सम्पादकीय

राजस्थान में स्वाईन फ्लू का कहर

Swine Flu in Rajasthan

राजस्थान में स्वाईन फ्लू की बीमारी कहर बरपा रही है। अब तक 48 मौतें स्वाईन फ्लू से होने की खबर है और एक हजार से अधिक मरीज इस रोग से पीड़ित बताए जा रहे हैं। यह बीमारी सर्दियों में फैलती है। ठंड से इसका वायरस अधिक फैलता है। चाहे राजस्थान सरकार ने चौकसी बरतते हुए स्वास्थ्य विभाग ने कर्मचारियों की छुट्टियां भी रद्द कर दी हैं परंतु मौतों का आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है। दरअसल जागरूकता ईलाज की अपेक्षा कहीं बेहतर व सस्ती है। चाहे स्वाईन फ्लू पिछले कई सालों से देश के विभिन्न राज्यों में मरीजों की मौत का कारण बन बन रहा है परंतु इस संबंधी जागरूकता बढ़ने की बजाय कम हुई है। शुरूआत में लोगों में इस बीमारी संबंधी काफी भय था व राज्य सरकारों के स्वास्थ्य विभागों ने भी काफी प्रचार किया परंतु धीरे-धीरे यह प्रचार धीमा पड़ गया। यह मौसमी बीमारी है, जब मौसम के बदलने से बीमारी का हमला घटता है तो स्वास्थ्य विभाग की सरगर्मियां भी धीमी पड़ जाती हैं।

हमारे देश में काम करने का कल्चर ही सही नहीं है कोई सख़्त कदम केवल तभी उठाया जाता है जब पानी सिर के ऊपर से गुजर जाता है। स्वाईन फ्लू संबंधी भी अधिकतर सरकारें तब नींद से जागती हैं जब काफी नुक्सान हो चुका होता है। यदि किसी मौसम के आने से काफी समय पहले बीमारी संबंधी जागरूकता फैलाई जाये तो बुरे हालात पैदा ही न हों। राजस्थान की स्वाईन फ्लू की बीमारी कारण देशभर में चर्चा है। इसी तरह गर्मी के मौसम में जीका की बीमारी के कारण भी यह राज्य चर्चाओं में रह चुका है। आबादी दूर-दराज बसी होने, संचार-साधनों की कमी, गरीबी व अनपढ़ता के कारण भी राज्य में स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता पैदा करने में परेशानियां आती हैं। मौसमी बीमारियों से जागरूक होने से बचा जा सकता है।

सरकार अन्य कार्याें के विज्ञापनों पर करोड़ों रुपये खर्च कर देती है वहीं स्वास्थ्य प्रति जागरूकता के लिए बजट में वृद्धि की जा सकती है। केंद्र सरकार को भी इस मामले में ठोस कदम उठाने की जरूरत है। केंद्र की ओर से ‘आयूशमान भारत’ के अंतर्गत गरीबों को पांच लाख की बीमा योजना दी जा रही है। ऐसीं योजनाओं के चलते डेंगू, स्वाईन फ्लू, जैसी बीमारियों के साथ मौतें होना सरकारों की स्वास्थ्य संबंधी नीतियों व प्रबंधों की खामियों की तरफ उंगली करती हैं। अरबों रूपये की लागत से बनी सरकारी अस्पताल की इमारतों की सार्थिकता इसी बात में है कि आम आदमी को कम से कम उन बीमारियों से जरूर बचाया जाए, जिनसे केवल जागरूकता के साथ ही बचा जा सकता है।

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