त्योहारी सीजन में मिलावट का महाजाल

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Festivel Season

त्योहारी सीजन शुरू होते ही देशवासियों ने अपने अपने स्तर पर पर्व मनाने की तैयारी जोर शोर से शुरू कर दी है। त्योहारों पर आमजन अपने अपने सामर्थ्य के मुताबिक नए कपड़े, जेवर, मिठाइयां और फल फ्रूट आदि खरीदते हैं। खुद खाते हैं और अपने मित्रों तथा रिश्तेदारों को उपहार में देते हैं। भारत में हंसी खुशी के साथ त्योहार मनाने की समृद्ध परम्परा है। माह अक्टूबर में दशहरे से लेकर दीपावली तक लगभग एक दर्जन छोटे और बड़े त्योहार आते है। सभी त्योहार हमारी लोक संस्कृति में रचे बसे हैं। गीत संगीत नृत्य और खान पान के साथ हम अपने त्योहारों को मानते हैं।

त्योहारी सीजन शुरू होने के साथ ही सोने से रसोई तक मिलावटखोर भी सक्रिय हो जाते हैं। हर चीज में मिलावट जैसे आम बात हो गई है। मिठाई के बिना त्योहार अधूरा है। त्योहार आये और मिठाई न खाये यह हो ही नहीं सकता। त्योहारी सीजन शुरू होते ही बाजार में ग्राहकी बढ़ने लगती है। मिठाई त्योहारों की खुशी को दुगुना कर देती है। मिलावटखोर भी इसी इंतजार में रहते हैं। उनकी दुकाने रंग बिरंगी मिठाइयों से सज जाती है और हम बिना जांचे परखे इन मिठाइयों को खरीद कर ले आते हैं। मिलावटखोर अधिक मुनाफे के चक्कर में धड़ल्ले से अपना मिलावटी सामान बेचते देर नहीं लगाते। मिलावटखोरों को नियम-कानून का भी भय नहीं रह गया। खासकर त्योहार के सीजन में तो इनकी पौ-बारह रहती है।

खाद्य पदार्थों में अशुद्ध, सस्ती अथवा अनावश्यक वस्तुओं के मिश्रण को मिलावट कहते हैं। आज समाज में हर तरफ मिलावट ही मिलावट देखने को मिल रही है। पानी से सोने तक मिलावट के बाजार ने हमारी बुनियाद को हिला कर रख दिया है। पहले केवल दूध में पानी और शुद्ध देशी घी में वनस्पति घी की मिलावट की बात सुनी जाती थी, मगर आज घर-घर में प्रत्येक वस्तु में मिलावट देखने और सुनने को मिल रही है। मिलावट का अर्थ प्राकृतिक तत्त्वों और पदार्थों में बाहरी, बनावटी या दूसरे प्रकार के मिश्रण से है।

मुनाफाखोरी करने वाले लोग रातोंरात धनवान बनने का सपना देखते हैं। अपना यह सपना साकार करने के लिए वे बिना सोचे-समझे मिलावट का सहारा लेते हैं। सस्ती चीजों का मिश्रण कर सामान को मिलावटी कर महंगे दामों में बेचकर लोगों को न केवल धोखा दिया जाता है, बल्कि हमारे स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ भी किया जाता है। मिलावटी खाद्य पदार्थों के सेवन से प्रतिवर्ष हजारों लोग विभिन्न बीमारियों का शिकार होकर जीवन से हाथ धो बैठते हैं। मिलावट का धंधा हर तरफ देखने को मिल रहा है। दूध बेचने और मिलावट करने वाले से लेकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों तक ने मिलावट के बाजार पर अपना कब्जा कर लिया है।

सत्य तो यह है कि हम जो भी पदार्थ सेवन कर रहे हैं चाहें वे खाद्य पदार्थ हों या दूसरे, सब में मिलावट ही मिलावट हो रही है। दूध, मावा, घी, हल्दी, मिर्च, धनिया, अमचूर, सब्जियां, फल आदि सभी मिलावट की चपेट में है। आज खाने पीने सहित सभी चीजों में धड़ले से मिलावट हो रही है। ऐसा कोई भोज्य पदार्थ नहीं है, जो जहरीले कीटनाशकों और मिलावटों से मुक्त हो। बाजार में पपीता, आम और केला, सेव अनार जैसे फलों को कैल्शियम कार्बाईड की मदद से पकाया जाता है। चिकित्सकों के अनुसार यह स्वास्थ्य के लिए काफी हानिकारक है। फलों को सुनहरा बनाने के लिए पैराफीन वैक्स भी लगाया जाता है। इन फलों को खाने से कैंसर और डायरिया जैसी बीमारियां होती है। डेयरी और कृषि उत्पादों-विशेषकर हरी सब्जियों में आॅक्सिटोसिन का खूब इस्तेमाल हो रहा है।

हमारे देश में मिलावट करने को एक गंभीर अपराध माना गया है। मिलावट साबित होने पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 272 के तहत अपराधी को आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान है। मगर बहुत कम मामलों में सजा और जुर्माना हो पाता है। मिलावटी खाद्य पदार्थों के सेवन से आदमी अनेक प्रकार की बीमारियों का शिकार हो जाता है। पेट की असाध्य बीमारियों से लेकर कैंसर तक का रोग लग जाता है। अंधापन और अपंगता को भी झेलना पड़ता है। मिलावट साबित होने पर कई बार छोटे-मोटे मिलावटखोरों की पकड-धकड़ के समाचार अवश्य पढ़ने और सुनने को मिल जाते हैं मगर मिलावट का थोक व्यापार करने वाले लोग अब तक कानून की पहुंच से दूर हैं।

बाल मुकंद ओझा

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