सर्तकता में ही बचाव

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Vigilance only rescue
देश के एक भी नागरिक की अकाल मृत्यु होना बेहद दुखद है। एक तरफ यहां वैश्विक स्तर पर फैली कोरोना की महामारी से अमूल्य मानव जीवन जा रहा है, वहीं भारत में पिछले दिनों घटित तीन दर्दनाक घटनाओं ने 30 के करीब लोगों की जान ले ली, जोकि मानवीय लापरवाही की वजह से घटित हादसों के कारण हुआ। गुरूवार को विसाखापत्तनम में एलजी पॉलिमर्स इंडिया में जहरीली गैस रिसाव से मजदूरों सहित आसपास के 14 लोग काल कवलित हो गए एवं दर्जनों बुरी तरह बीमार हो गए। दूसरी घटना महाराष्ट्र के औरंगाबाद के पास एक मालगाड़ी की चपेट में आकर 16 लोगों की मौत हो गई, ये लोग भी मेहनत मजदूरी करने वाले थे।
पहला हादसा यहां एक निजी विदेशी कंपनी की लापरवाही है जिसने लॉकडाउन में ढ़ील के बाद अपने कामगारों को दोबारा काम पर बुलाया और पॉलिमर कारखाने को शुरू करने के लिए व्यवस्था को दुरूस्त करने सहित मशीनों की साफ सफाई छेड़ी। लेकिन एलजी कंपनी ने केन्द्र सरकार द्वारा जारी निर्देशों की लापरवाही की जिसके अनुसार खतरनाक उद्योग को लंबे अंतराल पर शुरू करने से पूर्व सावधानियां रखने के बारे में बताया गया था। लेकिन कंपनी की गलती से देखते ही देखते स्टाईरीन गैस ने लोगों को मौत की नींद सुला दिया। औरंगाबाद में घटित रेल हादसे में प्रथम दृष्टयता में रेलवे की कोई गलती नजर नहीं आ रही, बताया जा रहा कि कुछ लोग रेल पटरियों पर सो रहे थे, जिन्हें उठाने के लिए रेल ड्राईवर ने होर्न भी बजाया परन्तु जब तक सोये हुए लोग कोई हलचल करते रेल ने उन्हें कुचल दिया।  इसी तरह छत्तीसगढ़ में एक पेपर मिल में पुन: काम चालू करते समय जहरीली गैस के असर से तीन मजदूर जान गंवा बैठे। एलजी पॉलिमर व छत्तीसगढ़ पेपर मिल मामले में संबंधित राज्य सरकारों को दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए, पीड़ितों को मुआवजा व दोषी कारखाना प्रबंधकों पर लापरवाही से मानववध कर देने के मुकदमें चलने चाहिए।
औद्योगिक घटना के शिकार उक्त लोगों का मामला भौपाल गैस कांड दोषियों की तरह नहीं चलना चाहिए जिसमें सही पीड़ितों को आज 36 साल गुजर जाने पर भी न्याय नहीं मिल पाया। महाराष्ट्र दुर्घटना पीड़ितों को भी सरकार की ओर से आर्थिक सहायता दी जानी चाहिए भले ही गलती मृतकों की रही हो। क्योंकि लॉकडाउन के वक्त हजारों-हजार गरीब लोगों को पता ही नहीं चल पा रहा कि वह अपने घर कैसे जाएं। लंबे लॉकडाउन के चलते भूख व फटेहाली के चलते लोग पैदल ही सड़कों, पगडंडियों, रेल लाइनों के साथ-साथ अपने घर लौटने की जद्दोजहद कर रहे हैं। हालांकि केन्द्र व राज्य सरकारों ने बस व ट्रेन ऐसे प्रवासी लोगों के लिए चलाई हैं वह भी सरकारी भाड़ा देकर लेकिन लोग कोरोना संक्रमण के कारण भी भयभीत हैं कि कहीं बस, ट्रेन की भीड़ में वह किसी बीमारी का शिकार न हों जाए, सो वह पैदल साइकिल आदि से ही सफर पर चल रहे हैं। इस बुरे वक्त में सरकार, प्रशासन, निजी कंपनियों, आमजन सबको बहुत ही सर्तकता से अपना काम करना है। जरा सी भूल से जहां कोरोना की मार पड़ सकती है वहीं विसाखापत्तनम या ओरंगाबाद रेल हादसे जैसी कोई त्रासदी भी घटित हो सकती है। अत: कामना करनी होगी
सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दु:खभाग् भवेत्।।

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