राजनीतिक आंदोलन: अहिंसक आंदोलनों का प्रभाव

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Political Movement Impact of Non-violent Movements

जैसा कि सभी जानते हैं कि आज हमारा समाज विस्फोटक और तनावग्रस्त है तथा विकासशील देशों के अधिकतर भागों में हिंसा देखने को मिलती है। भौतिक समृद्धि और अधिक शक्ति और संपत्ति की लालसा के कारण गरीबी बढ़ती जा रही है। साथ ही समाज में असमानता भी बढ़ती जा रही हैं और इन देशों में जनसंख्या के एक बडे वर्ग में निराशा और हीनता बढ़ रही है। इन कारकों से भारत सहित इन देशों में सामाजिक वातावरण हिंसक बन गया है किंतु यह भी सच है कि इन देशों में अहिंसक आंदोलन भी चले और वे अपनी राष्ट्रीय चिंताओं को उठाने में सफल रहे हैं।

स्पष्ट है कि सत्तारूढ शासकों द्वारा अनुचित नीतियों के कारण राजनीतिक आंदोलन चल रहे हैं। कुछ लोग इन नीतियों को जन विरोधी और जनता के अधिकारों का अतिक्रमण भी मानते हैं। प्रश्न यह उठता है कि क्या ऐसे विरोध प्रदर्शन या आंदोलन अहिंसक हैं। महात्मा गांधी के देश में यह प्रश्न महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने विश्व को अहिंसा और सत्याग्रह की अवधारणा दी और जिसके चलते भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की।

किसानों का आंदोलन अब तक अहिंसक रहा है और यह प्रभावी भी रहा है। हिंसा एक पाशविक प्रवृति है किंतु व्यक्ति की लालसाओं के चलते हिंसा व्यापक रूप से देखने को मिल रही है। पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर ने कहा था मनुष्य आरंभ से ही स्वतत्रंता के लिए संघर्ष कर रहा है। साथ ही वह अपनी पहचान बनाने का भी प्रयास कर रहा है कि क्या वह मानव उपलब्धियों में कुछ योगदान कर सकता है। इस अवसर से वंचित रहने पर वह उस सामाजिक प्रणााली के विरुद्ध निश्श्चित रूप से विदा्रेह करेगा जिसने उसे इससे वंचित किया है।

महात्मा गांधी के अनुसार हिंसा को शोषण कहा जा सकता है। एकीकृत नौकरशाही, बड़े संगठन, बड़े-बड़े उद्योग और व्यवसाय आदि मिलकर जनता के विरुद्ध हिंसा करते हैं। तथापि प्रशासन कितना भी निष्क्रिय रहे और जनता के कल्याण के प्रति चिंतित रहे उसमें शोषणकारी प्रवृति नहीं होती है तथापि शक्तियों का केन्द्रीयकरण वास्तविक विकास के लिए लाभप्रद नहीं हो सकता है। प्रसिद्ध गांधीवादी विद्वान प्रो0 सुगता दासगुप्ता ने उचित ही कहा है प्रशासन शोषण करता है और चूंकि हर शोषण से जनता को परेशानी होती है हिंसा का शोषण भी सभी लोगों को नुकसान पहुंचाता है।

राजनीतिक दृष्टिकोण को व्यापक बनाने का तात्पर्य राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है। जयप्रकाश नारायण की समग्र क्रांति लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण और भ्रष्टाचार मुक्त शासन का मिला-जुला स्परूप था और इससे देश की जनता व्यापक रूप से जुडी और लोग सरकार के विरुद्ध हो गए। हाल के दिनों में नागरिकता संशोधन अधिनियम विरोधी आंदोलन अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों से परे फैलने में असफल रहा और इससे सरकार का राजनीतिक गणित नहीं गड़बड़ाया।

इन दोनों मामलों में विशेषज्ञों का मानना है कि ये विरोध नेतृत्व के अभाव में एक निश्चित वर्ग तक सीमित रहे। इसलिए विपक्षी राजनीतिक दल सरकार की विफलताओं को नहीं भुना पाए और जिसके चलते नागरिक समाज के संगठनों को स्थान मिला और उनमें आक्रोश पैदा हुआ। किंतु इस बात से सभी सहमत होंगे कि नागरिकता संशोधन विरोधी आंदोलन जो दिसंबर 2019 से फरवरी 2020 तक चला था वह वास्तव में एक लोकतांत्रिक आंदोलन था जिसका नेतृत्व महिलाएं और छात्र कर रहे थे।

संविधान की प्रस्तावना, राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रीय गान इस जन आंदोलन के प्रतीक थे। इस आंदोलन को मिले समर्थन से सरकार घबरायी और उसने नागरिकता संशोधन अधिनियम विरोधी आंदोलन को देश विरोधी करार दिया और कहा कि यह आंदोलन अराजकता फैलाने और देश में कानून के शासन को भंग करने के लिए चलाया जा रहा है। विरोध को दबाने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून तथा विधि विरुद्ध कार्य कलाप निवारण कानून जैसे कठोर कानूनों का प्रयोग किया गया।

नागरिकता संशोधन अधिनियम विरोधी आंदोलन के एक अलगाववादी आंदोलन में बदलने और इसे सशस्त्र विद्रोह के रूप में प्रचारित करने से इसकी विश्वसनीयता पर प्रश्न चिह्न खडे हुए। दिल्ली दंगों के बारे में पुलिस के आरोप पत्रों में इस आंदोलन को इसी रूप में पेश किया गया है। वर्तमान में चल रहे किसान आंदोलन से यह साबित होता है कि सुदृढ़ नेतृत्व के बिना भी किसानों का मुद्दा सामने आया है। राजनीतिक विरोध प्रदर्शन और आंदोलन लोकतांत्रिक समाज में चलते रहेंगे हालांकि सत्तारूढ वर्ग अनैतिक साधनों द्वारा इन लोगों की मांग को नजरंदाज करने का प्रयास करेगा।

जैसा कि नागरिकता संशोधन कानून विरोधी आंदोलन और अब किसान आंदोलन में देखने को मिल रहा है। अहिंसा ऐसे आंदोलनों का आधार होना चाहिए और वह वांछनीय भी है। इन आंदोलनों के समक्ष राज्य का पलिस बल खडा है जो अक्सर हिंसा पर उतारू हो जाता है। हालांकि लोकतांत्रिक कार्यकरण में अनेक बाधाएं रही हैं किंतु समय-समय पर देश में आंदोलन होते रहे हैं और नीतिगत मुद्दों के विरुद्ध वे अपनी चिंताओं को व्यक्त करने में सफल रहे है।

भारत में लोगों की शक्ति और संयम की सराहना की जानी चाहिए। वे राज्य स्तर पर और रष्ट्रीय स्तर पर पुलिस और प्रशासन की बर्बर सख्तियों के बावजूद आंदोलन चलाने में सफल रहे हैं। महात्मा गांधी, डॉ मार्टिन लूथर किंग और ऐसे अन्य महापुरूषों ने संभवतया ऐसे आंदोलनों में जनता को निर्भय होकर खडे रहने के लिए प्रेरित किया है।

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