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जन-जन समझे आयुर्वेद की महत्ता

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भारत सरकार ने धनवंतरी जयंती (28 अक्तूबर) को राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के रूप में मनाने का फैसला लिया है, जोकि एक सराहनीय कदम है। धनवंतरी आयुर्वेद के प्रवर्तक थे। उन्होंने ब्रह्मा जी के द्वारा अवतरित आयुर्वेद के ज्ञान को इंद्र देवता से प्राप्त किया और सृष्टि में फैली अनेक प्रकार की बीमारियों के अंत का रास्ता बनाया। आयुर्वेद जोकि सास्वत सत्य व अनादि है तथा स्वयं ब्रह्मा जी ने प्राणी मात्र के कल्याण के लिए इसको मृतलोक में देवताओं के माध्यम से भेजा था। लेकिन आज ये चिकित्सा पद्धति उपेक्षा का शिकार है।

भारतीय प्राचीन संस्कृति का लोहा पूरा विश्व मानता था। विशेषकर भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद को सीखने के लिए पूरे विश्व से यहां पर चिकित्सक आते थे। चीन से महर्षि पैंगी, यूरोप से महर्षि हरियाण्क्ष इसके प्रमुख उदाहरण हैं। उस समय आयुर्वेद के द्वारा ही असाध्य से असाध्य बीमारियों को बड़ी आसानी से ठीक कर दिया जाता था।

धनवंतरि के शिष्य महर्षि सुश्रुत ही शल्य चिकित्सा के जनक थे तथा आज का आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी उन्हें स्पष्ट रूप से शल्य चिकित्सा के प्रथम स्त्रोत व पितामह के रूप में पूजता है। जिस प्लास्टिक सर्जरी पर हम आज काम करके इतराते हैं, आज से हजारों साल पहले महर्षि सुश्रुत ने प्लास्टिक सर्जरी में बहुत बड़े-बड़े चमत्कार करके दिखाए थे। जहां अभी तक आधुनिक चिकित्सा विज्ञान नहीं पहुंच पाया।

प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद महाविज्ञान है। इसमें प्रतिपादित सिद्धांत शाश्वत, सत्य व सर्वभोमिक है। इसमें परिवर्तन की कोई गुंजाइश नहीं है। जिस प्रकार आयुर्वेद पंच महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु व आकाश) के सिद्धांत पर काम करता है तथा त्रिदोष (वात, पित व कफ) के माध्यम से प्राणी मात्र की चिकित्सा करता है, वह आज के आधुनिक विज्ञान से कहीं ज्यादा वैज्ञानिक व सफल है।

आयुर्वेद न केवल बीमार व्यक्ति का इलाज करता है, अपितु यह स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करके उसे बीमार ही न होने दिया जाए, इस बात पर ज्यादा जोर देता है।

आज के समय में जिस प्रकार अनेक असाध्य बीमारियां जैसे मधुमेह, कैंसर, एड्स, जोड़ों का दर्द, ब्लड प्रेशर, हदय रोग आदि का यदि हम स्थायी हल चाहते हैं, तो यह केवल आयुर्वेद से ही संभव है।

आयुर्वेद के आठ विभागों में काया चिकित्सा, बाल चिकित्सा, गृह चिकित्सा, शल्य चिकित्सा, शालाक्य चिकित्सा, विष चिकित्सा, जरा चिकित्सा, वाजीकरण चिकित्सा में हजारों संस्कृत के श्लोकों के माध्यम से विभिन्न असाध्य रोगों की चिकित्सा का विवरण दिया गया है। आज उस पर शोध करना अति जरुरी है, ताकि बढ़ती बीमारियों का स्थाई हल हो सके। भारत सरकार ने राष्ट्रीय आयुष मिशन के तहत आयुर्वेद पद्धति में लगातार शोध करने की दिशा में प्रयास किया है, लेकिन हमें इससे कहीं आगे बढ़कर सोचना व काम करना होगा।

कुछ समय के लिए तत्काल आराम पहुंचाने वाली चिकित्सा प्रणाली एलोपैथी का अपना महत्व है। परंतु उससे होने वाले दुषप्रभावों की उपेक्षा करना अपने-आपको धोखे में रखना है।

बाजार में मिलने वाली एंटीबायोटिक दवाइयां इंजेक्शन, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को नुक्सान पहुंचाते हैं तथा रोगों के कारणों को मिटाने की बजाए उनको दबाने व अन्य रोगों के रूप में प्रकट करने का मार्ग प्रशस्त करते हैं, इनके अधिक प्रयोग से कभी भी भविष्य में अधिक घातक परिणाम होने की संभावना बनी रहती है। ये दवाइयां रोगी के लिए जीवन का अंग बन जाती हैं। इनके छोड़ते ही बीमारी अपना उग्र रूप धारण कर लेती है।

वहीं आयुर्वेद व योग के माध्यम से असाध्य बीमारियों को भी बिना किसी दुष्परिणाम के आसानी से ठीक किया जा सकता है, लेकिन जन-साधारण की ऐसी मान्यता हो गई है कि जितना महंगा उपचार होता है, चिकित्सक की फीस जितनी ज्यादा होती है, उतना ही उपचार को प्रभावशाली मानते हैं। वास्तव में एलोपैथी चिकित्सा प्रणाली का आधार वैज्ञानिक तो है ही, साथ ही विज्ञापन पर ज्यादा केंद्रित है।

यह मुनाफाखोरों का ऐसा सुगम व सस्ता व्यवसाय बन चुका है, जिसमें रोगी को मात्र ग्राहक समझकर उससे पैसा कमाना ही अपना ध्येय समझते हैं।

भारत जैसे विशाल देश में जहां विभिन्न वनस्पति प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, यहां पर आयुर्वेद के फलने-फूलने की असीम संभावनाएं हैं। विविधताओं से भरे हमारे देश में केवल आयुर्वेद व योग के माध्यम से ही लोगों को स्वस्थ रखा जा सकता है। जिस प्रकार प्राचीन समय में भारतीय चिकित्सा आयुर्वेद पद्धति का डंका बजता था, वो आज भी संभव है।

यदि सरकार इस दिशा में जोर-शोर से कदम उठाए तो भारत सरकार आयुर्वेद को राष्ट्रीय चिकित्सा पद्धति घोषित करके ज्यादा से ज्यादा बजट आयुर्वेद को देकर देश व समाज का भला करने में कोई विलंब न करे।

वास्तव में आयुर्वेद दिवस का प्रयोजन तभी सफल माना जाएगा, जब यह चिकित्सा पद्धति न केवल भारत, बल्कि समस्त विश्व में अपना परचम लहराकर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करेगी।

लेखक डॉ. जितेंद्र गिल

 

 

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