साध-संगत की अर्ज सुनी सतगुरू ने

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पंजाब में अनेकों सत्संग फरमाने के बाद जब पूजनीय परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज डेरा सच्चा सौदा सिरसा लौट रहे थे, तब गांव पन्नीवाला के कुछ सत्संगी सेवादारों ने पूजनीय परम पिता जी के चरणों में अरदास की पिता जी! हमारे घरों में भी अपने पवित्र चरण टिकाओ जी। शहनशाह जी ने फरमाया, ‘‘आप सभी जीटी रोड पर नहर के पुल के नजदीक एकत्रित हो जाओ।’’ सारे सत्संगी बेहद खुश हुए। गांव के लगभग 40 सत्संगी बहन-भाई ठीक 12 बजे नहर के पुल के पास पहुंच गए। सभी की आंखें अपने मुर्शिदे-कामिल के दर्शनोें की एक झलक पाने के लिए बेताब थी। कुछ देर बाद किसी ने बताया कि परम पिता जी तो चले गए हैं। इस पर सारी साध-संगत ने कहा कि हम प्रेम व सच्ची तड़प के साथ अर्ज करें तो हमारा मालिक बिना तार के टैलीफोन सुन सकता है।

सारी साध-संगत ने सच्ची तड़प व प्रेम के साथ ‘धन-धन सतगुरू तेरा ही आसरा’ का नारा लगाया व अपने अंतरमन के साथ अरदास की,‘‘परम पिता जी! हमारी अर्ज मंजूर करो जी।’’ इसके बाद सारी साध-संगत ने मिलकर नामचर्चा शुरू कर दी। अभी कविराज भाईयों ने दूसरा शब्द ही बोला था कि पूजनीय परम पिता जी की गाड़ी डबवाली की बजाय सरसा की तरफ आती दिखाई दी। उसी समय साध-संगत के प्रेम व अपार खुशियों का ऐसा दृश्य बना कि जिसका लिख-बोल कर ब्यान करना बहुत ही मुश्किल है। पूजनीय परम पिता जी ने सारी साध-संगत को भरपूर आर्शीवाद दिया व वचन फरमाया, ‘‘हम भूल गए थे।’’ इसके बाद पूजनीय परम पिता जी ने भाई दलीप सिंह रागी से कव्वाली बुलवाई व सभी ने पूर्ण मुर्शिदे-कामिल के नूरानी दीदार का आनंद लिया। पूजनीय परम पिता जी ने फरमाया, ‘‘भाई! आपका बेअंत प्रेम ही हमें यहां वापिस लेकर आया है, क्योंकि हम तो काफी आगे निकल चुके थे। मालिक व प्रेम का अटूट संबंध है।’’

मैं इनकी तरफ पीठ करके नहीं जा सकता

4-11-1996
उत्तर प्रदेश में सत्संग के दौरान आज पूज्य गुरू संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां के पास एक बुजुर्ग आया व वह नमस्कार करने के बाद बेहद रोया। उसने आंसुओं की झड़ी ही लगा दी। पूज्य गुरू जी को देखकर वह वैराग्य व प्रेम में आकर कहने लगा, गुरू जी! आप तो प्रत्यक्ष परमात्मा का रूप हो व आप दीन बंधु हो। आप जी ने हमारे लिए मानस चोला धारा है। वह बुजुर्ग अपने हाथ ऊंचे कर व फैला कर कह रहा था, आहा! मेरी आत्मा को आपजी के दर्शन कर बेहद आनंद की प्राप्ति हो रही है।Spirituality

उसका इतना प्रेम व वैराग्य देखकर सभी सत बह्मचारी व नजदीक सेवा कर रहे सभी सेवादार भी वैराग्य में आ गए। उसका इतना प्रेम व वैराग्य देखकर शहनशाह जी ने उसे अपना एक लाल दस्तार वाला स्वरूप(तस्वीर) दे दिया। फिर वह कभी पूज्य गुरू जी की तरफ देखता तो कभी उस तस्वीर की तरफ। जब वह जाने लगा तो तब पूज्य पिता जी की तरफ मुंह करके जाने लगा। भाव पूज्य पिता जी की तरफ उसने अपनी पीठ नहीं की। वह कहता हुआ जा रहा था कि महापुरूषों की ओर मैं कभी अपनी पीठ नहीं करता। मैं दीन बंधु की तरफ कभी पीठ करके नहीं जाऊंगा। मालिक के सच्चे प्रेमी भगत बहुत ही प्रेम व भागों वाले हैं, जो हमेशा उस मालिक के चरणों में अपना ध्यान लगाकर रखते हैं।

सतगुरू का अदब

पूजनीय बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज अपने मुर्शिद के प्रति अटूट श्रद्धा व प्रेम रखते व हर समय उनका गुणगाण करते रहते। जिस मार्ग पर से सतगुरू जी ने जाना होता था आप जी उस मार्ग की साफ-सफाई पहले की कर देते थे। आप जी अपने मुर्शिद का अदब करते नहीं थकते थे। उनके सामने घंटों तक नाचते रहते, उनके हर वचन का बड़े सत्कार के साथ पालन करते व उनसे खुशी हासिल करने के लिए इशारे से ही कोई भी कुर्बानी देने के लिए हमेशा तैयार रहते थे। एक बार का जिक्र है कि आप जी सरसा शहर के सरकारी अस्पताल के पार्क में बिराजमान थे। सुबह दस बजे का समय था। अचानक एक मीर जाति का व्यक्ति अस्पताल में आया व ऊंचा आवाज में ‘धन्य सावणशाह… धन्य सावणशाह’ बोलने लगा। आप जी ने उसे अपने पास बुलाया।

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आप जी उसके मुंह से अपने प्यारे मुर्शिदे कामिल का गुणगान सुनकर बहुत ही खुश हुए। आप जी ने उसके गले में नोटों का हार पहना दिया। वह व्यक्ति ‘धन्य सावणशाह… धन्य सावणशाह’ बोले ही जा रहा था व आप जी उस व्यक्ति को नोटों के हार पहनाए ही जा रहे थे। उस मीर ने ‘धन्य सावणशाह… धन्य सावणशाह’ बोलते बोलते अचानक ‘धन्य सावणशाह… धन्य मस्ताना शाह’ बोल दिया। अपनी बडियाई सुनकर आप जी खफा हो गए व गुस्से में कहा, बस! जुबान बंद कर! तूने गरीब मस्ताने में क्या देखा है? धन्य धन्य कहने के काबिल तो हमारा सतगुरू सावणशाह जी ही है। अगर आप ‘धन्य सावणशाह… धन्य सावणशाह’ कहते रहते तो पता नहीं कितने नोटों में आपके गले में पहनाए जाते। अगर हम अपनी चमड़ी भी उतार कर आपको दें दे तो वह भी कम थी। ,

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