सम्पादकीय

राजनीतिक चक्रव्यू

Political milieu

राजनीति कितनी गहरी है इसका कोई अनुमान नहीं लगा सका। सत्ता के लिए राजनीति क्या नहीं करवा देती इस बात का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। राजनीति में प्रेम, दया, मिलनसार, भाईचारा किसी भी चीज का कोई मूल्य नहीं होता। राजनीतिक चक्रव्यू एक ही खतरनाक होता है परंतु अगर चक्रव्यू पांच-छह हो जाएं तो क्या होगा? किसी को नहीं पता चलता क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है। ऐसे ही कई चक्रव्यू का शिकार हुए हैं, डेरा श्रद्धालु व पंजाब के लोग। लोकतंत्र से ही सम्भव है कि पांच वर्षों के बाद केन्द्र व राज्य सरकारें बदलती हैं। कोई एक नेता या पार्टी सदा शासन नहीं करती। लेकिन इस पांच वर्षों वाले सिस्टम को सियासत ने धुंधला कर दिया है। प्रत्येक पांच वर्षों बाद चुनाव होते हैं, चुनावों को जीतने के लिए कोई मुद्दा चाहिए, मुद्दा हो या ना हो बनाया जाता है।

विपक्षी पार्टी को नीचे गिराने के लिए कुछ ना कुछ तो चाहिए। लेकिन पंजाब की राजनीति को धर्म का मुद्दा बड़ा ही रास आता है। जब एक से अधिक पार्टियां होंगी तो पार्टियों ने समाज को भी तो बांटना है। समाज बांटा नहीं जाएगा तो पाार्टियां कैसे मजबूत होगी। इसी राजनीति हथकंडे ने पहले देश को 1947 में बांटा। उस समय भी राजनीतिक नेताओं ने धार्मिक मुद्दों पर राजनीति की। देश आजाद होने के बाद भी उसी फार्मूले प्रयोग किया गया। देश के विकास की बजाय क्षेत्र विशेष, धर्म विशेष, जाति विशेष के नाम पर राजनीति की गई। समाज को बांटकर राजनीति करना एक खतरनाक है और ऐसे अनुभवों का संताप देश ने बहुत सहन कर लिया है।

जिस धर्म ने विश्व भाईचारे का संदेश दिया, उसी धर्म के नाम पर नफरत पैदा करके राजनीतिक फायदा लेने की कोशिश समाज के हित में नहीं। पंजाब के राजनीतिज्ञों को धर्म के नाम पर पैंतरबाजी करने की बजाय विकास के मुद्दों पर राजनीति लड़ाई लड़नी चाहिए। समाज में मानवता भलाई के कार्य करने वालों को मान-सम्मान दो या ना दो परंतु उन पर कलंक न लगाओ। राजनीति को अपनी सोच की गुलाम न बनाओ बल्कि राजनीति के आदर्शों को पूरा करने पर जोर लगाया जाए। देश बहुत पीछे है लोगों की कदर नहीं की गई और ना ही लोकतंत्र की। राजनीति ने लोकतंत्र के लिए लोगों की बलि दे दी है।

 

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