लेख

व्यंग: भगवान हड़ताल पर हैं!

Satire: God is on strike!

भगवान हड़ताल पर हैं। चौंक गए न। आप डर रहे हैं, आप को किसी अनहोनी का खौफ खाए जा रहा है, बिल्कुल सच है। आपका डर वाजिब है, आप ही नहीं भगवान की हड़ताल से पूरा त्रिलोक हिल गया है। संविधान मौन है और विधान ने आंखों पर पट्टी बांध रखी है। भक्त गोलोक वासी हो रहे हैं। लेकिन सवाल भगवान की हड़ताल का है, किसकी जुर्रत आग से खेले। उफ! तौबा-तौबा सपने भी न आए ऐसे मुकाबले की बात। लोकतंत्र में धरती के भगवान का जमीर जाग गया है। वह अक्सर जागता रहता है। जब मर्जी में आता है, आला खंटी पर टंग जाता है। बेरोजगरी के मौसम में भी थोक भाव डाकिए त्यागपत्र लेकर पहुंच रहे हैं, लगता है बारिश का मौसम आने वाला है। पकौंडे तलने की गंध आने लगी है। बंग के साथ पूरे आर्यावर्त में हड़ताल पुराण का महाभारत पांच दिन से जारी है। धरती के भगवान का पद्माशन हिलने वाला नहीं है। उन्होंने प्रण कर लिया है तू ने दो का सिरफोड़ा हम कईयों को यमपुर पहुंचा कर दमलेंगे।

अपनी दुर्गा दीदी को चरणों में नतमस्तक करके ही दम लेना चाहते हैं। लेकिन दुर्गा भी इतनी आसानी से भगवान के चरणों में गिड़गिड़ाने वाली नहीं है। हड़ताल पुराण अजब मोड़ पर पहुंच गया है। सत्ता भगवान के श्रीचरणों का नमन करे या तमाशा यूं बरपता रहे और भक्त इस यज्ञ में प्राणों की आहुति देकर अपनी निष्ठा प्रदर्शित करता रहे। क्योंकि संविधान मौन है और विधान ने आंखों पर पट्टी बांध रखी है। फिर जिस देश में गंगा बहती है उसका क्या होगा जमूरे! होगा क्या उस्ताद! जैसे गंगा गंदगी साथ बहने की आदि हैं वैसे ही अपन का लोकतंत्र बह रहा है। बस! चुपचाप, देखते रहिए। कुछ न कहिए न कहवाइए। यह चुप-चाप, छाप-छूप का मंत्र है। समझबौ नहिं करते, बड़े बुड़बक हो।मानस मर्मज्ञ तुलसीदास जी ने लोकतंत्र की नब्ज रामराज्य में ही पकड़ लिया था, तभी तो उन्होंने लिख दिया था समरथ के नहिं दोष गुसाईं…। बात बंग के भगवानों तक सीमित रहती तो अपनी दुर्गा दीदी निपट लेती, लेकिन यहां तो बतंगढ़ सफदरगंज तक पहुंच गया है। बंग बनाम आल इन इंडिया हो गया है। आग कहीं सुलग रही और माचिस कोई दूसरा मार रहा है। फिर लड़िबो ना तो का करिबो।

अपन का लोकतंत्र बेमिसाल और बेहिसाब है। यहां सुविधा के अनुसार नियम बनाए और तोड़े जाते हैं। अपना मुलक बारहों महिने चौबीस घंटे और आठों याम चुनावियाना मोड़ में रहता है। जिसमें सभी डूबे रहते हैं फिर भगवान हों या भक्त। देखिए उपर वाले चतुर्भुजी चक्रशुदर्शनधारी, पितांबरधारी, कमल नयनों वाले भगवान से तो बेचारा भक्त निपट लेगा। क्योंकि उनकी फीस बहुत अधिक नहीं है। उनकी नाराजगी दूर करने भक्तों के पास बेहद आसान तरीका है। बस! प्रभु को मंदिर में पहुंच मन पसंद की मिठाई खिलाई, भोग चढ़ाया और चरणों में लेट सब नारियल फोड़ा वह खुश हो गए।

सारी गलतियां माफ और रास्ता साफ। लेकिन धरती के भगवानों की नाराजगी दूर करना मुश्किल है। क्योंकि उन्हें मोटी फीस चाहिए। उनके सामने झुकना होगा। क्योंकि वह अपनी शपथ तोड़ हड़ताल पर हैं। लेकिन भक्त को हड़ताल करने का अधिकार नहीं है। वह तो सर्वदा का सेवक है और रहेगा। क्योंकि लोकतंत्र के सबसे नीचले पायदान पर वह दबा, कुचला बेचारा है। वह केवल सांस छोड़ना जानता है, हड़ताल वह भी भगवान की हड़ताल में उसे सांस लेने का कोई अधिकार नहीं है। अगर वह हड़ताल पर आ आए तो क्या होगा। यह तो सरकार और भगवान ही बता सकते हैं।

भगवान चाहे कुछ भी करे सरकार आंखों पर पट्टी बांध लेती है। बचपन में हमने एक कहानी पढ़ी थी मंत्र। वह कहानी कोई भगवान पढ़ता तो शायद हड़ताल न करता। दुर्गा भगवानों का चरण बंदन कर लेंगी तो सब कुछ माफ और साफ हो जाएगा। लेकिन जिन भक्तों की जिंदगी हमेंशा के लिए विष्णुलोकवासी हो गयी है उनकी फरियाद कौन सुनेगा। उसके लिए तो सिर्फ एक ही अदालत है उपर वाले की। अपना भी लोकतंत्र अजब और गजब है। जहां चाहे, जब चाहे डमरु बजा जमूरे का खेल शुरू कर दीजिए। आपको कोई रोकने-टोकने वाला नहीं है। क्योंकि हमारा विधान और संविधान हड़ताल का हक देता है।

आप किसी बेगुनाह के मौत के दोषी क्यों न हों, लेकिन आप पर मुकदमा नहीं चलेगा। क्योंकि आप भगवान हैं, इसलिए विधि से परे हैं। यह लोकतंत्र है जिसकी लाठी उसकी भैंस। फिलहाल खबर है वंग की दुर्गा नरम पड़ने वाली है। हड़ताल पुराण खत्म होने वाला है। इसी उम्मीद में बोलिए आर्यावर्ते, भारतखंडे बंग प्रांते, दीदी राज्ये धरती भगवान पुराणे, पंच हड़ताल दिवसे अध्याय समाप्त। बोलो! वृंदावन बिहारी लाल की जय।

-प्रभुनाथ शुक्ला

 

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