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वाहनों के धुएं से होने वाली मौतों में भारत सबसे आगे

Pollution

भारत में अकाल मौतों की संख्या में निरंतर वृद्धि होती जा रही है। मलेरिया, स्वाइन फ्लू , डेंगू ,कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों, गरीबी और भूख, कुपोषण वायु ,जल और ध्वनि प्रदूषण, नशे, मिलावट, तथा सड़क दुर्घटना आदि से प्रति वर्ष लाखों की संख्या में होने वाली अकाल मौतों की खबरें आये दिन मीडिया में छायी रहती है। मगर अब वाहनों के धुंवे से होने वाली अकाल मौतों से भी मानव जीवन सुरक्षित नहीं है। एक सर्वे रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत में वायु प्रदूषण से होने वाली करीब दो-तिहाई मौतें डीजल वाहनों के धुएं से हो सकती हैं। हमारे देश में शहरों के साथ ग्रामीण अंचलों में भी वाहनों के धुंवे से हवा जहरीली होती जा रही है।

इंटरनेशनल काउंसिल आॅन क्लीन ट्रांसपोर्टेशन, जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी आॅफ कोलोरैडो बॉल्डर के हाल ही में जारी अध्ययन में कहा गया है कि साल 2010 से 2015 के बीच भारत में वाहनों से निकले धुएं से होने वाली मौतों में 26 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। वर्ष 2015 में वैश्विक स्तर पर लगभग 385,000 मौतों की वजह वाहनों से निकला हुआ धुआं रहा। अध्ययन के अनुसार, साल 2015 में वाहनों से निकले धुएं की वजह से भारत में तकरीबन 74 हजार लोगों की मौत हुई। इनमें से करीब दो तिहाई मौतें डीजल वाहनों के धुएं से हो सकती हैं। अध्ययन में यह भी कहा गया है कि सभी तरह के गैसीय उत्सर्जन से वैश्विक स्तर पर 33.70 लाख लोगों की मौत हुई और इनमें से 3.85 लाख लोगों की मौत वाहनों से निकले धुएं की वजह से हुई है। अध्ययन से वैश्विक, क्षेत्रीय और स्थानीय स्वास्थ्य प्रभावों की सर्वाधिक विस्तृत तस्वीर मुहैया हुई परिवहन से प्रति एक लाख आबादी पर लंदन और पेरिस में हुई मौतें वैश्विक औसत से दो – तीन गुना अधिक है।

हमारे वातावरण में कई गैसें एक आनुपातिक संतुलन में होती हैं। इनमें आॅक्सीजन के साथ कार्बन डाई आॅक्साइड, कार्बन मोनो आॅक्साइड आदि शामिल हैं। इनकी मात्रा में थोड़ा भी हेरफेर से संतुलन बिगड़ने लगता है और हवा प्रदूषित होने लगती है। मानवजनित गतिविधियों के चलते वायुमंडल में कार्बन डाई आॅक्साइड, कार्बन मोनो आॅक्साइड और मीथेन जैसी गैसों की मात्रा बढ़ने लगी है। बड़ी संख्या में वाहनों का धुआं इस संतुलन को और बिगाड़ देता है। सर्दियों में यह स्थिति और भी घातक होने लगती है। सड़कों पर बेहताशा दौड़ने वाले वाहनों से निकलने वाला यह प्राणघातक धुंवा चलती फिरती मौत के सामान है जो पहले हमें विभिन्न बिमारियों में जकड़ता है और फिर मौत की नींद में सुलाते देर नहीं करता। आज भी हम इस चलती फिरती मौत से जाने अनजाने में बेफिक्र हो रहे हैं और अपने वाहनों की भली भांति सार संभाल में उदासीनता बरतते हैं और यही कारण है की धुंवा जनित बीमारियों के गाहे बगाहे शिकार हो जाते है।

देश की सड़कों पर हर साल वाहनों की बढ़ती संख्या भी प्रदूषण के बढ़ते स्तर के लिए जिम्मेदार है। डीजल वाहनों से निकलने वाले धुंवे का प्रदूषण फैलाने में योगदान कम नहीं होता। प्रदूषण जाँच की गाड़ियां आजकल स्थान स्थान पर खड़ी मिलती हैं मगर हम इस भागदौड़ भरी लाइफ स्टाइल में पांच मिनिट का समय भी नहीं निकालते। हमारी यही लापरवाही हमारे स्वास्थ्य को धीमें जहर से मौत के मुंह की और खींचती रहती है। वैसे तो आज पूरी दुनिया वायु प्रदूषण का शिकार हो रही है, लेकिन भारत के लिए यह समस्या कुछ ज्यादा ही घातक होती जा रही है। देश में लाखों वाहन ऐसे है जो वर्षों पुराने होकर खटारा हो गये हैं।

ऐसे वाहन आपको हर शहर में खतरनाक धुंवा छोड़ते मिल जायेंगे। ये वाहन पर्यावरण को प्रदूषित करने के साथ प्रदूषण भी फैला रहे हैं। जिससे लोग विभिन्न बीमारियों से ग्रस्त हो रहे हैं। लेकिन इस पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। यदि प्रदूषित धुंवा फैलाने वाले वाहनों की सख्ती से रोकथाम की जाये तो पर्यावरण में सुधार होने के साथ जनजीवन को भी बड़ी क्षति से बचाया जा सकता है।एक अन्य अध्ययन के मुताबिक पूरी दुनिया में 7 लाख से 47 लाख के बीच अकाल मौतें कम की जा सकती हैं। काले कार्बन के लिए जिन तकनीकों का विश्लेषण किया गया है, उनमें डीजल वाहनों के लिए फिल्टर लगाना, अधिक उत्सर्जन वाले वाहनों पर रोक, रसोई के चूल्हों को अपडेट करना, ईंट बनाने के लिए पारंपरिक भट्ठों की जगह अधिक प्रभावी भट्ठों का प्रयोग और कृषि कचरे को जलाने पर रोक शामिल है।

लेखक: बाल मुकुन्द ओझा

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