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क्या थर्मल पावर प्लांट का विस्तार आवश्यक है?

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संपूर्ण विश्व में कोयला बिजली बनाने का सबसे बड़ा स्त्रोत है। कोयले से बिजली बनाने वाले प्लांट को थर्मल पावर प्लांट कहते हैं। भारत में 67% बिजली की स्त्रोत थर्मल पावर प्लांट है। पश्चिमी देश पर्यावरण संरक्षण के दृष्टि से थर्मल पावर प्लांट को चरणबद्ध तरीके से बंद करने हेतु प्रयासरत हैं। ब्रिटेन अपने यहाँ के थर्मल पावर प्लांट को 2025 तक बंद कर देगा,हालांकि वहाँ पर गिने चुने ही पावर प्लांट बचे हुए है।

यूरोपीय यूनियन के संदर्भ में देखे तो प्रदूषण को घटाने हेतु अधिकतर बिजली संयंत्रों को बंद करने का फैसला किया है। यूरोप ही नहीं बल्कि अमेरिका भी कोयले से बिजली बनाने वाले प्लांट को बंद करने की ओर अग्रसर हो रहा है,लेकिन भारत में एक नए थर्मल पावर प्लांट लगाने के लिए सरकार और प्रशासन प्रयासरत है जो विवादास्पद है। दरअसल झारखंड के गोड्डा जिले में आठ आठ सौ मेगावाट के अडानी सुपर क्रिटिकल थर्मल पावर प्लांट का निर्माण होना है। इसके लिए झारखंड सरकार और अडानी पावर(झारखंड) लिमिटेड ने फरवरी 2016 में एक समझौता किया था।

इस पावर प्लांट से उत्पादित 1600 मेगावाट विद्युत बांग्लादेश को सीधे विशेष ट्रांसमिशन लाइन से भेजी जानी है। इसके लिए अडानी समूह 15000 करोड़ का निवेश करेगा। दरअसल इसकी पहल प्रधानमंत्री मोदी ने 2015 में अपने बांग्लादेश के दौरे पर की थी। बाद में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री के दौरे से इस पर सहमति बनी। इस थर्मल पावर प्लांट के लिए अडानी पावर लिमिटेड और बांग्लादेश पावर डेवलपमेंट बोर्ड के मध्य औपचारिक करार भी हो चुका है ,इसलिए झारखंड के गोड्डा जिले में अडानी पावर प्लांट को जमीन पर उतारने हेतु जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू है लेकिन जिस प्रकार के दृश्य दिखाई पड़ रहे हैं। वह भयावह है। वहाँ के एक आदिवासी के अनुसार, हमने पावर प्लांट के लिए जमीन नहीं दी है, फिर अधिग्रहण कैसे हो गया।

31 अगस्त को सैंकड़ो कंपनी के लोग पुलिसवालों और लठैतों के साथ मेरे गांव में आए और मेरे खेत पर जबरन कब्जा किया। हमारी जम़ीन में खड़े धान की फसल पर बुलडोजर चला कर रौंद दिया गया और कहा यह जमीऩ अडानी का है। इसका अधिग्रहण हो चुका है। जबकि हमने अपनी जमीऩ नहींं दी है। हमारी आजीविका का साधन कृषि ही है। एक व्यक्ति के अनुसार, सरकार द्वारा जमीनों के अधिग्रहण हेतु बनाई गई रैयतों की सूची मेंं उन्हें मृत बताकर उनकी जम़़ीन अधिग्रहित कर ली गई। कुछ लोगों का कहना है कि बल प्रयोग द्वारा। जो स्वतंत्र भारत में दुर्भाग्य पूर्ण है।

भारत में कठोर जमीऩ अधिग्रहण कानून होने के बावजूद इस प्रकार बल प्रयोग के द्वारा एक ऐसे पावर प्लांट के लिए जमीऩ अधिग्रहण करना जो विश्व में पर्यावरण प्रदूषण का वाहक भी है । विश्व के कई देश जहाँ कोयले से बनने वाले विद्युतगृह को बंद करने की ओर अग्रसर है ,वही झारखंड में थर्मल पावर प्लांट को जमीऩ पर उतारने हेतु आदिवासियों पर बल प्रयोग करना पड़ रहा है। अडानी के प्रस्तावित पावर प्लांट हेतु गोड्डा प्रखंड के पटवा, मोतिया, गंगटी, नयाबाद और पोडैयाहाट प्रखंड के गोविंदपुुुर, सोनडीहा, गायघाट, रंगनिया माली गाँव की जमीनें अधिग्रहण की प्रक्रिया में है।

सरकार ने अडानी की परियोजना को हरी झंडी दे दी है। सरकार का कहना है कि मोतिया,गंगाघाट, गोविंदपुर, पटवा और माली गाँवों के अधिकतर किसानों ने अपनी जमी़ने देकर उसका मुआवजा ले लिया है जबकि गाँव के आदिवासियों का आरोप है कि उनकी जम़ीनों को सरकार ने अवैध तरीके से अधिग्रहित किया है इसलिए वे लोग इसका मुआवजा नहीं ले सकते।

यहाँँ देखा जाए तो प्रखंड के लोग भूमि पर अवैैैध तरीके से अधिग्रहण करने का आरोप सरकार और प्रशासन पर लगा रहे हैं। मोतिया के रामजीवन ने अपनी जमीन मेंं जबरन अधिग्रहण और मारपीट के आरोप में अडानी समूह के कुछ अधिकारियों पर मुुुकदमा किया है। ऐसे में यहां आजीविका का साधन तो समाप्त हो ही रहा है साथ ही पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के प्रति उदासीनता भी दिखाई पड़ रही है। जबकि भारत स्वयं पेरिस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर कर्ता देश भी है। जिसका उद्देश्य वैश्विक तापमान को दो डिग्री सेल्सियस कम रखने का है क्योंकि वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि वैश्विक तापमान दो डिग्री सेल्सियस से ऊपर होगा तो पृथ्वी पर व्यापक बदलाव हो सकता है। जो पृथ्वी पर निवास करने वाले जीव जंंतुुुओ के हित मेंं नहीं होगा।
प्रश्न उठता है कि आखिर कोयले से बिजली उत्पादन करने वाले विद्युत गृह घातक क्यों है?

पहला, कोयले से बिजली बनाने के फलस्वरूप कई तरह की पर्यावरणीय समस्याएं उजागर हो रही है जो मानव स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित कर रही है। कोयला जलाने से कार्बन डाइआॅक्साइड के अतिरिक्त नाइट्रोजन आक्साइड, सल्फर डाइआॅक्साइड, पारा तो निकलता ही है उसके अतिरिक्त राख भी निकलती है जो स्वास्थ्य की दृष्टि से काफी खतरनाक है। दूसरा, भारत में नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन की स्थापना 1975 में हुई। इस इलाके का पहला थर्मल पावर प्लांट शक्ति नगर स्थित सिंंगरौली सुपर थर्मल पावर प्लांट है। सोनभद्र के करीब 249 गांवों पर मरकरी (पारा) नामक प्रदूषण की मार दिखाई पड़ रही है। हालात यह है कि ग्रामीणों के नाखूनों और बालों में पारा मिला है। इसके अतिरिक्त करीब 300 किलोमीटर क्षेत्र में ली वनस्पतियां और मिट्टी में पारे प्रदूषण की उपस्थिति पाई गई है।

तीसरा, अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान के सर्वे के दायरे में लिए गए ज्यादातर ग्रामीण अनिद्रा, थकान, कमजोरी, यादाश्त की कमी, चिड़चिड़ापन, सिरदर्द, और कंपकंपी से ग्रस्त पाए गए है। चौथा सोनभद्र के गांवों के भूजल के स्त्रोतों में फ्लोराइड के साथ मरकरी के मिल जाने के पश्चात फ्लूरोसिस नामक बीमारी भी पनप रही है जिसके फलस्वरूप लोगों का शरीर कमजोर हो रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार कोयला को जलाया जाना और इससे होने वाली गर्मी, पारे के प्रदूषण का मुख्य कारण है।

पांचवां, कोयले के जलने के फलस्वरूप उससे बनी राख काफी मात्रा में होती है। उसमें 10% ऐश चिमनी के माध्यम से धुंंए के साथ ही बाहर निकलकर वातावरण में चली जाती हैै और 90% को पानी में घोलकर पाइप के माध्यम से कुछ किलोमीटर की दूरी पर बाहर निकाल दिया जाता है और जहाँ फ्लाईएश का डिस्पोजल किया जा रहा है।जिस प्रकार संपूर्ण विश्व ग्लोबल वार्मिंग और प्रदूषण की चपेट में है। ऐसे में भारत सरकार को भी कम से कम थर्मल पावर प्लांट के विस्तार पर तो रोक अवश्य लगाना चाहिए और ग्रीन और क्लीन एनर्जी पर अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहिए और उसे प्रोत्साहन तथा बढ़ावा दिया जाना चाहिए तथा विकसित देशों की भाँति चरणबद्ध तरीके से थर्मल पावर प्लांट को बंद करने की दिशा में अग्रसर होना चाहिए।

अनीता वर्मा

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