मतदान लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव है

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मतदान न केवल लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव है बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था के लिए भी अनिवार्य है। जब कोई सरकार जनहित के कार्य नहीं करती, नागरिकों को समस्याओं का सामना करना पड़ता है, शासन तंत्र भ्रष्ट हो जाता है तो जनता चुनाव का इंतजार करती है वहीं एक ऐसा अवसर होता है जब जनता के हाथ में भ्रष्टाचारियों की नकेल होती है। अगर जनता इस अवसर पर सदुपयोग करे तभी शासन की बागडोर सुरक्षित हाथों में सौंपी जा सकती है।

लेकिन 100 प्रतिशत वोटर मतदान की प्रक्रिया में भाग ही नहीं लेते। 2009 में हुए हरियाणा विधानसभा चुनावों में 72.29 प्रतिशत मतदाताओं ने मतदान प्रक्रिया में हिस्सा लिया वर्ष 2014 के विधानसभा चुनावों में 76.14 प्रतिशत मतदान हुआ। लोकसभा चुनावों में यह आंकड़ा और भी कम हो जाता है। लगभग एक चौथाई मतदाता इस चुनावी पर्व के भागीदार बनते ही नहीं जोकि चिंताजनक बात है। गली-मोहल्ले में बैठकर चुने हुए प्रतिनिधि में कमियां निकालना और मतदान के दिन मतदान न करना क्या यह तर्कसंगत है? कुछ लोग यह सोचकर मतदान नहीं करते कि हमारे क्षेत्र के उम्मीदवारों में कोई भी चुने जाने के काबिल ही नहीं तो उनके लिए अब नोटा का विकल्प है। अगर 100 प्रतिशत मतदान होने लग जाए तो हम जीते हुए प्रतिनिधियों की सोच भी बदल सकते हैं उन्हें सोचने पर मजबूर कर सकते हैं कि लोग उदासीन नहीं है।

आने वाले चुनावों में फिर उन्हीं मतदाताओं का सामना करना पड़ेगा। असल में कम मतदान भी भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है। भ्रष्टाचार जो हमारे देश व समाज को खोखला कर रहा है और देश में चुनावी भ्रष्टाचार एवं अपराध द्रौपदी के चीर की भांति बढ़ रहा है। उसके प्रतिकार के स्वर एवं प्रक्रिया जितनी व्यापक होनी चाहिए, उसका दिखाई न देना लोकतंत्र की सुदृढ़ता को कमजोर करने का द्योतक है। बुराई और विकृति को देखकर आंख मूंदना या कानों में अंगुलियां डालना विडम्बनापूर्ण है। इसके विरोध में व्यापक अहिंसक जनचेतना जगाने की अपेक्षा है। आज चुनावी भ्रष्टाचार का रावण लोकतंत्र की सीता का अपहरण करके ले जा रहा है। सब उसे देख रहे हैं पर कोई भी जटायु आगे आकर उसका प्रतिरोध करने की स्थिति में नहीं है।

भ्रष्टाचार के प्रति जनता एवं राजनीतिक दलों का यह मौन, यह उपेक्षाभाव उसे बढ़ाएगा नहीं तो और क्या करेगा? देश की ऐसी नाजुक स्थिति में व्यक्ति-व्यक्ति की जटायुवृत्ति को जगाया जा सके और चुनावी भ्रष्टाचार के विरोध में एक शक्तिशाली समवेत स्वर उठ सके और उस स्वर को स्थायित्व मिल सके तो लोकतंत्र की जड़ों को सिंचन मिल सकता है। दशहरे के इस पर्व पर हमें भ्रष्टाचार रूपी रावण के दहन का संकल्प लेकर चुनाव के दिन लोकतंत्र के इस महापर्व में अपनी 100 प्रतिशत भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए। इसी में लोकतंत्र व राष्टÑ की भलाई है।

 

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