सम्पादकीय

विफल रही सरकार परन्तु आगे कुछ करना होगा

The failed government, but have to do something further

पिछले एक सप्ताह से पंजाब में बोरवैल में गिरे बच्चे फतेहवीर सिंह को बचाने का राहत कार्य यहां देशभर में सुर्खियों में रहा वहीं, सरकार, प्रशासन, सरकारी राहत टीम के राहत कार्य में रही कमियों पर अब चर्चा हो रही है। निश्चित रूप से जब कोई आॅपरेशन विफल हो जाता है तब वह प्रशासन व सरकार की विफलता पहले मानी जाती है। आज रोबोटिक तकनीक का युग आ गया है, सूचना तकनीक का दौर है ऐसे में भी राहत कार्य पुराने तौर तरीकों से चलाए जाते हैं तब वह सरकारी टीमों की घोर लापरवाही व विफलता है। इस राहत कार्य में गैर सरकारी संस्थाओं, समाज सेवी लोगों ने उम्मीद से कहीं बढ़कर काम किया।

यहां तक मीडिया में पूरा वक्त सरकार व उसकी टीम हाशिये पर दिखाई दी। यहां अब कमियों पर चर्चा की जानी चाहिए ताकि भविष्य में फिर कोई विफलता न मिले। सर्व प्रथम बोरवैल में गिरे किसी व्यक्ति या जीव को बचाने के लिए गड्ढे खोदना, भारी तामझाम लगाना समय व धन की बर्बादी है एवं पीड़िÞत के जीवन को दांव पर लगाना है। भविष्य में ऐसे राहत कार्यों के लिए कुछ जीवों की भी सहायता ली जा सकती है, जैसे नेत्रहीनों को रास्ता दिखाने के लिए कुत्ते प्रशिक्षित किए जाते हैं, बंदर भगाने के लिए लंगूर प्रशिक्षित किए जाते हैं, शिकार के लिए बाज को मनुष्य तैयार करता है।

क्या ऐसा कोई जीव प्रशिक्षित नहीं किया जा सकता जो अंधेरी व गहरी सुरंगों में मनुष्य की मदद कर सके? इसके अलावा विकल्प के तौर पर अच्छी समझ बूझ वाले बच्चे क्यों प्रशिक्षित नहीं किए जा सकते? आतंकी अगर बच्चों को मानव बम बना सकते हैं तब क्या सभ्य समाज बच्चों को सुरक्षा हेतु प्रशिक्षण नहीं दे सकता? जो तंग व संकरी जगहों पर मदद कर सकें, जहां सिर्फ बच्चे ही पहुंच सकते हैं। चूंकि जिम्नास्टिक व बाजीगरी में बच्चे ऐसे करतब कर लेते हैं जो बड़े नहीं कर सकते। आखिर में बात तकनीकी की करें तब रोबोटिक आर्म क्यों नहीं बनाई जा सकती? आज बहुमंजिला इमारतों, बड़े कारखानों में रोबोटिक आर्म से काम लेना साधारण बात हो गई है, गहरी व अंधेरी सुरंगों में क्यों रोबोटिक आर्म नहीं भेजी जाती? मेडिकल क्षेत्र में शरीर में आज रोबोटिक सर्जरी बहुत स्टीक व तेजी से काम कर रही है, जो कि हजारों लोगों का जीवन बचा रही है। बहुत कुछ संभव है बस इच्छा शक्ति होनी चािहए।

अब तरस उन लोगों की बुद्धि पर किया जाना चाहिए जो जग्गा नाम के एक वॉलिंटियर को एनडीआरएफ की वर्दी न पहनने के लिए बुरा भला कह रहे हैं, जग्गा ने तीन दिन तक भूखे-प्यासे रहकर जीवन दांव पर लगाकर श्रम व हुनर से जो सेवा की उसका क्या? अच्छा हो यदि सब लोग समाज की सेवा में प्रशिक्षित बनें ताकि अगली किसी आपदा के वक्त तमाशबीन कुछ कम हो सकें।

 

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