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समान नागरिक संहिता जरूरी लेकिन सर्वसम्मति से

Uniform civil code is required but unanimously

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर से गोवा के एक संपत्ति विवाद मामले की सुनवाई के दौरान समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने के लिए सरकार द्वारा किए गए प्रयासों पर टिप्पणी करते हुए इसको नाकाफी बताया। इसी के साथ एक बार फिर से इस मुद्दे पर देश में बहस छिड़ गई है। हाल के वर्षों में समान नागरिक संहिता पर सियासी और सामाजिक दोनों ही माहौल गर्म रहा है। संविधान के अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता की चर्चा की गई है। राज्य के नीति निर्देशक तत्व से संबंधित इस अनुच्छेद में कहा गया है कि राज्य भारत के समस्त राज्य क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करेगा। समान नागरिक संहिता में बिना किसी धर्म और जाति के भेदभाव के सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून होता है। समान नागरिक संहिता में शादी, तलाक तथा जमीन जायदाद के बंटवारे में सभी धर्मों के लिए एक ही कानून लागू होता है।

मौजूदा परिवेश में भारत में संपत्ति, विवाह और तलाक के नियम हिंदुओं, मुस्लिमों और ईसाइयों के लिए अलग-अलग हैं। भारत में अभी मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदाय का अपना पर्सनल लॉ है। जबकि हिंदू सिविल लॉ के तहत हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध आते हैं। संविधान निर्माण के बाद से ही समान नागरिक संहिता को लागू करने की मांग उठती रही है। लेकिन जब-जब यह मांग उठी है उसी के साथ इसका विरोध भी होता रहा है। भारतीय संविधान में अनुच्छेद 25 से 28 के बीच धार्मिक स्वतंत्रता की बात की गई है। जिसका हवाला देकर मुस्लिम समाज समान नागरिक संहिता का जबरदस्त विरोध करता रहा है। वहीं दूसरी तरफ अनुच्छेद 14 अनुच्छेद, 15 और अनुच्छेद 21 भी हैं। जो गरिमा पूर्ण जीवन जीने के अधिकार के साथ समानता की बात करते हैं।

जिसकी वजह से समान नागरिक संहिता के पक्षधर इसके लागू होने में देरी को संविधान का उल्लंघन बताते हैं। मुस्लिम समाज के मुताबिक उनके निजी कानून उनकी धार्मिक आस्था पर आधारित हैं। इसलिए समान नागरिक संहिता लागू कर उनके धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप ना किया जाए। मुस्लिम समुदाय का कहना है कि इस प्रकार के कानूनों से छह दशक पहले मिली धार्मिक आजादी उनसे छीनी जा सकती है। इसलिए सबसे पहले हमें धर्म और कानून की सीमाओं को समझना होगा। यदि हम धर्म की बात करें तो अलग-अलग समुदायों में धर्म की परिभाषा भी अलग-अलग है। जहां कुछ संप्रदाय अंतिम सत्ता से संबंध स्थापित करने के माध्यम के रूप में धर्म को देखते हैं। वही कुछ संप्रदाय धर्म को नैतिक मूल्यों का संरक्षक, सामाजिक सदाचार, कर्तव्य बोध का मार्गदर्शक मानते हैं। लेकिन हमें धर्म को धार्मिक क्रियाकलापों और वैवाहिक रीति-रिवाजों तक ही सीमित रखना चाहिए।

विभिन्न धर्मों के अपने अलग-अलग सिविल कानून होने के कारण न्यायपालिका में भ्रम की स्थिति विद्यमान रहती है तथा निर्णय देने में कठिनाई के साथ-साथ समय भी लगता है। कानून समय के साथ परिवर्तित होते हैं। परंतु पर्सनल कानूनों का कार्यान्वयन उस धर्म के ही अधिकांश रूढ़िवादी तत्वों के हाथों में होने के कारण वह समय पर बदल नहीं पा रहे हैं। जिससे उन समाजों के पिछड़ने का खतरा उत्पन्न हो जाता है। अधिकांश पर्सनल कानूनों के प्रावधान महिलाओं की स्वतंत्रता तथा उनके मौलिक अधिकारों का हनन करते हैं। सामान्यत: समान नागरिक संहिता के विपक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि इससे हिंदू रीति-रिवाजों को दूसरे धर्मों पर आरोपित कर दिया जाएगा यह सरासर गलत है। इस तरह की भ्रामक बातें कानून लागू करने की राह में बाधा डालती हैं।

विधि आयोग की यदि अंतिम रिपोर्ट को देखें तो उसके अनुसार विधि आयोग यह मानता था कि समान नागरिक संहिता भारत के लिए आवश्यक नहीं है। लेकिन लैंगिक समानता के मुद्दे पर विधि आयोग ने सुझाव दिया था कि लड़कों एवं लड़कियों की शादी के लिए 18 वर्ष की आयु को न्यूनतम मानक के रूप तय किया जाए। ताकि लड़के और लड़कियां बराबरी की उम्र में शादी कर सके। विधि आयोग ने कहा था कि जरूरी नहीं है कि एक एकीकृत राष्ट्र को समानता की आवश्यकता हो। बल्कि हमें मानवाधिकारों पर निर्विवाद तर्कों के साथ अपने मतभेदों को सुलझाने का प्रयास करना चाहिए। इसके साथ-साथ आयोग ने यह भी सुझाव दिया था कि समान नागरिक संहिता को लागू करने के बजाय सभी निजी कानूनी प्रक्रियाओं को संहिताबद्ध करने की जरूरत है।

भारतीय संविधान भारत में विधि के शासन की स्थापना की वकालत करता है। ऐसे में आपराधिक मामलों में जब सभी समुदाय के लिए एक कानून का पालन होता है। तब सिविल मामलों में अलग कानून पर सवाल उठना लाजमी है। धर्म विशेष के निजी कानूनों में सुधार के अभाव में ना तो महिलाओं की हालत बेहतर हो पा रही है और ना ही उन्हें सम्मान पूर्वक जीने का अवसर मिल पा रहा है। सबसे ज्यादा बदतर हालत मुस्लिम महिलाओं की है। जो बहुविवाह और हलाला जैसी प्रथाओं की चंगुल से अभी भी नहीं निकल पा रही हैं। लेकिन दूसरी तरफ विधि आयोग की सलाह और अल्पसंख्यकों की चिंताओं पर भी गौर करना होगा क्योंकि दोनों ही समान नागरिक संहिता के खिलाफ हैं।

21वीं सदी की मौजूदा परिस्थितियों में समस्त नागरिकोंं के लिए एक समान कानून की आवश्यकता तो है। लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि सभी भारतीयों के बीच प्रेम और सद्भाव बना रहे। समान नागरिक संहिता को जबरन लागू करने से भारत की शांति और स्थिरता के लिए खतरा उत्पन्न हो सकता है। भारत में आस्था का लंबा इतिहास रहा है। जाहिर है एक झटके में इस तरह से समान नागरिक संहिता लागू कर उनके निजी कानूनों को खत्म नहीं किया जा सकता। यह तब तक संभव नहीं हो सकता जब तक समुदाय विशेष इसके समर्थन में ना आएं। इसलिए सरकार को प्रयास करना चाहिए कि सभी धर्मों के लोगों से बात की जाए और उनकी शंकाओं का निराकरण किया जाए। उन्हें समान नागरिक संहिता लागू होने के फायदों के बारे में बताया जाए जिससे सर्वसम्मति से ही इस कानून पर फैसला हो सके।

-कुलिन्दर सिंह यादव

 

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