संपादकीय : दंगे व बेदर्द राजनीति

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भाजपा के संसदीय दल की बैठक में अमन-शांति बहाल करने के लिए पहल करने के लिए कहा है। प्रधानमंत्री दिल्ली दंगों के संदर्भ में बोल रहे थे। भड़काऊ भाषण व ब्यान देने वाले नेताओं पर भी नकेल कसी जानी आवश्यक है। नि:संदेह दिल्ली दंगे इतिहास का एक और काला पन्ना लिख गए हैं। सांप्रदायिक आधारित दंगे नफरत की दीवार को और ऊंची कर गए हैं। इस दीवार को तोड़ने के लिए राजनीतिक पहलकदमी सबसे जरूरी होती है जो लगातार कम होती जा रही है। दरअसल राजनीति और हिंसा इस तरह जुड़ गए हैं कि जैसे लगता है कि दंगों के बिना राजनीति संभव ही न हो।
हमारा देश धर्मनिरपेक्ष ही नहीं बल्कि धार्मिक सद्भावना वाला देश माना जाता था जहां हर धर्म के प्रति सहनशीलता की भावना होती थी लेकिन अब यह देश की बड़ी कमजोरी बन गई है कि धार्मिक टकराव राजनीतिक लाभ का हथियार बन गया है। राजनीति की विशेषता भी टकराव में बदल गई है जो किसी समय केवल वैचारिक भिन्नता तक सीमित थी। एक-दूसरी पार्टी के वर्करों पर हमले व हत्या की घटनाएं घट रही हैं। यदि केरल में भाजपा वर्करों या आरएसएस वर्करों पर हिंसा होती है और अन्य राज्यों में वामपंथी या गैर-हिंदू निशाना बनाए जाते हैं। वास्तव में दंगे राजनीतिक टकराव का ही परिणाम हैं। हालात यह हैं कि यह चुनौती अब कई दशकों तक खत्म होती नहीं नजर आ रही। पीड़ितों के साथ हमदर्दी अधिकतर एक दिखावा प्रदर्शन बन गई है। दोषियों को सजा जरूरी हैं लेकिन उससे भी जरूरी हैं कि नफरत की दीवार टूटे और भविष्य में ऐसे दंगे न दोहराए जाएं। राजनीतिक फिजां ज्यों की त्यों बरकरार है। कोई 15 करोड़ को 100 करोड़ पर भारी बताने व कोई गद्दारों को गोली मारो जैसे नारे लगाकर माहौल तनावपूर्ण बना रहा है। दिल्ली के बाद बंगाल असुरक्षित नजर आने लगा है। अगले साल यहां विधान सभा चुनाव होंगे।
राजनीतिक पारे के साथ-साथ सांप्रदायिक पारा भी बढ़ रहा है। भाजपा वर्करों के साथ-साथ तृणमूल कांग्रेस भी गर्म व तीखे तेवरों में नजर आ रही है। जब बड़े नेता ही एक-दूसरे के खिलाफ जहर उगलने वाले ब्यान देंगे तब निम्न स्तर के वर्कर जो पहले ही जज्बाती व मजहबी होते हैं, किन हालातों को अंजाम देंगे इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं। नि:संदेह देश को शांति व विकास की आवश्यकता है। लोग राजनीतिक मंचों से बयान सुनकर ही भड़कते हैं और धार्मिक आधार पर दंगे करते हैं। देश में धार्मिक अमन शान्ति सौ प्रतिशत हो जाएगी, बशर्तें नेता नफरत के झंडे न लहराएं। शान्ति लाने के लिए इच्छा शक्ति, इमानदारी कायम रखें और वोट बैंक का मोह त्यागना होगा। वोट अमन-शान्ति का शत्रु साबित न हो, यह बात वोट मांगने वालों के दिल व दिमाग में होनी चाहिए।

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