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रूहानियत के सच्चे रहबर शाह सतनाम सिंह जी महाराज

Shah Satnam Singh Ji Maharaj

युग बीत जाएं तब भी वो अल्लाह, गॉड, वाहेगुरू, खुदा, रब्ब, एक था, एक है और वो एक ही रहेगा, और सच्चाई यह भी है कि

वदल दी मय हकीकी नहीं,
पैमाना वदलदा रहिंदा।
सुराही वदलदी रहंदी,
मयखाना वदलदा रहन्दा।

दिन, महीना, साल, दिन-रात, मौसम, समय स्थान बेशक बदल जाएं और बदलते रहते हैं परन्तु मय हकीकी, राम नाम का नशा वो अमृत आबोहयात, वो ओम, हरी, वो मालिक का नाम सबके अंतर ह्रदय में निरंतर चल रहा है, एकरस चल रहा है, सच्चे रहबर पूज्य परम पिता शाह सतनाम जी महाराज ने मानव जगत को यह आसान भाषा में समझाया। इतना ही नहीं पूजनीय परम पिता जी ने इंसानियत के भले के लिए दिन रात सत्संगों व सेवा कार्यों के माध्यम से मानव मात्र को आपस में व ईश्वर से जोड़ा। आप जी ने मानवता के उत्थान, समाज की भलाई, समाज के सुधार, पाखंड आदि कुरीतियों से रहित समाज के निर्माण का जो बीड़ा उठाया था, उस दिशा में लोगों को सफलतापूर्वक आगे बढ़ने के लिए उत्साहित भी किया। आपजी की पावन प्रेरणाओं के चलते डेरा सच्चा सौदा की साध-संगत, सामाजिक कुरीतियों, पाखंडवाद से मुक्त होकर आज सुखमय जीवन जी रहे हैं। समाज भी इससे प्रेरणा ले रहा है।

सच्चा सौदा सुखदा राह, सब बंधना तो पा छुटकारा, मिलदा सुखदा साह।

सृष्टि कभी भी संतों से खाली नहीं होती। हर युग व हर समय में परम पिता परमात्मा के संत या यह कहें कि स्वयं परमेश्वर संतों के रूप में सृष्टि पर अवतरित होते रहते हैं, मौजूद रहते हैं। संसार में जीने के लिए धर्म मर्यादाएं, जीवन के कायदे कानून, प्रकृति के नियम संत महापुरूषों ने ही इंसान को बताए हैं और संसार का संचालन इन्हीं नियमों, धर्म मर्यादाओं के अनुरूप है। धर्मों से संत नहीं बल्कि संतों से ही धर्म हैं और सभी धर्म अल्लाह राम, वाहेगुरू, गॉड, परमेश्वर के सहारे हैं अर्थात संत, गुरु, महापुरूषों के आसरे हैं। जीव-जगत के मार्गदर्शन के लिए परमेश्वर ने एक पर्दा बनाया यानि उसने इंसान के शरीर को चुना है।

ब्रहम बोले काया के ओहले।

खान-पान, रहन-सहन, बातचीत सबकुछ इन्सानों के जैसा, बाहरी तौर पर ईश्वरीय रूप की कोई निशानी नहीं। इन्सानों की तरह मलमूत्र, पांच तत्व की देह में ही संत रहते हैं। क्योंकि इन्सान को इन्सान ही समझा सकता है अत: संत इन्सानी रूप में रहते हुए मनुष्यों को सांसारिक बंधनों से मुक्ति व प्रभु परमात्मा से जोड़ने का काम करते हैं।

रूहानियत के सच्चे रहबर

पूजनीय परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज का 100वां अवतार दिवस

परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज ने खुद-खुदा होते हुए भी अवतार धारण कर अधिकारी रूहों को मालिक से जोड़ने का काम किया। यानि खुद आपजी गांव श्री जलालआणा साहिब, तहसील डबवाली वर्तमान में (कालांवाली) जिला सिरसा के रहने वाले थे। आप जी ने आज ही के दिन 25 जनवरी 1919 को पूज्य माता आसकौर जी की पवित्र कोख से पूज्य पिता सरदार वरियाम सिंह जी सिद्धू के घर इकलौती संतान के रूप में अवतार धारण किया। ईश्वरीय स्वरूप पूज्य परम पिता जी के पावन अवतार धारण करने के वक्त जुड़ा एक दिलचस्प वाक्य है। पूज्य पिता वरियाम सिंह जी सिद्धू गांव के जैलदार और बहुत बड़ी जमीन जायदाद के मालिक थे और घर में किसी भी चीज की कोई कमी नहीं थी। हर दुनियावी सुख सुविधा घर में उपलब्ध थी परन्तु उन्हें एक पीड़ा थी। वह थी संतान की कमी।

पूज्य सरदार वरियाम सिंह जी धार्मिक विचारों के धनी थे, गरीबों, जरूरतमंदो ंकी मदद भी बराबर की जाती थी, समाज भलाई के कार्यों में भी खूब सहयोग किया जाता, धर्म मर्यादा में पूरी आस्था थी और साधु – संतों के प्रति भरपूर आदर सम्मान व सेवा भाव था। दरवाजे से कभी कोई खाली नहीं लौटाया जाता था। एक बार पूज्य माता-पिता जी की मुलाकात रब्ब के सच्चे फकीर से हुई। वो फकीर पूज्य माता-पिता की जी के साधु स्वभाव और सच्चाई व ईमानदारी की सेवा भावना से बहुत खुश थे। वो जब तक गांव श्री जलालआणा साहिब में रहे भोजन – पानी केवल यहीं पर इसी घर से ही लिया करते थे। उस फकीर – बाबा ने पूज्य माता-पिता जी से कहा भाई भगतो।

आपकी सेवा परमेश्वर को मंजूर है। परमेश्वर आपकी मनोकामना जरूर पूरी करेंगे। आपके घर कोई महापुरूष ही जन्म लेगा। और इस तरह पूज्य माता-पिता जी के विवाह के 17-18 वर्ष के बाद उस फकीर बाबा की दुआ से पूज्य परम पिता शाह सतनाम जी महाराज के रूप में पुत्र रत्न की दात प्राप्त हुई और पुत्र रत्न भी ऐसा कि प्रत्यक्ष ईश्वर का नूर। पूरे गांव में खुशियां मनाई गई। गुड़, शक्कर, मिठाईयां (रीति-रिवाज के अनुसार) थाल भर-भर बांटी गई तथा अन्न-वस्त्र भी जरूरतमंदों को खूब बांटे गए। वो फकीर भी आए।

उन्होंने आदरणीय जैलदार साहिब (सरदार वरियाम सिंह जी) को बधाई देते कहा कि आपका बेटा एक अद्भुत शक्ति हैै और ये आपके पास करीब चालीस वर्ष तक ही रहेंगे। जलालआणे में आया नूरे जलाल शहनशाही नूरी बाल मुखड़े को जो भी देखे, देखता ही रह जाए, नूरी मुखड़े से नजर हटाने का दिल ही ना करे। एक झींवर भाई की मिसाल भी यहां प्रस्तुत है। वो रोजाना घर में पानी भरने आता था और परम पिता जी के बाल्यकाल को पालणें के पास घंटों तक खड़े रहकर दीदार करता। एक दिन पूज्य माता जी ने ऐसे टकटकी लगाकर खड़े उस भाई को टोक भी दिया कि तुम रोजाना इतनी-इतनी देर तक क्या देखते हो? उस भाई ने नम्रता पूर्वक उत्तर दिया माता जी, आपजी के लाडले में मुझे ईष्टदेव (परमेश्वर) के दर्श-दीदार होते हैं। मैं किसी गलत-भावना से नहीं श्रद्धापूर्वक दीदार करता हूं।

ऐसी ही एक और भी घटना वर्णनीय है, जब पूज्य माता जी ने किसी साधु-स्वभाव शख्स को अपने लाडले के पालणे के पास खड़ा पाया तो तुरंत आकर रीति रिवाज के अनुसार तवे से कालिख का काला टिक्का अपने लाडले को लगा दिया ताकि किसी की बुरी नजर लाडले का न लगे तो यह देखकर उस साधु ने आदर सम्मान के साथ माता जी से कहा, माता जी फकीरों की नजर नहीं लगा करती। उस बाबा ने कहा, माता जी, आपके बेटे के पांव में पूरा पद्म चिन्ह है। आपका बेटा कोई महान शख्सियत है। इनके दर्श-दीदार करके मुझे परम सुख का अहसास हुआ है।

पूज्य माता-पिता जी ने अपने लाडले का नाम सरदार हरबंस सिंह जी रखा और परम पूजनीय बेपरवाह शाह मस्ताना जी (डेरा सच्चा सौदा के संस्थापक) से मिलाप के बाद सरदार हरबंस सिंह जी से बदलकर आप जी का नाम सरदार सतनाम सिंह जी (पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज) हो गया।

दिव्य बाल्यकाल से ज्यों-ज्यों आप जी बड़े होते गए , आप जी के दिव्य प्रकाश का दायरा और बड़ा होता चला गया। अभी आप जी बाल्यावस्था में ही थे कि पूज्य पिता सरदार वरियाम सिंह जी परमात्मा में विलीन हो गए तो इस पर आप जी का बचपन पूज्य माता जी व आप जी के पूज्य मामा जी सरदार वीर सिंह जी(डेरा सच्चा सौदा में बतौर सत् ब्रह्मचारी सेवादार रहते हुए ओड़ निभा गए हैं) की देख-रेख में बीता। बाल्यकाल में परमपिता शाह सतनाम जी महाराज के खेल (बचपन की क्रीड़ाएं) भी ईश्वरीय ही थे। आपजी की बोलवाणी , हावभाव, चाल ढ़ाल, खेल कूद हर क्रिया व हर कार्य में ईश्वरीय अनूभूति झलकती थी तब भी स्नेही जन यही कहते कि ‘जैलदारा दा मुंडा (पूज्य परम पिता जी) कोई खास हस्ती हैं’।

कभी कोई निराश नहीं लौटाया

पूज्य माता जी के उत्तम संस्कारों का भी आपजी के पावन जीवन में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है। कोई भी दरवाजे पर आ गया कुछ पाने की आशा से, आप जी ने उसकी आशा से भी कहीं ज्यादा उसकी झोली में डाला। खाना खाने बैठते और कोई भूखा प्यासा अचानक आ गया तो पहले उसे तृप्त करते व बाद में स्वयं खाते। एक बार जमीदार भाई आए, जमीन तो बेशक कम थी, खेती कार्याें के लिए ऊंटनी(बोती) लेने की इच्छा थी, लेकिन आर्थिक मंदहाली के कारण संभव नहीं हो पा रहा था। वो शख्स पूज्य माता जी के पास इसी आशा से आया। पूज्य शहनशाह जी घर पर ही पूज्य माता जी के पास ही बैठे हुए थे।

उस समय सौ-पचास में अच्छी ऊंटनी मिल जाया करती थी। पूज्य परम पिता जी ने पूज्य माता जी से सौ रूपये दिलवा दिये कि जब तेरे से संभव हुआ तब लौटा देना। इस प्रकार करते-करते एक दो साल गुजर गए, वह जमींदार पैसे लौटा नहीं पाया, तब तक उसके घर बच्चा पैदा हो गया। अब खर्च और भी बढ़ गया उसके यहां एक भैंस व्यायी थी, घर में दूध घी की तो अब सख्त जरूरत थी लेकिन, दूसरी ओर सिर पर कर्ज का बोझ कैसे उतरे, पूज्य माता जी से उधार लिए पैसे चुका कर कैसे अपने आपको कर्ज मुक्त करे, रात-दिन यही चिंता भी उसे सताए जा रही थी। एक दिन उसने अपनी वह भैंस पूज्य माता जी के घर लाकर खूंटे पर बांध दी,

हालांकि पूज्य माता जी ने बहुत मना किया, लेकिन उसने अपनी बेबसी जाहिर करते हुए विनती की कि माता जी पैसा घर में खर्च हो गया और बन नहीं पा रहा इसलिए यह भैंस से कर्ज चुकता कर रहा हूं। पूज्य पिता जी उस समय घर पर नहीं थे। आने पर पता चला तो तुरंत उसे बुलवा कर समझाया कि यह तूने यह क्या किया। घर में तुम्हारी पत्नी को दूध की जरूरत है, छोटा बच्चा है, कोई बात नहीं । हमारे पैसे नहीं आएंगे तो कोई बात नहीं लेकिन ये हम नहीं सह सकेंगे। तुम्हारा बच्चा है, क्या वो हमारा कुछ नहीं लगता? इस प्रकार पूज्य परम पिता जी ने अपने दयालु स्वभाव के द्वारा उस भाई का मनोबल बढ़ाया साथ ही भैंस लौटा भी दी एवं और भी मदद का भरोसा दिया।

यूं ही एक अन्य परिवार में बेटी की शादी थी। परिवार अति चिंतित था कि कैसे संभव हो पाएगा। आखिर वह परिवार भी पूज्य माता जी के पास मदद के लिए आया कि शादी का दिन नजदीक है और घर में कुछ भी नहीं हो पाया है। पूज्य पिता जी उस समय भी घर पर ही मौजूद थे, पूज्य माता जी अभी कुछ कहते, आप जी ने पूज्य माता जी से आग्रह किया कि माता ये लोग कितने रूपये चाह रहे हैं, इन्हें चाहे गए से दो सौ ज्यादा ही दे देना, कारज पूरा होने पर बच गए तब वापिस दे जाएंगे। नहीं भी लौटाएं तो माता जी, यह समझ लेना कि यह मेरी बहन की शादी है। आप जी की इस दयालुता व हमदर्दी से उस परिवार को कितना सुकून कितनी खुशी मिली होगी, वो ही जानते हैं?

इन्सान तो इन्सान, पशु-पक्षी परिंदे, जानवर भी आपजी के ईलाही, दयालु स्वभाव की छूअन (स्पर्श) से धन्य-धन्य हो गए। पढ़ाई आदि पूरी करने के बाद पूज्य माता जी ने एक दिन आपजी की ड्यूटि खेत में फसल की रखवाली के लिए लगा दी। पशु जानवर फसल का नुक्सान कर दिया करते थे। वहां एक भैंसा था जो आपजी के खेत में फसल चरता और वहीं पर बैठकर आराम करता था।

आपजी उसे रोजाना देखते, लेकिन हटाया कभी नहीं। आप जी अपनी धुन में मगन रहते और वह फसल चर-चराकर आपजी के ही पहलू में आकर बैठ जाया करता। एक दिन यह शिकायत पूज्य माता जी के पास भी पहुंच गई। इस पर आपजी ने उस भैंसे को प्यार से सहलाया और यह भी वचन किये कि भाई भगत अब तो अपनी शिकायत हो गई है। अब तू घूम फिर के चर लिया कर (बजाय किसी एक खेत में चरने के)। बताते हैं कि उस दिन के बाद उस भैंसे को जब तक वह जीवित रहा, कभी किसी ने किसी एक खेत में रूककर चरता नहीं देखा था।

सामाजिक कार्यों में प्राथमिकता:-

परमार्थी व पारिवारिक कार्यों के साथ-साथ आपजी सामाजिक कार्यों में भी बढ़-चढ़कर सहयोग करते। गांव के हर सांझे कार्य को आपजी ने अपनी निजी दिली लगन से पूरा करवाया। स्कूल, हस्पताल, पशुओं की डिस्पेंसरी, सड़क बिजली, पानी आदि हर सार्वजनिक कार्य के लिए आप जी ने दिन-रात एक किया। गांव के बीचों-बीच गुरुद्वारा साहिब की स्थापना का कार्य पूज्य माता जी की प्रेरणा से आपजी ने अपनी हक-हलाल की कमाई से ही शुरू करवाया भले ही तब अधिकतर गांव वासियों ने भी अपनी-अपनी हैसियत से इस कार्य में तन-मन-धन का सहयोग किया लेकिन आप जी की सच्चाई, ईमानदारी, कर्मठता, सच्ची भावना कार्यों के प्रति सच्ची लगन का हर शख्स कायल था और इसीलिए हर पंचायती कार्य में आपजी को ही मुखिया रखा जाता था।

शाह मस्ताना जी महाराज का मिलाप:-

पारिवारिक ,सामाजिक, खेतीबाड़ी आदि हर क्षेत्र में अपनी जिम्मेवारियों को सफलता पूर्वक निभाकर आपजी ने अपने गांव श्री जलालआणा साहिब में ही नहीं, बल्कि पूरे इलाके में एक मिसाल स्थापित की। इलाका भर के सभी लोग ही मानते थे कि ‘जैलदारां दा काका’ (पूज्य परम पिता जी) आम जन की तरह नहीं है, कोई खास हस्ती हैं। क्योंकि आप जी को हर कार्य में मुहारत ईश्वरीय बख्शिश, हासिल थी, चाहे कार्य खेतीबाड़ी का हो या कोई इंजिनियरिंग का अर्थात दुनिया भर के चाहे किसी भी क्षेत्र का कार्य होता, आप जी उसे बाखूबी से कर लिया करते, बल्कि दूसरों को भी गार्इंड करते, समझाते और उत्साहित भी करते। आप जी की प्रेरणा से लोगों के कठिन से कठिन कार्य भी उनके लिए आसान हो जाते। इस प्रकार आप जी की कार्यकुशलता आपजी की सच्चाई, ईमानदारी, कर्मठता आदि गुणों के कारण आप जी गांव जलालआणा के निवासियों के दिलों में बस गए थे।

सच की तलाश आप जी को बचपन से ही थी। लेकिन अब वह समय भी आ गया था, जो एक फकीर बाबा ने आप जी के बारे मे पूज्य माता-पिता जी को पहले ही कह दिया था कि आप का बेटा ईश्वर की दिव्य ज्योति हैं। ये आपके पास तो करीब चालीस वर्ष तक ही रहेंगे और फिर अपने असल उद्देश्य (मानवता व समाज के उद्धार) के लिए चले जाएंगे। इसी कड़ी के तहत यानि सच की तलाश में आप जी डेरा सच्चा सौदा के संस्थापक पूजनीय बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज के सत्संग में पधारे। वर्णनीय है कि बेपरवाह मस्ताना जी महाराज के अजब-गजब रूहानी खेलों के बारे में आपजी काफी कुछ पहले ही सुन व जान चुके थे।

बेपरवाह सार्इं जी की पावन हजूरी में बैठकर बेपरवाही वचनों एव्ां नूरानी-स्वरूप को इतना करीब से पा कर अंदर-बाहर से आप जी को पूर्ण संतुष्टि हो गई कि ‘असल मंजिल यहीं है।’ बस उसी दिन से ही आप जी ने अपने आप को पूर्ण तौर पर पूज्य बेपरवाह जी के अर्पण कर दिया। जहां भी बेपरवाह जी का सत्संग होता (हरियाणा, पंजाब-राजस्थान तब तो हरियाणा-पंजाब अलग-अलग राज्य नहीं थे।) आपजी अपने साथियों सहित हर सत्संग में पहुंचते।

इस दौरान आप जी के साथ वालों ने तो पूज्य साईं जी से नाम शब्द की दात ग्रहण कर ली थी, लेकिन बेपरवाह जी आप जी को हर बार यह कहकर नाम लेने वाले अधिकरी जीवों में से उठा दिया करते कि अभी आप जी को नाम लेने का हुक्म नहीं हुआ है और जब हुक्म हुआ आपको आवाज देकर, आपजी को बुलाकर नाम देंगे। इस प्रकार आप जी लगभग तीन साल तक बेपरवाह जी का सत्संग करते रहे।

रब्बी स्वरूप को जाहिर करना:-

यह तो शुरू से ही जाहिर था कि श्री जलालआणा साहिब में जैलदारों (पूज्य पिता वरियाम सिंह जी) के घर पूज्य परम पिता जी शाह सतनाम जी महाराज के स्वरूप में ईश्वरीय नूर से भरपूर चांद प्रकट हुआ है, लेकिन अब आप जी के नूरी स्वरूप को जग-जाहिर करने का भी समय आ गया था और पूज्य बेपरवााह जी ने इस संबंध में समय-समय पर इशारे पहले ही कर दिए थे। पूज्य बेपरवाह जी के अनुसार:- ‘ये रब्ब की पैड़ है’, ‘वरी, आओ भई तुम्हे रब्ब की पैड़ दिखाएं,’ पूजनीय, बेपरवाह सार्इं मस्ताना जी महाराज ने एक बार रास्ते पर पड़े शाह सतनाम जी महाराज के पदचिन्ह पर अपनी लाठी से गोल दायरे का निशान बनाकर साथ जा रहे सेवादारों से मुखातिब हो फरमाया था। तब पूज्य सार्इं जी, वहां किसी गांव में सत्संग करने पधारे थे।

शहनशाह जी ने फरमाया देखो भई ये रब्ब की पैड़ है। पूर्ण रूहानी फकीर के वचन भागो-नसीबों वालों के ही समझ में पड़ते हैं। उनमें से कईयों ने कुछ और कइयों ने कुछ अलग-अलग अपनी राय (अपनी-अपनी मति के अनुसार) रखी और एक ने कहा कि ये पैड़ (पद चिन्ह) तो श्री जलालआणा साहिब के जैलदार वरियाम सिंह जी के बेटे सरदार हरबन्स सिंह जी की है। तब सार्इं जी ने अपने इलाही अंदाज में फरमाया, न हम किसी जैलदार को जानते हैं न किसी सरदार को जानते हैं।

हम तो यह जानते हैं कि ये पैड़ (पद चिन्ह) रब्ब की है। पूजनीय बेपरवाह मस्ताना जी महाराज ने डेरा सच्चा सौदा ‘अनामी धाम’ गांव घूकांवाली में 14 मार्च 1954 को सत्संग फरमाने के बाद उसी सत्संग वाले चबूतरे पर खड़े होकर पूज्य परम पिता जी को स्वयं आवाज लगाकर आदेश फरमाया, ‘हरबन्स सिंह!’ पूज्य परम पिता शाह सतनाम जी महाराज का पहले का नाम, दरगाह से आज आप जी को भी नाम-शब्द लेने का हुक्म हो गया है।

आप अंदर जाकर (नाम अभिलाषी जीवों में) हमारे मूढ़े के पास बैठो, असीं अभी आते हैं। आप जी ने अपने मुर्शिदे-कामिल के वचनों को सत्वचन कहकर अंदर चले गए लेकिन मूढ़े के पास जगह खाली न होने के कारण आपजी उन नाम-अधिकारी जीवों में पीछे ही बैठ गए। पूज्य बेपरवाह जी ने आप जी को आवाज देकर अपने मूढ़े के पास बिठाया और ये ईलाही वचन फरमाया, ‘‘आप को जिन्दाराम का लीडर बनाएंगे जो दुनिया को नाम जपाएगा।’’ सच्चाई तो हमेशा अटल है, पता समय आने पर चलता है। तब ही नाम शब्द देने के बहाने बेपरवाह जी ने पूज्य परम पिता जी की ईलाही ताकत को पूरी दुनिया के सामने प्रकट कर दिया।

गुरुगद्दी बख्शिश:-

पूजनीय बेपरवाह मस्ताना जी महाराज ने पूजनीय परमपिता जी के बारे में स्पष्ट ईशारा तो पहले ही कर दिया था कि ये (पूज्य परम पिता जी) ही हमारा स्वरूप हैं और दुनिया के सामने ईश्वरीय मर्यादाओं को भी निभाना जरूरी था। आप जी साध-संगत के आग्रह पर श्री जलालआणा साहिब में स्थापित डेरा सच्चा सौदा मस्तपुरा धाम (पूर्व नाम) के उद्घाटन पर पधारे। उन दिनों बेपरवाह जी 18 दिन तक श्री जलालआणा साहिब में रहकर आप जी की परीक्षा लेते रहे। सख्त से सख्त परीक्षा।

पूरी-पूरी रात को सारा-सारा दिन पूज्य बेपरवाह जी ने आप जी सेवा में लगाए रखा। आप जी ने अपने पीरों-मुर्शिदे कामिल के हर वचन, हर रजा को सत्वचन कहकर फू ल चढ़ाए। बेपरवाह सार्इं जी के लिए तो आप जी करोड़ों-अरबों में एक थे। बेपरवाह जी के ईलाही खेल थे,ताकि दुनिया को भी समझ पड़े कि गुरुमुखता क्या होती है? गुरु और गुरु का वचन क्या होता है? गुरु व शिष्य का रिश्ता क्या होता है? आयु का 40 वां वर्ष और वो फकीर बाबा के वचन कि चालीस साल तक ही रहेंगे विधिनुसार तत्पश्चात एक दिन आपजी को अपनी हवेली (अपना मकान) तोड़ने और घर का सारा सामान सूई तक भी डेरा सच्चा सौदा सरसा में लाने का हुक्म हुआ।

सांई जी का हुकुम था सो किंतु-परंतु का कोई मतलब ही नहीं। सब्बल, कुदाल, फावड़ा लिया हाथों-हाथ मकान को तोड़ना गिराना शुरू कर दिया। कोई लोक- लाज नहीं। कोई कुछ भी कहे, कोई परवाह नहीं। हवेली की एक-एक र्इंट (छोटे टुकड़े तक भी) घर का सारा सामान आप जी खुद ही ऊंट गाड़ियां, ट्रेक्टर-ट्रालियां व ट्रक आदि भर-भर कर डेरा सच्चा सौदा में ले आए। सामान का पहाड़ जितना ढ़ेर लगा दिया। इस पर एक और सख्त आदेश हुआ कि जिसका भी सामान है अभी बाहर निकालो, चाहे जहां भी रखो और अपने सामान की राखी करो।

कोई हमें पूछेगा तो हम क्या जवाब देंगे? कि असीं लोगों के घर गिरवाते, मकान तुड़वाते है? सत वचन! ये भी मंजूर है। आप जी ने अपना सब कुछ अपने मुर्शिद प्यारे के मात्र एक हुक्म, एक ईशारे पर कुर्बान कर दिया। तत्पश्चात आपजी ने स्वयं अपने हाथों से एक-एक चीज (मोटर-साइकिल तक) कृषि यंत्र आदि हर चीज सतगुरु प्यारे की एक खुशी के लिए साध-संगत में बांट दी और निश्चिंत होकर अपने प्यारे के दर्श-दीदार करने के लिए पावन हजूरी में आकर बिराजमान हो गए। वास्तव में सतगुरू प्यारे की यही रजा थी। आप जी अपने एक शब्द में भी फरमाते हंै-:

प्रेम वाला रोग शाह सतनाम
जी की वेखेया,
अपणी कुल्ली नू हथी अग लाके सेकेया।
कर ता हवाले वैद्य शाह मस्तान जी ते।।

आत्मा से परमात्मा :-

सच्चे पातशाह सार्इं बेपरवाह मस्ताना जी महाराज ने सरेआम संगत में वचन फरमाया कि सरदार हरबंस सिंह जी को आज से सरदार सतनाम सिंह जी (परम पिता शाह सतनाम) किया। उन्हें आत्मा से परमात्मा बना दिया है। सतनाम वो ताकत, जो खण्डो, ब्रह्मांडों को सहारा दिये खड़ी है। सारे खण्ड-ब्रह्मंड जिनके सहारे हंै ये वो ही सतनाम हैं। दिनांक 28 फरवरी 1960 को बेपरवाह सार्इं जी ने आपजी को पूर्ण गुरू मर्यादा पूर्वक डेरा सच्चा सौदा में दूसरे पातशाह के रूप में अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।

आपजी को सिर से पांवों तक नोटों के लम्बे -लम्बे हार पहनाए गए और एक डेकोरेटड गाड़ी (जीप) में विराजमान कर पूरे सरसा शहर में प्रभावशाली जुलूस के रूप में घुमाया। तमाम साध-संगत उस बेपरवाही जुलूस में साथ थी ताकि दुनिया को भी पता चले कि पूज्य बेपरवाह जी ने पूज्य परम पिता जी को गुरूगद्दी प्रदान कर डेरा सच्चा सौदा में बतौर दूसरे पातशाह विराजमान किया है।

उपरांत पूज्य बेपरवाह जी ने आपजी को डेरा सच्चा सौदा में विशेष तौर पर बनाई गई तीन मंजिला शहनशाही ‘अनामी गुफा’ में सुशोभित कर वचन फरमाये कि ‘न ये हिल सके और न ही कोई हिला सके सार्इं जी ने फरमाया, असीं अपने प्यारे मुर्शिद सार्इं सावण शाह दातार के हुकुम से सरदार सतनाम सिंह जी को आत्मा से परमात्मा कर दिया है। ये अनामी गुफा सरदार सतनाम सिंह जी को असीं इनकी कुर्बानी के बदले ईनाम में दी है, वरना हर कोई यहां रहने का अधिकारी नहीं है। और उसी दिन से बेपरवाह जी ने आपजी को अपने साथ ही शाही स्टेज पर बिठाया।

डेरा सच्चा सौदा दिन-दोगुनी रात चौगुनी बुलंदियों की ओर

पूजनीय परम पिता जी डेरा सच्चा सौदा में सन 1960 से 1990 तक दूसरे पातशाह के रूप में बिराजमान रहे इस दौरान (30 वर्षों में) आप जी ने अपने मुर्शिदे कामिल बेपरवाह मस्ताना की महाराज द्वारा स्थापित डेरा सच्चा सौदा रूपी रूहानी बाग को अपने रहमो कर्म से ऐसा प्रफुल्लित किया कि इसकी महक पूरे विश्व में पहुंच रही है। आपजी का एक-एक पल डेरा सच्चा सौदा व साध-संगत के विस्तार तथा सेवा संभाल के प्रति समर्पित रहा।

आपजी ने पंजाब, हरियाणा, राजस्थान व उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में दूर-दूर तक गांवों- शहरों, कस्बों में हजारों सत्संग लगाकर ग्यारह लाख से भी ज्यादा लोगों को राम-नाम मालिक की भक्ति से जोड़कर उन्हें नशों आदि बुराइयों से मुक्त किया तथा समाज में उन्हें सम्मानपूर्वक स्थान प्रदान किया। जो लोग नशों आदि बुरी आदतों के कारण गंदगी के घर बन चुके थे, आप जी की प्रेरणा से आज वो दूसरों के लिए प्रेरणा बने हुए हैं। आप जी ने संदेश दिया कि परमात्मा एक है, जिसे पाने के लिए सच्चे गुरु की शिक्षा पर अमल जरूरी है।

साध-संगत के प्रति आपजी के परोपकार अवर्णनीय है वहीं स्वस्थ मानवीय समाज की स्थापना के लिए भी आप जी का महान योगदान है। आपजी ने डेरा सच्चा सौदा में बिना दान दहेज की स्वस्थ परम्परा चलाई जो आज भी ज्यों की त्यों चल रही है यानि परिवारों की आपसी सहमति से नौजवान युवक-युवतियां दिलजोड़ माला पहनाकर शादी के बंधन में बंधते हैं।

आपजी ने साध-संगत को रूढ़िवादी कुरीतियों लोक-दिखावे के रस्मों-रिवाज (बुजुर्गों की मृत्यु पर व बच्चों के जन्म पर) फिजूलखर्ची के विरूद्ध जागरूक किया। छोटा परिवार सुखी-परिवार, परिवार को सीमित रखने, बच्चों को अच्छी शिक्षा, अच्छी सम्भाल की इन पावन शिक्षाओं को डेरा सच्चा सौदा की साध-संगत अपनाकर अपने व परिवार के उज्जवल भविष्य के प्रति कर्मशील है और देश व समाज के लिए परम पिता जी का यह महान कर्म है।

इस जन्म में ये दो काम करो,
एक ना जपो और प्रेम करो।
किसी जीव का दिल न दुखाना कभी,
मौत याद रखो, मालिक से डरो।
आप जी की ऐसी पाक पवित्र शिक्षाएं पूरे विश्व में अनुपम उदहारण हैं।

हम थे, हम हैं और हम ही रहेंगे (अर्थात एमएसजी)

आप जी ने 23 सितम्बर 1990 को गुरगद्दी बख्शिश पंरपरा में भी नया इतिहास रच दिया। आप जी 15 महीने तक हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां के साथ स्टेज पर विराजमान रहे। इस ऐतिहासिक दिन पर पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां को डेरा सच्चा सौदा में तीसरे पातशाह (डेरा सच्चा सौदा का वारिस) के रूप में सुशोभित करके अपने इन वचनों को पूरा कर दिया कि पूज्य गुरु जी हमारा ही स्वरूप हैं यानि अब हम पूज्य गुरू संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां की पवित्र नौजवान बॉडी में साध-संगत की सेवा व संभाल करेंगे।

डेरा सच्चा सौदा के संस्थापक (पहले गुरु जी) शाह मस्ताना जी महाराज ने पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज को अपना स्वरूप बनाकर डेरा सच्चा सौदा की गुरुगद्दी पर विराजमान किया और इसी तरह पूज्य परम पिता जी ने पूज्य गुरु जी संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां को अपना स्वरूप प्रदान कर डेरा सच्चा सौदा की सेवा, संभाल का कार्यभार सौंप कर अपना वारिस बनाया। मानवता की सेवा की महान मिसालें पैदा कर आप जी 13 दिसम्बर 1991 को अनामी जा समाए। आपजी के वचन हैं हम थे, हम हैं और हम ही रहेंगे।

पूजनीय बेपरवाह मस्ताना जी की प्रेरणानुसार रूहानियत व इन्सानियत का संगम:- डेरा सच्चा सौदा सर्व धर्म संगम सभी धर्मों का सर्व सांझा दरबार है। पूज्य बेपरवाह जी ने रूहानियत के साथ-साथ समाज व मानव कल्याण इन्सानियत की भलाई की जो पवित्र शिक्षा का प्रचार व प्रसार आरम्भ किया था, उनकी ये पावन शिक्षाएँ आज पूरे विश्व में प्रचारित व प्रसारित हो रही हैं। समय और स्थिति के अनुरूप पूज्य गुरु जी ने समाज व इन्सानियत की भलाई के लिए 133 कार्य शुरू किए हैं।

जिन्हें मानवता भलाई के कार्यों के नाम से जाना जाता है। केवल यही नहीं पूज्य गुरु जी के पावन दिशा-निर्देशन में डेरा सच्चा सौदा में हर महीने जन-कल्याण परमार्थी कैम्प लगाकर हजारों मरीजों (गरीब-जरूरतमंदों) को बिल्कुल मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान की जाती हैं, वहीं हर साल फ्री नेत्र जांच, अपंगता निवारण (पालियो) कैम्पों का आयोजन करके इन बीमारियों से पीड़ित हजारों मरीजों को नि:शुल्क सहायता उपलब्ध करवाई जाती है। रक्तदान, पौधारोपण आदि सामाजिक कार्यों को गति प्रदान कर पूज्य गुरु जी ने पूरी दुनिया को इनके प्रति पे्ररित किया। 68-69 लाख पौधे एक ही दिन में लगाना, 42-43 हजार यूनिट रक्तदान करना, इसके अतिरिक्त जरूरतमंद गरीब-विधवाओं को मकान बनाकर देना ऐसे मजबूर परिवारों की बेटियों की शादी में मदद करना इत्यादि सभी 133 मानवता भलाई के कार्योें के द्वारा डेरा सच्चा सौदा व साध-संगत रात-दिन समाज व इन्सानियत की भलाई प्रति प्रयासरत हैं।

यही नहीं, पौधा रोपण, रक्तदान सहित अन्य भी कई समाज भलाई के कार्यों के लिए डेरा सच्चा सौदा के नाम दर्जनों वर्ल्ड रिकार्ड (गिनीज बुक आॅफ, वर्ल्ड रिकॉर्डस और लिम्का बुक आॅफ वर्ल्ड रिकॉर्डस में दर्ज हैं और करोड़ों लोग लगभग 6 करोड़ लोग डेरा सच्चा सौदा से गुरुमंत्र, राम नाम लेकर नशे आदि बुराइयों को छोड़कर पाक-पवित्र जीवन जी रहे हैं)इस प्रकार पूजनीय बेपरवाह मस्ताना जी महाराज , पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज की इन पावन शिक्षाओं की मुहिम पूज्य गुरु जी संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां के मार्गदर्शन में आज पूरे विश्व को महका रही हंै।

डेरा सच्चा सौदा में दी जा रही रूहानियत व इन्सानियत की पाक-पवित्र शिक्षा की पूरे विश्व में जय-जय कार हो रही है। सतगुरु कुल मालिक से यही दुआ है कि डेरा सच्चा सौदा दिन दुगुनी रात चौगुनी तरक्की करता हुआ जगत कल्याण की बुलंदियों को छूता चला जाए। 25 जनवरी 2019 को पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज के 100 वें पावन अवतार दिवस पर पूज्य गुरु जी को लख-लख सजदा व साध-संगत को बधाई हो जी।

 

 

 

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