भुखमरी और खाद्यान की बर्बादी

Poverty

खाद्यान, भुखमरी एवं गरीबी की समस्या से निपटने के लिए हर वर्ष 16 अक्टूबर को विश्व खाद्य दिवस मनाया जाता है। इस दिवस को मानते हुए 4 दशक होने वाले हैं लेकिन भुखमरी, कुपोषण एवं खाद्य सुरक्षा को लेकर अपेक्षित परिणाम देखने को नहीं मिले है। विश्व के तकरीबन 1.3 अरब लोग आज भी गरीबी के दलदल में फंसे हुए हैं। यदि गरीबी और भुखमरी के मोर्चे पर भारत की बात की जाये तो यहाँ की भी स्थिति को संतोषजनक नहीं कहा जा सकता है। ताजा वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक के मुताबिक 2006 से 2016 के बीच 27.1 करोड़ लोग गरीबी से मुक्त हुए हैं लेकिन इसके बावजूद आज भी करीब 37 करोड़ लोग गरीब हैं।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दुनिया में इस समय भूखे सोने वाले लोगों की कुल संख्या 79.5 करोड़ है जिसमें से 19.4 करोड लोग भारत में रहते हैं। उपरोक्त आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि पूरी दुनिया के एक तिहाई गरीब एवं एक चौथाई भूखे व्यक्ति भारत में रहते हैं। यह बड़ी विडम्बना की बात है कि एक ओर साल दर साल देश में खाद्यान्न का उत्पादन रिकॉर्ड स्तरों को छू रहा है वहीं दूसरी तरफ देश की एक बड़ी आबादी को भूखे पेट सोने को मजबूर होना पड़ रहा है। देश में खाद्यान्न की बर्बादी और करोड़ों लोगों के समक्ष भुखमरी की विवशता की स्थिति को देखते हुए ही कुछ वर्ष पूर्व सुप्रीम कोर्ट ने तत्कालीन यूपीए सरकार को सलाह दी थी कि अन्न को सड़ाने से अच्छा है कि उसे गरीबों में बांट दिया जाए। यह और बात है कि सरकार ने उस सलाह को दरकिनार कर दिया था।

बहरहाल, मौजूदा स्थिति यह है कि प्रतिवर्ष सरकार का खाद्यान्न भंडार बढ़ता जा रहा है और उस अनुपात में उनका वितरण नहीं हो रहा है। ऐसे में सरकार को दो उपायों पर एक साथ काम करने की जरूरत है। एक तरफ उसे खाद्यान्न भंडारण क्षमता में पर्याप्त वृद्धि करनी चाहिए ताकि अन्न की बर्बादी का सिलसिला रुक सके। दूसरी तरफ सार्वजनिक वितरण प्रणाली में मौजूद भ्रष्टाचार और अन्य खामियों को दूर करते हुए जरूरतमंदों तक अन्न की आपूर्ति सुनिश्चित करनी चाहिए।

सच यह है कि खेती-किसानी और गरीबों से जुड़ी समस्याओं को लेकर सरकारें कभी गंभीर पहल नहीं करतीं। शायद यही वजह है कि अनाज की बबार्दी को रोकने के मसले पर औपचारिक कवायदों से आगे बात अभी तक नहीं बढ़ पाई है। भारत में भी भुखमरी एवं गरीबी उन्मूलन के लिए एक नहीं अपितु अनेक सरकारी योजनाएं संचालित हो रही हैं। लेकिन फिर भी कोई सकारात्मक परिणाम नजर नहीं आ रहे हैं। यह विचारणीय प्रश्न है कि आखिर हमारी योजनाओं में क्या कमी है, जो हम गरीबी एवं भुखमरी के उन्मूलन में नाकामयाब हो रहे हैं। दरअसल सरकार ने निर्धनता उन्मूलन के लिए जो योजनाएं चलाई हैं उनमें भ्रष्टाचार का घुन लगा हुआ है। जिस कारण आम तौर पर इसका लाभ गरीबों को नहीं मिल पाता। जरूरत है इन अनियमितताओं पर शिकंजा कसने की तभी देश के प्रत्येक व्यक्ति की थाली में दो वक्त की रोटी पहुंच पायेगी और उनके चेहरे पर मुस्कान आयेगी।

 

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