई। कारण सर्वविदित है। दक्षिण के राज्यों में अति विरोध के स्वर सामने आये, कहीं तमिल तो कहीं कन्नड़ पर हिन्दी थोपने के आरोप लगे, आरोप लगाने वाले वही राजनीतिज्ञ थे, वही समूह थे जो अंग्रेजी की गुलामी मानसिकता के सहचर रहे हैं, अंग्रेजी की अनिवार्यता और सर्वश्रेष्ठता कायम करने के गुनाहगार रहे हैं, सिर्फ इतना ही नही बल्कि किसी न किसी प्रकार से तमिल और कन्नड जैसी अन्य भारतीय भाषाओं के विकास और अस्तित्व के भी दुश्मन रहे है। संयुक्त राष्टसंघ कोई एक नहीं बल्कि छह भाषाओं में संचालित होता है, इसी तरह यूरोपीय यूनियन तीन भाषाओं में संचालित होती है, स्वीटजरलैंड में चार भाषाएं एक साथ राज करती है, कनाडा जैसे देश दो भाषाओं में संचालित होता है तो फिर भारत त्रिभाषा फॉमूंले या फिर भारतीय भाषाओं में संचालित क्यों नहीं हो सकता है, जब तुर्की का आधुनिक निमार्ता मोहम्मद कमाला पासा रातोरात अपनी संस्कृति निष्ट भाषा को लागू कर गुलामी की प्रतीक अरबी भाषा और अरबी मजहबी कट्टरपंथी संस्कृति से छुटकारा पा सकता है तो फिर भारत गुलामी की प्रतीक अंग्रेजी भाषा से छुटकारा क्यों नहीं पा सकता है? पर भारतीय राजनीति में कभी भी संस्कृति निष्ट वीरता सामने आती नहीं फिर गुलामी की प्रतीक अंग्रेजी की मानसिकताएं कैसे समाप्त होंगी?

हालांकि केन्द्रीय सरकार के त्रिभाषा फॉमूर्ले से भी अंग्रेजी की अनिवार्यता व सर्वश्रेष्ठता पर कोई आंच नहीं आने वाली थी, इस त्रिभाषा फॉमूर्ले में भी अंग्रेजी के सामने भारतीय भाषाओं की सर्वश्रेष्ठता-अनिवार्यता सुनिश्चित होने वाली नहीं थी। क्योंकि यह फॉमूर्ला अंग्रेजी मानसिकता को दूर करने के लिए नहीं थी। यह सही है कि इस फॉमूर्ले में सिर्फ हिन्दी ही नहीं बल्कि अन्य भारतीय भाषाओ के विकास व संरक्षण की बात जरूर थी। सबसे पहले तो यह जानना चाहिए कि त्रिभाषा फॉमूर्ले है क्या और इस फॉमूर्ले के विरोध करने वाले कौन हैं और विरोध करने वालों की कौन सी मानसिकताएं काम करती हैं? त्रिभाषा फॉमूर्ले के तहत स्कूली छात्रों को तीन भाषाओं में शिक्षा दी जानी चाहिए, इनमें हिन्दी, अंग्रेजी और एक आधुनिक भाषा। आधुनिक भारतीय भाषाओं में बांग्ला, तमिल, तेलूगू, कन्नड, असमिया, मराठी, पंजाबी आदि भाषाएं है। गैर हिन्दी भाषी राज्यों में मातृभाषा के साथ ही साथ हिन्दी और अंग्रेजी पढायी जाने की व्यवस्था थी। अगर गैर हिन्दी राज्यों में हिन्दी और हिन्दी राज्यों में बांग्ला, तमिल, तेलूगू, कन्नड, असमिया, मराठी और पंजाबी आदि भाषाएं बढती है तो इसमें बुराई क्या है, विरोध का औचित्य क्या है?

शाजिशन अंग्रेजी की गुलामी मानसिकता देश के उपर थोपी गयी थी, अंग्रेजी की गुलामी मानसिकताएं थोपने वालों का तर्क था कि अंग्रेजी ही ज्ञान-विज्ञान की भाषा है, इसलिए इनकी अनिवार्यता और सर्वश्रेष्ठता सुनिश्चित होनी चाहिए। यह तर्क सिर्फ और सिर्फ झूठ पर आधारित था, यह तर्क सिर्फ और सिर्फ गुलामी मानसिकता की उपज थी, यह तर्क उन अंग्रेजी शासकों की साजिश थी जिन्होने देश छोडने के बाद भी अपने मोहरे छोड गये थे। लार्ड मैकेले की शिक्षा नीति भारतीयों को अंग्रेज बनाने की थी। आजादी के समय अंग्रेजी कितने लोगों की मातृभाषा थी? गिने-चुने लोगों की ही अंग्रेजी मातृभाषा थी। पर अंग्रेजी बोलने वाले नाम मात्र के लोग लार्ड मैकाले कि शिक्षा नीति और अंग्रेजों का न केवल पिछलग्गू थे बल्कि करोडों-करोड भारतीय पर शासन करते थे। आज भी अंग्रेजी नाम मात्र लोगों की ही भाषा है, वह भी राजकाज, शिक्षा और रोजगार और न्याय की भाषा होने के कारण। कुछ नाम मात्र लोगों की भाषा अंग्रेजी देश की भाषा बन पायी है। फिर भी देश के 125 करोड लोगों पर अंग्रेजी राज करती है। यह शर्म की बात मानी ही जानी चाहिए?

संस्कृत को आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर सबसे सटीक भाषा माना गया है। जब संस्कृत हमारी प्राचीन और संस्कृति-सभ्यतानिष्ट भाषा रही है तो फिर देश की भाषा संस्कृत ही होनी चाहिए थी। पर संस्कृत के विकास और संरक्षण की जगह संस्कृत भाषा को ही समाप्त करने के लिए राजनीतिक अभियान चले हैं। आज तो संस्कृत की बात करना सांप्रदायिक मान लिया जाता है, जबकि अंग्रेजी और अन्य विखंडनयुक्त भाषाओं की बात करना प्रगतिशील माना जाता है। दुर्भाग्य यह रहा कि आजादी मिलने के बावजूद भी देश की संस्कृति आधारित और मातृ आधारित भाषा की अनिवार्यता और सर्वश्रेष्ठता सुनिश्चत नहीं की गयी, इसकी जगह अंग्रेजी को राजकाज की भाषा बना दिया गया और भारतीय भाषाओं को मझदार में छोड दिया गया।

जबकि हर देश में मातृभाषा ही सर्वश्रेष्ठ होती है, मातृभाषा ही राजकाज की भाषा होती है, मातृभाषा ही रोजगार की भाषा होती है। जब मातृभाषा राजकाज और रोजगार दायनी होगी तब मातृभाषा का विकास और उन्नति स्वयं होती है। दुनिया की भाषाएं इसके उदाहरण के तौर पर हमारे सामने हैं। मातृभाषा का सबसे बडेÞ पैरोकार महात्मा गांधी थे। अंग्रेजी शासन के दौरान कह दिया था कि ब्रिटेन के अंग्रेजी शासन को कह दो कि गांधी अंग्रेजी नहीं जानता। कौन नहीं जानता कि गांधी अंग्रेजी जानते थे, ब्रिटेन में गांधी ने अंग्रेजी माध्यम से लॉ कि शिक्षा हासिल की थी, ब्रिटेन से दक्षिण अफ्रीका जाकर अंग्रेजी में ही रंगभेदी सरकार की नीव हिलायी थी। गांधी जी की मातृभाषा हिन्दी नहीं थी, गांधी जी की मातृभाषा गुजराती थी। अंग्रेज को हटाने के लिए अंग्रेजी आधारित आंदोलन की उम्मीद नहीं थी। अंग्रेजी को आधार बना कर अंग्रेजों की गुलामी मानसिकता से आजादी नहीं मिल सकती थी। इसीलिए गांधी जी ने हिन्दी को प्राथमिकता दी थी।

इस तर्क में भी कोई दम नहीं है कि अंग्रेजी के बिना भारत का काम नहीं चलेगा। फ्रांस, जर्मनी, रूस, इटली, स्वीटजरलैंड, स्वीडन आदि दर्जनों देश हैं जहां पर अंग्रेजी का वर्चस्व नहीं है, ये देश अपनी ही मातृभाषा में संचालित होते हैं। फिर ये देश क्या दुनिया में अपनी धाक कामय करने में पीछे हैं? अंग्रेजी अधिकतम ब्रिटेन और अमेरिका में ही आर्कर्षित करती है। भारत में भी अंग्रेजी का जो वर्चस्व है उसके पीछे शासन, न्याय, शिक्षा और रोजगार में अंग्रेजी की अनिवार्यता ही कारण है। अगर भारतीय भाषाओं में शासन, न्याय, रोजगार और शिक्षा की व्यवस्था हो जाये तो फिर अंग्रेजी का वर्चस्व रहेगा ही नहीं। जिस तरह तुर्की में मोहम्मद कमाल पासा ने गुलामी की प्रतीक अरबी भाषा की जगह तुर्की की संस्कृति और सभ्यता से जुड़ी भाषा का विकास कर लागू किया था उसी तरह भारत में भी विदेशी मानसिकता की प्रतीक अंग्रेजी को हटा कर भारतीय भाषाओं में देश का शासन, न्याय, रोजगार और शिक्षा दिया जाना चाहिए। अंग्रेजी की गुलामी के खिलाफ देश में जनज्वार की जरूरत है तभी हमें अंग्रेजी की गुलामी से आजादी मिलेगी।
-विष्णुगुप्त

 

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