दंगे झुका रहे देश का सिर

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दिल्ली में पिछले दिनों घटित हुई हिंसक घटनाओं ने दुनिया भर में देश का सिर नीचा किया है। पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र के जनरल सचिव एंटोनियो गुटेरेज ने हमें महात्मा गांधी की शिक्षाएं याद कराई हैं। सही शब्दों में कहें तो यह बात गुटेरेज का ताना है जो हमारी कमजोरी को जग-जाहिर करता है। हम दुनिया भर को महात्मा गांधी की शिक्षाओं से अवगत करवाते हैं पर जब हमारे देश में ही उनकी शिक्षाओं का हनन हो तो यह राष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी दिलवाती है।

यूरोप, एशिया, अफ्रीका व अमेरिकी महाद्वीप के देशों ने महात्मा गांधी की शिक्षाओं को न सिर्फ स्वीकार किया है बल्कि उनकी मूर्तियां भी स्थापित की हैं व गलियों चौराहों के नाम भी गांधी जी के नाम पर रखे हैं। राजनीतिज्ञों ने सन 1947 का बड़ा कत्लेआम होने के बाद भी सबक नहीं लिया। दिल्ली दंगे, गुजरात दंगे, कंधमाल दंगे देश के माथे पर कलंक हैं। सबसे चिंताजनक बात है कि दंगों से सियासी नेताओं का नाम जुड़ना। कोई भी ऐसा दंगा नहीं हुआ जब नेताओं पर उंगली न उठी हो। दिल्ली व देश के अन्य राज्यों में राजनेताओं द्वारा जिस तरह की ब्यानबाजी की जा रही थी लगभग एक महीना पहले ही यह नफरत वाला माहौला बन गया था।

साधारण बुद्धि वाला इंसान भी सोचता था कि देश सांप्रदायिकता की तरफ धकेला जा रहा है पर किसी पार्टी के नेता ने भी ब्यानबाजी को नहीं रोका। पिछले दिनों जिस तरह दिल्ली में दंगे हुए हैं उससे आम लोगों के दिलों में भय बढ़ गया है तथा हर कोई अपने-आपको असुरक्षित महसूस कर रहा है। राजनीति तथा दंगाकारियों के संबंध इस तरह जुड़ गए हैं किं घटना के कारणों को ढूंढना मुश्किल हुआ पड़ा है। ऐसा लगता ही नहीं कि हम 21वीं सदी में रह रहे हैं, हमारे हालात 18वीं सदी जैसे नजर आते हैं। देश की राजधानी में ऐसा कुछ होना और भी चिंताजनक है।

यह कहना गलत नहीं होगा कि राजनीति में आ रहा बदलाव ही दंगों का बड़ा कारण है। नहीं तो देश के दूर-दराज में विभिन्न धर्मों के लोग बड़े प्रेम-प्यार व भाईचारे से रह रहे हैं। अलग-अलग धर्मों के पूजा स्थानों की सार्वजनिक दीवारें भी कोई समस्या नहीं है। लेकिन यहां जरा सी भी सांप्रदायिक राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ जाती हैं वहां का हाल फिर पूरी दुनिया देखती है जैसा कि अब दिल्ली को देख रही है।

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