परेशान हो उठे थे सुभाष

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Subhash was upset
बात तब की है जब बंगाल विभाजन को लेकर आंदोलन जोरों पर था। सुभाषचंद्र बोस उस वक्त मात्र दस साल के थे। उन्होंने लोगों से सुना कि खुदीराम बोस और कन्हाई लाल दत्त हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ गए। शहीदों की चिता की राख से लोगों ने ताबीज बनाए और अपने बच्चों के गले में डाले। सुभाष बाबू जिधर जाते दत्त और बोस की प्रशंसा सुनते। उन्होंने इन दोनों शहीदों के चित्र अखबार से काटे और एक गत्ते पर चिपका कर अपने कमरे की दीवार पर सजा दिए। वह रोज घंटों इन चित्रों को निहारते रहते थे।
एक दिन उनके एक रिश्तेदार घर आए।  सुभाष के कमरे में जब उन्होंने क्रांतिकारियों के चित्र लगे देखे तो सुभाषचंद्र के पिता जानकी बाबू को सलाह दी- इन तस्वीरों को हटवा दो वरना किसी ने सरकार से शिकायत कर दी तो मुसीबत में पड़ जाओगे। जानकी बाबू ने चित्र हटवा दिए। सुभाष बाबू ने जब उन चित्रों को अपने कमरे में नहीं पाया तो परेशान हो उठे। उनके पिता ने उन्हें बताया कि न चाहते हुए भी ऐसा करना पड़ा, क्योंकि अंग्रेज इसे अपराध मानते हैं। सुभाष बाबू बोले- यह देश हमारा है और हम आदेश विदेशियों का मानते हैं? क्या हम अपने घरों में उन लोगों के चित्र भी नहीं लगा सकते जिन्होंने हमारे लिए अपने प्राणों की आहुति दी है। यह तो जुल्म है। आज मुझे आजादी का महत्व समझ में आ गया है। इस घटना के बाद सुभाष बाबू पर देशभक्ति का रंग और गहरा हो गया। अंग्रेजी शासन उन्हें शूल की तरह चुभने लगा। उन्होंने तय कर लिया कि वह आगे चलकर जरूर स्वाधीनता आंदोलन में शामिल होंगे।
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