नक्सलियों के हौसलों को कुचलने की है जरूरत

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There is a need to crush the spirits of the Naxalites

झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में नक्सलियों द्वारा किए गए एक विभत्स हमले में झारखंड जगुआर (स्पेशल टास्क फोर्स) के तीन जवान शहीद और दो घायल हो गये। यह घटना ऐसे समय में अंजाम दी गई है, जब हफ्ते भर पहले ही 10 लाख रुपये के एक इनामी नक्सली ने रांची जिला प्रशासन के समक्ष आत्मसमर्पण किया था। जीवन कंडुलना नाम के उक्त नक्सली ने सरेंडर करने के बाद अपने दूसरे साथियों से भी मुख्यधारा में शामिल होने की अपील की थी, लेकिन उस अपील के हफ्ते भर के भीतर की घटी इस घटना से माना जा रहा है कि अपनी ताकत का अहसास कराने तथा सरेंडर की इच्छा रखने वाले अन्य नक्सलियों को हतोत्साहित करने के लिए ही यह घटना अंजाम दी गई है।

एक तरफ सरकार द्वारा आत्मसमर्पण नीति को सरल बनाकर नक्सलियों को मुख्यधारा में जोड़ने की कवायदें तेज की जा रही हैं, तो दूसरी तरफ समय-समय पर हो रही नक्सली घटनाएं सरकार के नक्सल उन्मूलन के दावे पर पानी भी फेर रही हैं। ऐसे में कहना गलत नहीं होगा कि नक्सलियों के नापाक इरादों को कुचलने में सरकारें विफल रही हैं। उन्हें उनकी कायराना करतूतों का माकूल जवाब नहीं दिया जा रहा है। हालांकि यहां यह कहना भी वाजिब ही होगा कि विकास के असमान प्रतिरूप की वजह से नक्सलवाद की समस्या खत्म होने का नाम नहीं ले रही है।

यूं तो भारत में नक्सलवाद का इतिहास बहुत पुराना नहीं है, लेकिन आज यह एक गंभीर राष्ट्रीय आंतरिक समस्या बन चुका है। वास्तव में 1960 के दशक में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव में जमींदारों द्वारा किसानों और मजदूरों पर ढाए जा रहे जुल्मों से उन्हें मुक्ति दिलाने के लिए चलाए गये एक सकारात्मक आंदोलन की गोद से उपजा नक्सलवाद आज अपने मकसद से पूरी तरह भटक चुका है। नक्सलबाड़ी आंदोलन भले ही पारंपरिक हथियारों से लड़ा गया था, लेकिन आज नक्सलियों के पास अत्याधुनिक हथियार हैं, जिसका इस्तेमाल कर वे कई तरीकों से सुरक्षा बलों या ग्रामीणों पर हमले करते रहते हैं।

नक्सली देश को दीमक की तरह खोखला कर रहे हैं। सत्ता से लड़ते-लड़ते ये नक्सली अब जनसंहार पर उतर आए हैं। नक्सलवाद पहले केवल एक सामाजिक समस्या थी, पर अब एक राजनीतिक समस्या बन चुकी है। नक्सलबाड़ी में विकास के अभाव और गरीबी से उपजा आंदोलन एक पतित विचारधारा के रूप में आज देश के समक्ष नासूर बन चुका है। इसका प्रारंभिक उद्देश्य भले ही समाज में समानता स्थापित करना रहा हो, लेकिन आज यह बस हिंसा पर केंद्रित हो गया है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या प्रचलित शासन व्यवस्था के प्रति नाखुशी व्यक्त करने का एकमात्र तरीका हिंसा ही है?

दरअसल समाज की मुख्यधारा से विरत होकर आतंक और भय के सहारे न तो उन्हें अपने लक्ष्य की प्राप्ति होती है और ना ही वे अपनी बातों को सरकार व समाज के समक्ष रख पाते हैं। आम नागरिकों को परेशान करना, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, रेल की पटरियां उखाड़ना, बम विस्फोट, अवैध वसूली, अपहरण, डकैती, बलात्कार और हत्या जैसे जघन्य अपराध उनकी पहचान बन चुके हैं। नक्सली हमले के कारण हमारी सुरक्षा के लिए तत्पर जवानों को शहादत देनी पड़ती है। देश-सेवा का जज्बा लेकर सेना में भर्ती वाले जवान सामान्य जीवन से कोसों दूर रहकर देश की रक्षा के लिए तत्पर रहते हैं, लेकिन कितनी हैरत की बात है कि अपने ही देश में उन्हें निशाना बनाकर मार दिया जाता है।

सोचिए! जब एक नक्सली स्वयं को समाज की मुख्यधारा में लाने की कोशिश नहीं करता है, तो वह आने वाली कई पीढ़ियों के लिए कब्र खोद रहा होता है। जब तक एक पीढ़ी संघर्ष नहीं करेगी और लोकतांत्रिक व्यवस्था में जीवन यापन करते हुए उद्देश्यपूर्ण जीवन की तलाश नहीं करेगी, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए शिक्षा और रोजगार के द्वार कैसे खुलेंगे?दरअसल नक्सली इस भ्रम में हैं कि मुख्यधारा की दुनिया प्रगतिशील नहीं है।

वे न तो संविधान पर भरोसा करते हैं और ना ही सरकार पर। उन्हें लगता है भोले-भाले आदिवासियों को बरगला कर और उन्हें अपने संगठन में शामिल कर सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ते रहेंगे। लेकिन उन्हें अहसास होना चाहिए कि इस तरह की मानसिकता और सोच के साथ न तो जीवन गुजारना आसान होता है और न ही उद्देश्यपूर्ण जीवन की कल्पना ही की जा सकती है। जरूरत इस बात की है वे अपनी रणनीति बदलकर समाज की मुख्यधारा में आएं। मालूम हो कि राज्य सरकारें नक्सलियों के लिए प्रत्यार्पण और पुनर्वास की नीति को सुगम बनाने पर जोर दे रही हैं।

नक्सलियों को भारत के संविधान पर विश्वास करना चाहिए। हथियार छोड़कर उन्हें संवैधानिक तरीके से अपनी बातें रखनी चाहिए। सरकार कभी भी बातचीत करने से इंकार नहीं करती है, लेकिन सवाल यह उठता है कि नक्सली क्या सकारात्मक मानसिकता के लिए बात करने के लिए तैयार है? आखिर वह समाधान की राह पर क्यों नहीं चलते? क्यों उन्हें लगता है कि आतंक के बल पर ही वे अपनी बातें मनवा सकते हैं?

आखिर मुख्यधारा में लौटने की हमारी सारी कवायदें विफल क्यों हो जाती हैं? दरअसल नक्सल समस्याओं से निपटने के दीर्घकालिक उपाय के तहत नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बड़ी संख्या में रोजगार के अवसरों का सृजन किया जाना चाहिए, जिससे उन क्षेत्रों के बेरोजगार युवा निराश होकर नक्सली समूहों में शामिल ना हों। उन्हें भरोसा दिलाना होगा कि सरकार उसकी सहायता के लिए हमेशा तत्पर है। उन्हें किसी संगठन के समक्ष मदद के लिए हाथ ना फैलाना पड़े, यह सरकार को सुनिश्चित करना होगा, तभी उनके मन में यह विश्वास पैदा होगा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था ही जीवन यापन के लिए सर्वोत्तम माध्यम होती है।

सरकार को नक्सलवाद से निपटने के लिए सशस्त्र अभियान के साथ-साथ नक्सल प्रभावित पिछड़े क्षेत्रों में व्यापक पैमाने पर विकास तथा रोजगार सृजन के कार्य पर ध्यान देना चाहिए। शिक्षा, संचार, परिवहन जैसी आधारभूत सुविधाओं से उस क्षेत्र को जोड़ने की पहल करनी चाहिए। वहां स्कूल, कॉलेज, अस्पताल और उद्योगों का जाल बिछाना होगा। गरीबी, बेरोजगारी के उन्मूलन के साथ लोगों के हितों की रक्षा करनी होगी। आदिवासियों को जागरूक करना होगा, ताकि वे नक्सलियों के बहकावे में ना आएं। हम सबको मिलकर एक ऐसा माहौल बनाना होगा, जिसमें नक्सलवादी सोच दस्तक ना दे पाए।

सुधीर कुमार

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