सम्पादकीय

फिर से गर्माया नदियों के पानी का मुद्दा

Re-flowing river water issue

पंजाब से अकाली सांसद सुखबीर सिंह बादल ने लोक सभा में पंजाब के पानी के राजस्थान में इस्तेमाल का मुद्दा उठाकर एक बार फिर से नई जंग छेड़ दी है। उनका कहना था कि राजस्थान पंजाब का पानी इस्तेमाल करता है तो रॉयल्टी भी दे। यहां बादल की मंशा लोक सभा चुनाव और विधान सभा चुनाव में अकाली दल के खराब प्रदर्शन के बाद पार्टी में नई ऊर्जा पैदा करने की भी हो सकती है लेकिन यह बात भी स्पष्ट है कि पानी और राजधानी के मुद्दे पर अब तक कोई स्पष्ट और ठोस नीति नहीं बनाई जा सकी, जिस कारण यह मुद्दे आधी सदी से लटकते आ रहे हैं।

एक राज्य से दूसरा राज्य स्थापित करने के लिए न तो कोई नियम है और न ही कोई परंपरा। पंजाब का दावा है कि प्रत्येक  नए राज्य ने अपनी एक अलग राजधानी बनानी होती है। हिमाचल, झारखंड, छत्तीसगढ़ के उदाहरण पंजाब का समर्थन करते हैं, दूसरी तरफ आंध्र प्रदेश से तेलंगाना एक अलग राज्य बनाने पर आंध्र प्रदेश के लिए नई राजधानी बन रही है। राजीव-लोंगोवाल समझौता भी लागू नहीं हुआ जिस कारण चंडीगढ़ का मामला सुलझ नहीं सका है। एक देश में एक ही कानून और परंपरा लागू होनी चाहिए। इसी प्रकार नदियों के पानी का मामला न केवल पंजाब और हरियाणा के बीच अधर में लटका है बल्कि तमिलनाडु व कर्नाटक के बीच कावेरी नदी के पानी विवाद के कारण वहां कानून और व्यवस्था की समस्या पैदा हो जाती है।

राजनीतिक स्तर पर भी इस मामले का समाधान अभी असंभव बना हुआ है और अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई अधीन है। किसी समय में केंद्र, हरियाणा और पंजाब में एक ही पार्टी की सरकार होने के बावजूद भी मामले को सुलझाया नहीं जा सका। राजनीतिक पार्टियां केवल बयानबाजी कर अपने राजनीतिक हित साधने में लगी रहती हैं, जिस कारण अब यह मुद्दा राजनीतिक खींचतान में तूल पकड़ता जा रहा है। पंजाब सहित देश में भू-जल का स्तर गिरने से जल संकट गहराया हुआ है, लेकिन कोई भी राज्य जल प्रयोग को कम करने या जल सरंक्षण के लिए कोई ठोस कदम उठाने के लिए तैयार नहीं। केंद्र सरकार को इस संदर्भ में कोई ठोस नीति तैयार करनी चाहिए। राजनीतिक स्वार्थ में किसी मामले को लटकाना समस्या को ओर जटिल बनाना है।

 

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