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पृथ्वी राज चौहान व मोहम्मद गौरी के युद्ध का गवाह है ‘तरावड़ी’

Prithvi Raj Chauhan

1192 के युद्ध में पृथ्वी राज चौहान के साले जयचंद उन्हें धोखा देकर मोहम्मद गौरी से जा मिले थे। जिससे चौहान को हार का मुंह देखना पड़ा था। युद्ध में हराने के बाद मोहम्मद गौरी ने चौहान की दोनों आंखें निकाल दी थी।

1191 व 92 में तरावड़ी में ही लड़े गए थे युद्ध, शेरशाह सूरी द्वारा निर्मित दो कोस मीनार भी तरावड़ी में मौजूद (Prithvi Raj Chauhan)

सच कहूँ/रोहित लामसर तरावड़ी। कर्णनगरी करनाल में बसा कस्बा तरावड़ी जिसे पहले तराईन कहा जाता था आज इतिहास की यादों को समेटे हुए है। यही वो जगह है जहां पृथ्वी राज चौहान (Prithvi Raj Chauhan) व क्रूर शासक मोहम्मद गौरी के बीच सन् 1191-92 में दो युद्ध हुए थे। दूसरे युद्ध के दौरान जब सम्राट पृथ्वी राज चौहान मोहम्मद गौरी से पराजित हो गए थे तो उन्हें यहीं से बंदी बनाकर गजनी में ले जाया गया था। जहां पर पृथ्वी राज चौहान को मोहम्मद गौरी ने बहुत यातनाएं दी थी। इतिहास इस बात का गवाह है कि तरावड़ी कस्बा शेरशाह सूरी मार्ग, जो आज राष्ट्रीय राजमार्ग-1 पर स्थित है। यहीं से होकर शेरशाह सूरी का मार्ग गुजरता था, जहां आज यह धरोहर स्थित है। आज भी इस मार्ग पर शेरशाह सूरी द्वारा निर्मित कोस मीनार (3.2 किलोमीटर का एक कोस इस ऐतिहासिक धरोहर के अगल-बगल स्थित हैं।

  • दोनों कोस मीनारे आज भी कायम है।
  • जिसमें से एक नई अनाज मंडी के पास तथा दूसरी बादशाही पुल के पास अंजनथली रोड बनी हुई है।

प्सैनिकों के विश्राम के लिए यहां बनाया था किला

 चौहान ने सैनिकों के विश्राम के लिए यहां किले का निर्माण करवाया था। 1192 के युद्ध में पृथ्वी राज चौहान के साले जयचंद उन्हें धोखा देकर मोहम्मद गौरी से जा मिले थे। जिससे चौहान को हार का मुंह देखना पड़ा था। युद्ध में हराने के बाद मोहम्मद गौरी ने चौहान की दोनों आंखें निकाल दी थी।

  • राजा चौहान शब्दभेदी बाण कला में निपुण थे।
  • उन्होंने बंदी होते हुए भी मोहम्मद गौरी को शब्दभेदी बाणों से मार गिराया था।
  • 43 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गई थी।

असंमजस: चौहान का किला या फिर सराय

लोगों में आज भी यह असमंजस की स्थिति है कि यह धरोहर पृथ्वी राज चौहान का किला हैं या फिर सराए, क्योंकि पृथ्वी राज चौहान का किला हरियाणा के हांसी में भी स्थित है, जोकि पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित हैं। लेकिन तरावड़ी में पुरातत्व विभाग द्वारा इस इमारत को संरक्षित नहींं किया गया और न ही जो लोग इसमें रह रहे हैं, उनकी मलकीयत बन सकी। इसके साथ ही दो कोस मीनारों की भी हालत बेहद खस्ता है।

आज काटजू नगर के नाम से जाना जाता है किला

  • चौहान ने जिस किले को बनाया था उसे आज काटजू नगर के नाम से जाना जाता है।
  • इसका भी एक इतिहास रहा है।
  • सन् 1947 में भारत-विभाजन के समय जो लोग पाकिस्तान (जिला मुल्तान) की तरफ से हिन्दुस्तान में आए थे।
  • वह उस समय की इस सरायनुमा इमारत में शरणार्थी के रूप में ठहरे थे।
  • जिनका आज तक यहीं पर बसेरा कायम है।

 

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