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गरीबी उन्मूलन- केवल बातें, कार्यवाही नहीं

Poverty alleviation - things only, not actionable

विकास की बहुत सारी बातें हो रही हैं। सत्तारूढ़ राजनीतिक दल के नेता राग अलाप रहे हैं कि वे फलां- फला विकास कार्य कर रहे हैं। किंतु जिस तरह से हमारे राजनेता छोटे-छोटे अवसरों पर विकास की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं उसके मद्देनजर वास्तविकता का विश्लेषण करना आवश्यक है। जो लोग इन बातों को जानते समझते हैं वे इस पर विश्वास नहीं करते हैं तथा गरीब और वंचित जिन्हें विकास का लाभ मिलना चाहिए उन्हें न्याय नहीं मिलता है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की 2018 की वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक और आॅक्सफोर्ड पावर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनिशिएटिव की रिपोर्ट से उत्साहजनक खबर मिलती है कि भारत में 270 मिलियन लोग गरीबी से उभरे हैं। किंतु सच यह है कि इन लोगों को गरीबी से उभरने में एक दशक लगा है।

ये आंकड़े 2005-06 से 2015-16 तक के हैं। हालांकि इस दौरान गरीबी की दर में गिरावट आयी है किंतु यह अभी भी 28 प्रतिशत है। विशेषज्ञों का कहना है कि उन लोगों का आकलन किया जाना चाहिए जो गरीबी की रेखा के निकट हैं और उनकी संख्या 8 से 10 तक हो सकती है। यह इस अवधि में राजनीतिक नेतृत्व की कमी को दर्शाता है क्योंकि इस मामले में भारत जैसे देश का निष्पादन अच्छा होना चाहिए था। भारत में 70 के दशक से गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं किंतु ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब लोग अभी भी गरीबी से जूझ रहे हैं। गरीबी उन्मूलन एक चुनौती भरा कार्य है किंतु संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के प्रशासक अचीम स्टीनर के अनुसार यह असंभव नहीं है।

सच यह है कि गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम बड़ी धीमी गति से आगे बढ़ रहे हैं। एक अन्य वैश्विक आकलन में 195 देशों में से भारत का स्थान 158वां है। इस आकलन में शिक्षा, और स्वास्थ्य में निवेश तथा कल्याण कार्यक्रमों पर बल दिया गया है। वाशिंगटन विश्वविद्यालय के अनुसांधानकतार्ओं के अनुसार स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़े लोगों को इन दो क्षेत्रों के लिए अधिक संसाधन जुटाने के लिए संघर्ष करना चाहिए। मानव पूंजी में कम निवेश पर नीतिगत ध्यान नहीं दिया गया है। वाशिंगटन विश्वविद्यालय के इंस्टीटयूट आॅफ हेल्थ मैट्रिक्स एंड इवैलुऐशन के निदेशक डॉ0 क्रिस्टोफर मुरे के अनुसार मानव पंूजी के विभिन्न स्तरों पर नीतिगत ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र पर ध्यान देने के बारे में व्यापक चिंता व्यक्त की जा रही है और इस क्षेत्र में सरकारी व्यय बढ़ाया भी गया है किंतु यह अभी भी सकल घरेलू उत्पाद का लगभग दो प्रतिशत ही है जो ब्राजील, चीन, दक्षिण अफ्रीका जैसे अन्य विकासशील देशों की तुलना में बहुत कम है। आज भी भारत में प्रभावी उपचार के अभाव में प्रतिदिन 4300 लोगों की मौत होती है। इसलिए प्रश्न उठता है कि खाली बयानबाजी या विचार व्यक्त करने से 35-40 प्रतिशत लोगों की जीवन दशा में बदलाव नहीं आ सकता है। इसमें केवल भुखमरी के कगार पर रहने वाले लोग नहीं हैं अपितु ऐसे लोग भी हैं जिनके साथ लिंग के आधार पर भेदभाव किया जा रहा है जो बाल विवाह, हिंसा आदि से पीड़ित हैं और इसमें सुरक्षित प्रसव, प्रजनन अधिकार, जन्म पर बाल सुरक्षा, स्तनपान, पोषाहार, मातृत्व अधिकार, प्राकतिक संसाधनों का संरक्षण, सामुदायिक अधिकार आदि शामिल हैं।

इस सूचकांक में भारत के निचले पायदान पर रहना इस बात को दर्शाता है कि पिछड़े और आदिवासी समाज की स्थिति अच्छी नहीं है। उनकी अपनी सांस्कृतिक, सामाजिक पहचान और जीवन शैली है और वे भुखमरी से बचने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करते हैं किंतु वैश्विक आर्थिक नीतियों ने उनकी जल, जमीन, जंगल और संस्कृति को छीन लिया है। यूनिसेफ की पोषाहार और जनजातीय लोग – भारत के जनजातीय बच्चों की स्थिति के बारे में पोषाहार रिपोर्ट 2016-17 के अनुसार देश में अनेक परिवारों और समाजों में खाद्य असुरक्षा बनी हुई है जिससे बच्चों का विकास बाधित होता है जिसके चलते बच्चे बीमार रहते हैं, स्कूलों का वातावरण अच्छा नहीं है जिसके चलते वे भावी जीवन में एक स्वस्थ नागरिक के रूप में भूमिका नहीं निभा पाते हैं और इस स्थिति का कारण गरीबी, खाद्य असुरक्षा, महिलाओं में पोषाहार की कमी, और खराब जीवन शैली आदि है। आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान और तेलंगाना जैसे कुछ राज्यों में लगभग 50 लाख आदिवासी बच्चों का विकास बाधित पाया गया है। सरकार का यह संवैधानिक दायित्व है कि वह न केवल अदिवासी समाज को भुखमरी से बाहर निकाले अपितु उन्हें जीवन की बुनियादी आवश्यकताएं भी उपलब्ध कराए। संसद में 2006 में वनाधिकार अधिनियम बनाया था ताकि आदिवासियों को अतिक्रमित वन भूमि के झंझटों से से मुक्त कराया जा सके। इस कानून के अनुसार आदिवासियों और वन में रहने वाले अन्य लोगों को उनके कब्जे वाली 10 एकड़ भूमि का कानून अधिकार दिया गया था। उन्हें वनोत्पाद सूखी लकड़ी, औषधि, पानी, फल, सब्जियां आदि का भी अबाधित अधिकार दिया गया था। यह उनकी गरिमा के लिए अनिवार्य कदम था ताकि वे भुख्मरी से बाहर निकल सकें। किंतु वास्तव में हुआ क्या?

जनजातीय कार्य मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार फरवरी 2017 तक 51.65 लाख दावे किए गए जिनमें से 18.47 लाख दावे अस्वीकार किए गए। अधिकतर मामलों में दावा करने वालों को उनके आवेदन को रद्द करने के कारण नहीं बताए गए। प्रत्येक सरकार का दृष्टिकोण जनोन्मुखी नही रहा है। गरीब लोगों के लिए अवसरों की कमी बढ़ती जा रही है और प्रशासन मूक दर्शक बना है। दूरदृष्टि के अभाव के कारण भी असमानता बढ़ रही है और संपत्ति धनी लोगों के हाथों में केन्द्रित हो रही है। बार्कलेस बुरूंन इंडिया रिच लिस्ट के अनुसार 2018 में एक हजार करोड़ से अधिक की संपत्ति वालों की संख्या 214 से बढ़कर 831 हो गयी।

वर्ल्ड इनइक्वेलिटी लैब के थॉमस पिकेटी और लुकास चांसेल ने इस विषय पर विचार किया और पाया कि जहां तक भारत का संबंध है यहां पर सबसे समृद्ध 10 प्रतिशत लोगों की आय में चार गुणा, समृद्धृतम 1 प्रतिशत की आय में 7 गुना, 0.17 प्रतिशत की आय में 11 गुना, 0.01 प्रतिशत की आय में 17 गुना, और 0.001 प्रतिशत की आय में 20 गुणा की वृद्धि है। जबकि गरीब 50 प्रतिशत लोगों की 11 प्रतिशत आय उसके बाद के 40 प्रतिशत को 23 प्रतिशत, फिर 1 प्रतिशत लोगों को 29 प्रतिशत और 0.001 प्रतिशत लोगों को 2.8 प्रतिशत आय मिली। देश में सबसे धनी 7943 लोगों को औसतन 188 मिलियन रूपए मिले।

इसी तरह फोर्ब्स के अनुसार 2005 से भारत के समृद्धतम लोगों की आय का हिस्सा 10 प्रतिशत बढ़ा है। यह सब बताता है कि हमारी विकास नीति का लाभ धनी लोगों को मिला तथा इसका आंशिक लाभ उच्च मध्यम आय वर्ग को भी मिला। गत वर्षों में निचले क्रम पर रहने वाले 35-40 प्रतिशत लोगों की दशा में बदलाव नहीं आया है। आईपीसीसी की हालिया रिपोर्ट के अनुसार यदि धरती के तापमान में 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड की वृद्धि होती है और 2030 तक इसमें 2 डिग्री सेंटीगे्रड की वृद्धि होती है तो इससे भारत और अन्य विकासशील देशों में गरीबी बढ़ेगी। क्या अगले चार-पांच वर्षों में स्थिति में सुधार आएगा? यह हमारे राजनेताओं की इच्छा शक्ति पर निर्भर करेगा।

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