लघु कथा : कर्ज

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सुनो मास्टर रामदीन! अब आपणा इस्तीफा दे दयो। आपकी उमर कोनी काम करण की। के बात मास्टर साहब मैं तो बालकां नै जी-जान तै पढ़ाऊं सू। अर मेरे बढ़िया नतीजे आवैं सैं। रामदीन रटैर होंया पाछै एक प्राइवेट स्कूल मैं लाग्या था।

उसकी आँख्यां आगै अंधेरा होग्या-घर आली की दवा-दारू रोटी-पाणी क्यूकर चालैगा? पिलसन तो कर्जा तारण में जावै सै, खेत-क्यार अर सारी उम्र की कमाइ्र चार बेटियां अर बेटयां पै लदी। के सोचै सै रामदीन? आजकल अंग्रेजी का जमाना सै इस स्कूल ताई पूरा अंग्रेजी बणान की सोचां सां। स्टाफ तो बदलना ऐ पड़ेगा।

रामदीन नै पैन ठाया। बैहर चर्र-चर्र सी कोई गाड़ी रूकी। एक गबरू सूथरा छौरा भीतर आया। रामदीन तै देखकै उसके पायं मैं झुक ग्या। गुरु की अ‍ैंख्या मैं आंसू। सारी बात का बेरा पाट्टया तो गबरू विवेक बोल्या-मेरे गुरुजी उसे तरियां रहवैंगे अर उनकी तन्ख्वाह तीन गुणी कर दयो, ये बालकां नै जरूर पढ़ावैंगे। आज शिष्य ने गुरु का थोड़ा कर्ज चुका दिया था।
-रेनू शर्मा, रादौर (यमुनानगर)

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