व्यक्ति का जीवन ही राष्ट्र का निर्माण

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Lack Of Ideal Personality In Front Of Youth

कोरोना महामारी ने हमारे जीने के तौर-तरीके को अस्तव्यस्त कर दिया है। हमारे द्वारा यह कामना करना अस्वाभाविक नहीं था कि हमारे नष्ट हो गये आदर्श एवं संतुलित जीवन के गौरव को हम फिर से प्राप्त करेंगे और फिर एक बार हमारी जीवन-शैली में पूर्ण भारतीयता का सामंजस्य एवं संतुलन स्थापित होगा। किंतु कोरोना के जटिल सात माह के बीतने पर हालात का जायजा लें, तो हमारे सामाजिक, पारिवारिक और वैयक्तिक जीवन में जीवन-मूल्य एवं कार्यक्षमताएं खंड-खंड होते दृष्टिगोचर होते हैं। हर व्यक्ति जीवन को उन्नत बनाना चाहता है, लेकिन उन्नति उस दिन अवरुद्ध होनी शुरू हो जाती है जिस दिन हम अपनी कमियों एवं त्रुटियों पर ध्यान देना बन्द कर देते हैं। यह स्थिति आदमी से ऐसे-ऐसे काम करवाती है, जो आगे चलकर उसी के लिए हानिकारक सिद्ध होते हैं। रही-सही कसर पूरी कर देती है हमारी त्रुटिपूर्ण जीवनशैली।

असंतुलित जीवन है तो आदमी सकारात्मक चिंतन कर नहीं सकता। जीवन के उद्देश्य पर विचार करेंगे तो एक नई सचाई सामने आएगी और जीवन की शैली का प्रश्न भी सामने आएगा। हम मनुष्य जीवन की मूल्यवत्ता और उसके तात्पर्य को समझें। वह केवल पदार्थ भोग और सुविधा भोग के लिए नहीं बल्कि कर्म करते रहने के लिये है। मनुष्य जन्म तो किन्हीं महान उद्देश्यों के लिए हुआ है। हम अपना मूल्य कभी कम न होने दें। प्रयत्न यही रहे कि मूल्य बढ़ता जाए। लेकिन यह बात सदा ध्यान में रहे कि मूल्य जुड़ा हुआ है जीवनमूल्यों के साथ। अच्छी सोच एवं अच्छे उद्देश्यों के साथ। हायमैन रिकओवर ने कहा कि अच्छे विचारों को स्वत: ही नहीं अपनाया जाता है। उन्हें पराक्रमयुक्त धैर्य के साथ व्यवहार में लाया जाना चाहिए।

इंटरनेट एवं छोटे-परदे की आँधी ने समूची दुनिया को एक परिवार तो बना दिया है, लेकिन इस संस्कृति में भावना का रिश्ता, खून का रिश्ता या पारिवारिक संबंध जैसा कुछ दिखता ही नहीं है। यही नहीं इस जीवनशैली से अकर्मण्यता एवं उदासीनता भी पसर रही है। सभी अपने स्वार्थों के दीयों में तेल डालने में लगे हैं। संकीर्ण सोच के अंधेरे गलियारों में औंधे मुंह पड़े संबंध और मानवीय रिश्ते सिसक रहे हैं। भले ही हमारे देश की सांस्कृतिक परंपराएँ और आदर्श जीवन-मूल्य समृद्ध एवं सुदृढ़ रहे हैं किन्तु कोरोना महाव्याधि के प्रकोप की हवाओं ने हमारे जन-मानस में भावी जीवन के सन्दर्भ में भय एवं आशंकाओं का धुंधलका घोलकर हमारे रहन-सहन और आचार-विचार को असंतुलित किया है, और इससे हमारी संयुक्त परिवार, आदर्श जीवनशैली एवं प्रेरक संस्कृति की परंपरा बिखर रही है।

ऐसे परिवार ढूँढ़ने पर भी मुश्किल से मिलते हैं, जो शांति और संतोष के साथ आनंदित जीवन जीते हैं। जीवन हमारा असन्तुलित एवं त्रुटिपूर्ण बना हुआ है। शांति, संतोष और तृप्ति का एक ही साधन है और वह है योग। श्रीकृष्ण अर्जुन से इसीलिए कह गए कि अब तुम तृप्त होकर योगी बन जाओ। तृप्त होने के बाद न मोह रहेगा, न आकांक्षा शेष रहेगी। इसी तृप्ति में जीवन की समृद्धि का स्रोत समाहित है, इसलिये दैनिक जीवन में योग का समावेश जरूरी है। व्यक्ति का जीवन ही राष्ट्र का निर्माण है। इसलिये प्रयास वहीं से शुरू होने चाहिए।

 

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