सम्पादकीय

सपा और बसपा का नया पैंतरा

SP and BSP

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी व बहुजन समाज पार्टी ने गठबंधन करने के साथ-साथ कांग्रेस व भाजपा से दूरी बनाकर नए राजनैतिक समीकरण बना दिए हैं। गठबंधन ने भले ही अमेठी व बरेली की सीट कांग्रेस के लिए छोड़ दी है लेकिन मायावती का कांग्रेस प्रति हमलावर रूख चुनावी हालातों को जटिल बना रहा है। कांग्रेस महागठबंधन के लिए प्रयत्नशील है। अभी चुनाव में डेढ़ महीने के करीब समय बाकी है और कुछ भी हो सकता है लेकिन ताजा हालात भाजपा व कांग्रेस दोनों के लिए सिरदर्दी वाले हैं।

मायावती का कहना है कि कांग्रेस को देश आजमा चुका है। दरअसल बसपा को अभी तीसरे विकल्प की उम्मीद दिख रही है। उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा व राजनैतिक तौर पर महत्वपूर्ण राज्य है जिसने देश को कई बार प्रधानमंत्री दिए हैं। मौजूदा समय में भाजपा के पास सबसे अधिक सीटें (72) हैं लेकिन दो हलकों में लोक सभा उप-चुनाव में बसपा सपा को प्राप्त सफलता ने दोनों पार्टियों को मजबूती के साथ-साथ उत्साह दिया था। उधर बंगाल में ममता बनर्जी भी फिलहाल चुपचाप राजनीतिक गतिविधियां देख रही हैं।

इन दोनों राज्यों में सीटों की गिनती 122 बनती है। उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर का फैक्टर बसपा को भाजपा से अलग चलने के लिए माहौल बना रहा है। ममता बनर्जी खुद दिल्ली के लिए इच्छा रखती हैं। उनका रवैया किसी गठबंधन का हिस्सा बनने की बजाय गठबंधन का नेतृत्व करने का है। भले ही कोलकाता रैली में 21 पार्टियों के वरिष्ठ राजनेता पहुंचे थे, लेकिन यह रैली किसी महागठबंधन का रूप धारण नहीं कर सकी। टीएमसी ने 42 सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं, जिससे राज्य में गठबंधन की गुंजाईश खत्म हो गई है और अब चुनाव के परिणामों के बाद ही किसी गठबंधन की गुंजाईश पैदा हो सकती है।

यूं भी तीसरे फ्रंट का अनुभव हो चुका है, जो नाकाम साबित हो रहा है। तीसरे मोर्चो के कारण राजनैतिक अस्थिरता का माहौल बना हुआ है। एक सरकार में दो सालों में दो प्रधानमंत्री बने फिलहाल गठबंधन न हो सकने का बड़ा कारण सत्ता की भूख है। कभी गठबंधन का हिस्सा रही पार्टियों के नेता इस रणनीति पर चल रहे हैं कि यदि वह सरकार चलाने में सहायक हो सकते हैं तो खुद सरकार क्यों नहीं चला सकते। फिलहाल भाजपा बंगाल में टीएमसी के साथ टक्कर का मन बना चुकी है, कांग्रेस गठबंधन के लिए जद्दोज्ांहद कर रही है। राजनैतिक स्थिरता डावांडोल होती नजर आ रही है। गठबंधन की राजनीति कमजोर हो रही है।

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