नागरिकता संशोधन बिल पर राजनीति

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citizenship amendment bill

आखिरकार नागरिकता संशोधन विधेयक लोकसभा में पारित हो गया। अब इसे राज्यसभा में पेश किया जाएगा, जहां सरकार की असली परीक्षा होगी। गृहमंत्री अमित शाह ने विपक्ष के कड़े विरोध के बीच कहा कि विधेयक अल्पसंख्यकों की बजाय घुसपैठियों के खिलाफ हैं। यह संविधान के किसी भी अनुच्छेद की अवज्ञा नहीं करता है। न ही यह धर्म के परिप्रेक्ष्य में भेदभाव करता है।

देश के मुसलमानों के कोई अधिकार छीनने की कोशिश इस कानून के जरिए नहीं की गई है। यह कानून असम, मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा और मणिपुर के आदिवासी इलाकों में लागू नहीं होगा। लोक-संपदा व संस्कृति के सरंक्षण के लिए मणिपुर को ईनर लाइन परमिट में शामिल किया गया है। विधेयक के पक्ष में 311 और विपक्ष को महज 80 मत मिल पाए। महाराश्ट्र में कांग्रेस और राश्ट्रीय कांग्रेस पार्टी से गठबंधन कर सरकार बना लेने के बावजूद शिवसेना विधेयक के पक्ष में रही।

हालांकि शिवसेना ने यह मांग जरूर की, कि शरणार्थियों को नागरिकता का हक मिलने के बाद 25 साल तक मतदान का अधिकार नहीं मिलना चाहिए। जेडीयू ने भी विधेयक का सर्मथन किया। अलबत्ता विधेयक के विरोध में पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में जबरदस्त गुस्सा दिखाई दे रहा है। असम बंद रहा और ममता बनर्जी ने विधेयक का विरोध करते हुए, नागरिकों को शरणार्थी नहीं बनने देने का दावा किया है। पूर्वोत्तर के वामपंथी दल भी विरोध में शामिल हैं। दरअसल, पाक, बांग्लादेश और अफगानिस्तान ऐसे मुस्लिम बहुल देश हैं, जिनमें गैर-मुस्लिम नागरिकों पर अत्याचार और स्त्रियों के साथ दुश्कर्म किए जाते हैं।

चूंकि ये देश एक समय अखंड भारत का हिस्सा थे, इसलिए इन तीनों देशों में हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध और पारसी बड़ी संख्या में रहते थे। 1947 में जब भारत से अलग होकर पाकिस्तान नया देश बना था, तब वहां 20 से 22 प्रतिशत गैर-मुस्लिमों की आबादी थी, जो अब घटकर दो प्रतिशत रह गई है। इसमें कोई दो राय नहीं कि विधेयक को लेकर सरकार के सामने पूर्वोत्तर भारत बड़ी चुनौती के रूप में पेश आ सकता है। क्योंकि इसके लोकसभा से पारित होने के साथ ही असम सहित अन्य पूर्वोत्तर के राज्यों और पश्चिम बंगाल में विरोध शुरू हो गया है।

खिलाफत से जुड़े दल प्रमुखों का कहना है कि सरकार ने उन्हें भरोसे में नहीं लिया। दरअसल भाजपा और असम गण परिशद् को छोड़ यहॉ ज्यादातर राजनीतिक दल कांग्रेस और मार्क्सवादी विचारधारा के प्रभाव में हैं। राजनीतिक पार्टियां इस बिल को वोट बैंक के रूप में देख रही है। हर पार्टी इस बिल के द्वारा राजनैतिक लाभ लेने की फिराक में है।

 

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