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लेख

जीत के साथ हार पर भी मनन करे कांग्रेस

Reflect also on defeat with congress victory

कांग्रेस पार्टी ने हिन्दी भाषी बेल्ट के राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे तीन महत्वपूर्ण प्रदेशों में अपनी सरकार बना कर खुश हो रही है। कांग्रेस खुश भी क्यों ना हो उसे मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में तो 15 वर्षों के लम्बे इन्तजार के बाद सत्ता जो प्राप्त हुयी है। मगर कांग्रेस को खुशी के साथ दो राज्यों मिजोरम व तेलंगाना में मिली करारी हार पर भी सोचना चाहिये कि वहां कैसे हारी। पूर्वोत्तर भारत के आठ राज्यों में मिजोरम अन्तिम राज्य था जहां कांग्रेस की सरकार बची थी मगर हाल के विधानसभा चुनाव में वहां भी कांग्रेस हार गयी। मिजोरम की हार के साथ ही कांग्रेस का पूर्वोत्तर भारत के आठ राज्यों से सफाया हो गया है।

हाल के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सिर्फ छत्तीसगढ़ राज्य में बड़ी सफलता हासिल करने में जरूर कामयाब रही है बाकी राज्यों में उसे कड़े संघर्ष का सामना करना पड़ा है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को कुल 90 सीट में से 68 सीटो पर जीत मिली है। वहां भाजपा को मात्र 15 सीटो पर ही संतोष करना पड़ा है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को कुल मतदान का 43 प्रतिशत 61लाख 44 हजार 192 मत मिले वहीं भाजपा को मात्र 33 प्रतिशत 47 लाख 07 हजार 141 मत ही मिल पाये। यहां कांग्रेस ने भाजपा से दस प्रतिशत अधिक मत प्राप्त कर भाजपा से पन्द्रह वर्षों का शासन छीन लिया। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने दमदार वापसी की है। वहां कांग्रेस को भाजपा से 14 लाख 37 हजार 51 मत अधिक मिले।

मध्यप्रदेश में कांग्रेस ने मात्र पांच सीट की बढ़त बनाकर भाजपा से सत्ता जरूर छीन ली है मगर कुल मतदान में प्राप्त मतो में भाजपा से पिछड़ गयी है। यहां कांग्रेस को 114 सीट व भाजपा को 109 सीट मिली है। कांग्रेस ने कुल मतदान का 40.9 प्रतिशत 1 करोड़ 55 लाख 95 हजार 153मत प्राप्त किये वहीं भाजपा ने 41 प्रतिशत 1 करोड़ 56 लाख 42 हजार 980 मत प्राप्त कर कांग्रेस पर बढ़त बनाने में कामयाब रही है। यहां कांगेस की कमलनाथ सरकार बसपा, सपा व निर्दलियों के समर्थन से चल रही है। मध्यप्रदेश में भाजपा को कांग्रेस से 47 हजार 827 वोट अधिक मिलने पर भी कांग्रेस से पीछे रह गयी।

राजस्थान में कांग्रेस को 99 व भाजपा को 73 सीट प्राप्त हुयी है। यहां कांग्रेस ने राष्ट्रीय लोकदल के एक विधायक को साथ लेकर गठबंधन सरकार बना ली है। बसपा के 6 व कई निर्दलिय विधायक सरकार को बाहर से समर्थन दे रहें हैं। राजस्थान में भाजपा वोटो के मामले में कांग्रेस से मात्र आधा प्रतिशत वोटो से ही पीछे रही। कांग्रेस को कुल मतदान का 39.3 प्रतिशत 1 करोड़ 39 लाख 35 हजार 201 मत मिले वहीं भाजपा को 38.8 प्रतिशत 1 करोड़ 37 लाख 57 हजार 502 मत मिले। इस प्रकार देखे तो राजस्थान में भाजपा कांग्रेस से मात्र 1 लाख 77 हजार 699 मतो से पिछड़ कर सत्ता गंवा दी। जबकि वहां नोटा पर ही 1.3 प्रतिशत यानी 4 लाख 67 हजार 781 मत पड़े। राजस्थान में एक दर्जन सीटो पर तो भाजपा के प्रत्याशी एक हजार से भी कम वाटो से हारे हैं।

तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चन्द्रशेखर राव ने समय पूर्व विधानसभा चुनाव करवाकर एक बार फिर कांग्रेस को करारी मात दी है। इस बार के चुनाव में तो सत्ता के लिये कांग्रेस ने अपने पुराने दुश्मन आन्ध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू से भी हाथ मिलाने में परहेज नहीं किया था। इसके उपरान्त भी कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा। कांग्रेस को 119 में से मात्र 19 सीट ही मिल पायी। जबकि 2014 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 21 सीट मिली थी। इस चुनाव में कांग्रेस के वाट बैंक में भी कमी आयी है। इतना ही नहीं कांग्रेस से गठबंधन कर चुनाव लडऩे वाली तेलुगु देशम पार्टी को भी मात्र दो सीट ही मिल पायी जबकि 2014 के चुनाव में उसे 15 सीट मिली थी। उसको 2014 के मुकाबले वोट भी काफी कम मिले।

उपरोक्त विशख्ेषण से ज्ञात होता है कि कांग्रेस अपनी तीन प्रदेशों की जीत का तो जमकर डंका बजा रही है मगर उसके साथ ही दो राज्यों में मिली करारी हार की कहीं चर्चा भी नहीं करना चाहती है। तीन राज्यों में सरकार बनते ही कांग्रेस के नेता राहुल गांधी को देश का अगला प्रधानमंत्री बनाने में लग गये। इसी दौरान बसपा ने कांग्रेस को झटका देते हुये उत्तर प्रदेश में सपा नेता अखिलेश यादव के साथ सीटो का बटवारा कर बसपा – सपा गठबंधन को पक्का कर दिया। मायावती द्वारा घोषित सीटो के बंटवारे में कांग्रेस को शामिल नहीं किया गया। कांग्रेस के लिये सिर्फ अमेठी व रायबरेली सीट छोड़ी गयी है।

बसपा-सपा के गठबंधन से कांग्रेस सकते में आ गयी व कांग्रेस नेता गुलामनबी आजाद ने आनन फानन में प्रेस कांफ्रेस कर उत्तरप्रदेश की सभी 80 सीटो पर अकेले चुनाव लडऩे की घोषणा कर दी। कांग्रेस नेता गुलाम नबी को इस बात का भी अच्छी तरह से ज्ञान है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी से समझौता होने के उपरान्त भी कांग्रेस वहां मात्र सात सीट ही जीत पायी थी।

कांग्रेस के साथ गठबंधन कर अपनी भद्द पिटवा चुके तेलुगु देशम पार्टी के नेता चन्द्रबाबू नायडू ने भी आगामी चुनावों में कांग्रेस से गठबंधन करने से इंकार कर दिया है। राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का सपना देख रही कांग्रेस पार्टी से बसपा, सपा के अलावा ममता बनर्जी, अरविन्द केजरीवाल, नवीन पटनायक, के चन्द्रशेखर राव, ने भी किसी तरह का गठजोड़ करने से इंकार कर दिया है। बिहार में लालूयादव भी कांग्रेस को 5-6 से अधिक सीट देने के मूड में नहीं हैं। ऐसे में राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड जैसे राज्य जहां से मात्र 100 सीटे आती है जिनमें से कांग्रेस 40 से ज्यादा सीटे जीतने की स्थिति में नहीं हैं। बाकी प्रदेशों में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव है। ऐसी स्थिति में कांग्रेस नेता राहुल गांधी को अगला प्रधानमंत्री बनाने की बात करते हैं तो इसे उनका अति आत्मविश्वास ही माना जा सकता है।

कांग्रेस को तीन प्रदेशों में मिली जीत का जश्र मनाने के साथ ही अपने गढ़ रहे मिजोरम व तेलंगाना में हुयी करारी हार पर भी मनन करना चाहिये। कांग्रेस को आत्म मुग्धता से बाहर आकर हकीकत का सामना करना चाहिये। लोकसभा चुनाव शिघ्र ही आने वाले है ऐसे में कांग्रेस के नेताओं को जनता में जाकर उनका मन टटोलना चाहिये कि वो क्या चाहती हैं। जिन प्रदेशो पाटीं ने हाल ही में सरकार बनायी है वहां जमीन से जुड़े नेताओं को आगे लाना चाहिये। चापलूस व सत्ता के दलाल प्रवृति के लोग सरकार में हावी होने से कांग्रेस की छवी खराब होते देर नहीं लगेगी। इस तरह के लोगो को सत्ता से दूर रखने से ही सरकार व पार्टी की साख बचायी जा सकती है। कांग्रेस को अपनी खोयी साख बहाल करने के लिये नेहरू, इन्दिरा की नीतियो को ही एक बार फिर नये सिरे से अपनाने की जरूरत है। उन्ही की नीतियां कांग्रेस का चुनाव में फिर से बेड़ा पार लगाने में सहायक सिद्ध होगी।

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