Aloo ki Kheti : आलू की खेती करने के प्रकरण

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Aloo-ki-Kheti

जलवायु
तापमान- 14-25
डिग्री सेल्सियस
वर्षा-300-500 एमएम
बिजाई के समय तापमान- 15-25 डिग्री सेल्सियस
कटाई के समय तापमान – 14-20 डिग्री सेल्सियस

मिट्टी

यह फसल बहुत तरह की मिट्टी जैसे कि रेतली, नमक वाली, दोमट और चिकनी मिट्टी में उगाई जा सकती है। अच्छे जल निकास वाली, जैविक तत्व भरपूर, रेतली से दरमियानी जमीन में फसल अच्छी पैदावार देती है। यह फसल नमक वाली तेजाबी जमीनों में भी उगाई जा सकती है पर बहुत ज्यादा पानी खड़ने वाली और खारी या नमक वाली जमीन इस फसल की खेती के लिए उचित नहीं होती।

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

  1. Kufri Alankar इस फसल को पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश राज्यों में उगाने के लिए सिफारिश की जाती है। यह लंबे कद की और मोटे तने वाली किस्म है। यह फसल मैदानी इलाकों में 75 दिनों में और पहाड़ी इलाकों में 140 दिनों में पकती है। इसके आलू गोलाकार होते हैं। इसकी औसतन पैदावार 120 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
    2. Kufri Ashokaa: यह लंबे कद की और मोटे तने वाली किस्म है। यह किस्म 70-80 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। इसके आलू बड़े, गोलाकार, सफेद और नर्म छिल्के वाले होते हैं। यह पिछेती झुलस रोग को सहने योग्य किस्म है।
    3. Kufri Badshah: इसके पौधे लंबे और 4-5 तने प्रति पौधा होते हैं। इसके आलू गोल, बड़े से दरमियाने, गोलाकार और हल्के सफेद रंग के होते हैं। इसके आलू स्वाद होते हैं। यह किस्म 90-100 दिनों में पक जाती है। यह किस्म कोहरे को सहनेयोग्य है और पिछेती, अगेती झुलस रोग की प्रतिरोधक है।
4. Kufri Bahar: : इस किस्म के पौधे लंबे और तने मोटे होते हैं। तनों की संख्या 4-5 प्रति पौधा होती है। इसके आलू बड़े, सफेद रंग के, गोलाकार से अंडाकार होते हैं। यह किस्म 90-100 दिनों में पक जाती है और इसकी औसतन पैदावार 100-120 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। इसे ज्यादा देर तक स्टोर करके रखा जा सकता है। यह पिछेती और अगेती झुलस रोग और पत्ता मरोड़ रोग की रोधक है।

5.  Kufri Chamatkar: इस किस्म के पौधे दरमियाने कद के, फैलने वाले और ज्यादा तनों वाले होते हैं। यह किस्म मैदानी इलाकों में 110-120 दिनों में और पहाड़ी इलाकों में 150 दिनों में पकती है। इस किस्म के आलू गोलाकार और हल्के पीले रंग के होते हैं। मैदानी इलाकों में इसकी औसतन पैदावार 100 क्विंटल और पहाड़ी इलाकों में 30 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। यह पिछेती झुलस रोग, गलन रोग और सूखे की रोधक किस्म है।

जमीन की तैयारी

खेत को एक बार 20-25 सैं.मी. गहरा जोतकर अच्छे ढंग से बैड बनाएं। जोताई के बाद 2-3 बार तवियां फेरें और फिर 2-3 बार सुहागा फेरें। बिजाई से पहले खेत में नमी की मात्रा बनाकर रखें। बिजाई के लिए दो ढंग मुख्य तौर पर प्रयोग किए जाते हैं:
1. मेंड़ और खालियों वाला ढंग
2. समतल बैडों वाला ढंग

बिजाई का समय

अधिक पैदावार के लिए बिजाई सही समय पर करनी जरूरी है। बिजाई के लिए सही तापमान अधिक से अधिक 30-32 डिग्री सेल्सियस और कम से कम 18-20 डिग्री सेल्सियस होता है। अगेती बिजाई 25 सितंबर से 10 अक्तूबर तक, दरमियाने समय वाली बिजाई अक्तूबर के पहले से तीसरे सप्ताह तक और पिछेती बिजाई अक्तूबर के तीसरे सप्ताह से नवंबर के पहले सप्ताह तक करें। बसंत ऋतु के लिए जनवरी के दूसरे पखवाड़े बिजाई का सही समय है।

फासला

बिजाई के लिए आलुओं के बीच में 20 सैं.मी. और मेड़ में 60 सैं.मी. का फासला हाथों से या मकैनीकल तरीके से रखें। फासला आलुओं के आकार के अनुसार बदलता रहता है। यदि आलू का व्यास 2.5-3.0 सैं.मी. हो तो फासला 60 गुणा 15 सैं.मी. और यदि आलू का व्यास 5-6 सैं.मी. हो तो फासला 60 गुणा 40 सैं.मी. होना चाहिए।

बीज की गहराई

6-8 इंच गहरी खालियां बनाएं। फिर इनमें आलू रखें और थोड़ा सा जमीन से बाहर रहने दें।

बिजाई का ढंग

बिजाई के ट्रैक्टर से चलने वाली या आॅटोमैटिक बिजाई के लिए मशीन का प्रयोग करें।

बीज की मात्रा

बिजाई के लिए छोटे आकार के आलू 8-10 क्विंटल, दरमियाने आकार के 10-12 क्विंटल और बड़े आकार के 12-18 क्विंटल प्रति एकड़ के लिए प्रयोग करें।

बीज का उपचार

बिजाई के लिए सेहतमंद आलू ही चुने। बीज के तौर पर दरमियाने आकार वाले आलू, जिनका भार 25-125 ग्राम हो, प्रयोग करें। बिजाई से पहले आलुओं को कोल्ड स्टोर से निकालकर 1-2 सप्ताह के लिए छांव वाले स्थान पर रखें ताकि वे अंकुरित हो जायें। आलुओं के सही अंकुरन के लिए उन्हें जिबरैलिक एसिड 1 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी में मिलाकर एक घंटे के लिए उपचार करें। फिर छांव में सुखाएं और 10 दिनों के लिए हवादार कमरे में रखें।

फिर काटकर आलुओं को मैनकोजेब 0.5 प्रतिशत घोल (5 ग्राम प्रति लीटर पानी) में 10 मिनट के लिए भिगो दें। इससे आलुओं को शुरूआती समय में गलने से बचाया जा सकता है। आलुओं को गलने और जड़ों में कालापन रोग से बचाने के लिए साबुत और काटे हुए आलुओं को 6 प्रतिशत मरकरी के घोल (टैफासन) 0.25 प्रतिशत (2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी) में डालें।

खरपतवार नियंत्रण

आलुओं के अंकुरन से पहले मैटरीबिउजिन 70 डब्लयु पी 200 ग्राम या एलाकलोर 2 लीटर प्रति एकड़ डालें। यदि नदीनों का हमला कम हो तो बिजाई के 25 दिन बाद मैदानी इलाकों में और 40-45 दिनों के बाद पहाड़ी इलाकों में जब फसल 8-10 सैं.मी. कद की हो जाये तो नदीनों को हाथों से उखाड़ दें।
आमतौर पर आलुओं की फसल में नदीन नाशक की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि जड़ों को मिट्टी लगाने से सारे नदीन नष्ट हो जाते हैं। नदीनों के हमले को कम करने के लिए और मिट्टी की नमी को बचाने के लिए मलचिंग का तरीका भी प्रयोग किया जा सकता है, जिसमें मिट्टी पर धान की पराली और खेत के बची-कुची सामग्री बिछायी जा सकती है। बिजाई के 20-25 दिन बाद मलचिंग को हटा दें।

सिंचाई

खेत में नमी के अनुसार बिजाई के तुरंत बाद या 2-3 दिन बाद सिंचाई करें। सिंचाई हल्की करें, क्योंकि खुले पानी से पौधे गलने लग जाते हैं। दरमियानी से भारी जमीन में 3-4 सिंचाइयां और रेतली जमीनों में 8-12 सिंचाइयों की जरूरत पड़ती है। दूसरी सिंचाई मिट्टी की नमी के अनुसार बिजाई से 30-35 दिनों के बाद करें। बाकी की सिंचाइयां जमीन की नमी और फसल की जरूरत के अनुसार करें। कटाई के 10-12 दिन पहले सिंचाई करना बंद कर दें।

फसल की कटाई

डंठलों की कटाई : आलुओं को विषाणु से बचाने के लिए यह क्रिया बहुत जरूरी है और इससे आलुओं का आकार और गिणती भी बढ़ जाती है। इस क्रिया में सही समय पर पौधे को जमीन के नजदीक से काट दिया जाता है। इसका समय अलग अलग स्थानों पर अलग है और चेपे की जनसंख्या पर निर्भर करता है। उत्तरी भारत में यह क्रिया दिसंबर महीने में की जाती है।

पत्तों के पीले होने और जमीन पर गिरने से फसल की पुटाई की जा सकती है। फसल को डंठलों की कटाई के 15-20 दिन बाद जमीन की नमी सही होने से उखाड़ लें। पुटाई ट्रैक्टर और आलू उखाड़ने वाली मशीन से या कही से की जा सकती है। पुटाई के बाद आलुओं को सुखाने के लिए जमीन पर बिछा दें और 10-15 दिनों तक रखें ताकि उनपर छिल्का आ सके। खराब और सड़े हुए आलुओं को बाहर निकाल दें।

कटाई के बाद

सब से पहले आलुओं को छांट लें और खराब आलुओं को हटा दें। आलुओं को व्यास और आकार के अनुसार बांटे। बड़े आलू चिपस बनने के कारण अधिक मांग में रहते हैं। आलुओं को 4-7 डिग्री सैल्सियस तापमान और सही नमी पर भंडारण करें।

आलू विश्व की एक महत्तवपूर्ण सब्जियों वाली फसल है। यह एक सस्ती और आर्थिक फसल है, जिस कारण इसे गरीब आदमी का मित्र कहा जाता है। यह फसल दक्षिणी अमरीका की है और इस में काबोर्हाइड्रेट और विटामिन भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। आलू लगभग सभी राज्यों में उगाए जाते हैं। यह फसल सब्जी के लिए और चिप्स बनाने के लिए प्रयोग की जाती है। भारत में ज्यादातर उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बंगाल, पंजाब, कर्नाटका, आसाम और मध्य प्रदेश में आलू उगाए जाते हैं। पंजाब में जालंधर, होशियारपुर, लुधियाणा और पटियाला मुख्य आलू पैदा करने वाले क्षेत्र हैं।

किसानों को आलू की फसल अक्टूबर की शुरूआत में बोनी चाहिए: डॉ. दमन

  • किसानों को बीज आलू को कई गुणा करने के लिए सीड प्लॉट तकनीक का पालन करें

पंजाब बागवानी विभाग ने किसानों को परामर्श दिया है कि सीड प्लॉट तकनीक के तहत बीज आलू की बुआई अक्टूबर की शुरूआत में मौसम के तापमान को ध्यान में रख कर दी जानी चाहिए तथा इसे एफिड के हमले से बचाने के लिए दिसंबर के अंत तक फसल के पत्तों को काट लिया जाना चाहिए। सेंटर आफ एक्सीलेंस फार पोटेटो के परियोजना अधिकारी डॉ. दमनदीप सिंह ने बताया कि सर्दियों का मौसम शुरू होने वाला है और आलू रोपण का मौसम भी बहुत निकट है। उन्होंने कहा कि जो किसान बीज आलू को कई गुणा करना चाहते हैं, उन्हें सीड प्लॉट तकनीक का पालन करना चाहिए, जिसका उद्देश्य कम वेक्टर (एफिड) आबादी के दौरान वायरस मुक्त बीज आलू का उत्पादन करना है।

यह एफिड कीट संक्रमित पौधे से स्वस्थ पौधे तक आलू में विभिन्न वायरस के संचरण के लिए जिम्मेदार है, जो बीज फसल की उपज क्षमता में और बाधा डालता है। उन्होंने कहा कि सीड प्लॉट तकनीक के तहत किसानों को अक्टूबर की शुरूआत में फसल बोनी चाहिए और एफिड आबादी का निर्माण होने से पहले दिसंबर के अंत में निश्चित रूप से फसल के पौधों को काटना चाहिए।

बीज आलू कुछ विश्वसनीय स्रोत से ही खरीदे

डॉ. सिंह ने बताया कि पंजाब में आलू की फसल अधीन 1.06 लाख हेक्टेयर क्षेत्र शामिल है जिसमें 28.70 लाख मीट्रिक टन आलू का उत्पादन होता है। इस क्षेत्र का प्रमुख हिस्सा (लगभग 60 प्रतिशत) बीज आलू के अधीन है, जबकि बाकी का लगभग 40 प्रतिशत वेयर या खाने वाले आलू है।

उन्होंने कहा कि किसानों को रोपण की तैयारी शुरू करने की सलाह दी जाती है, विशेष रूप से उन किसानों को जो आलू वेयर या खाने के प्रयोजन के लिए शुरूआती आलू उगाते हैं। बीज की वायरस और रोग मुक्त गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए, बीज आलू केवल कुछ विश्वसनीय स्रोत से खरीदा जाना चाहिए। बीज आलू की सुस्ती समाप्त करने के लिए इस ठंडे भंडारण से बाहर निकाला जाना चाहिए। बीज आलू को छाया और अच्छी तरह से वातित क्षेत्र के नीचे सुखाने और फैलाने के लिए पतली परतों में और उसके स्प्राउट्स को शुरू करने के लिए

आठ से 10 दिन के लिए रखा जाना चाहिए।

आलू की कंद की गुणवत्ता को खराब करने वाली ब्लैक स्कर्फ की बीमारी को प्रारंभिक अवस्था में नियंत्रित किया जाना चाहिए, जो कि रोपण से पहले होती है।

इस बीमारी से छुटकारा पाने के लिए, दस लीटर पानी में 25 मिली की दर से मिश्रित उल्ली नाशक मोनसेरन के घोल में 10 मिनट तक डुबोकर बीज आलू का उपचार करें। आलू के पौधे काटने समय का आकलन करने के लिए अन्य विधि बीज आलू की फसल पर एफिड आबादी की नियमित रूप से निगरानी करना है और जब एफिड की गिनती प्रति 100 पत्तियों पर 20 एफिड तक पहुंच जाती है तो पौधों को काट दिया जाना चाहिए। बीज आलू की गुणवत्ता और खरीदार के विश्वास को बनाए रखने के लिए प्रमाणीकरण हमेशा एक आवश्यकता है।

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यहां बीज आलू के मामले में किसान संबंधित विभाग के माध्यम से बीज आलू प्रमाणीकरण से गुजर सकते हैं। विशेषज्ञ टीम के समय पर निरीक्षण से बीज उत्पादकों को मार्गदर्शन मिल सकता है कि वे आलू की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए पर्याप्त उपायों का पालन करें। रोपण के समय, आलू की फसल को पर्याप्त पोषण प्रदान करने के लिए, 82.5 किलोग्राम यूरिया, 155 किलोग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट और 40 किलोग्राम मुरेट आॅफ पोटाश प्रति एकड़ के आधार पर जमीन में डालना चाहिए।

पौधारोपण के समय यानी 25 से 30 दिनों के भीतर किया जाना चाहिए

खरपतवार को नियंत्रित करने के लिए 24 क्विंटल धान के पुआल को आलू बोने के तुरंत बाद डाला जा सकता है या जब आलू की फसल पांच से 10 प्रतिशत तक उग जाती है, तो पतवार को नियंत्रित करने के लिए ग्रामोक्सोन / कबूतो 24 एसएल का स्प्रे 500 से 750 मिली प्रति एकड़ की दर से छिड़काव किया जा सकता है। रोपण के समय लंबित 82.5 किग्रा यूरिया उर्वरक का प्रयोग पौधारोपण के समय यानी 25 से 30 दिनों के भीतर किया जाना चाहिए। बाद में, फसल की देखभाल में मोटे तौर पर केवल समय पर थोड़ी और बार-बार सिंचाई की जरूरत होती है और बड़ी बीमारी पिछेता झूलस रोग से बचाव होता है।

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