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भारत और पाकिस्तान के बीच शांति की पेशकश

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नार्वे की प्रधानमंत्री एरना सोलवर्ग की यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय मुद्दों के अलावा भारत और पाकिस्तान के बीच शांति स्थापना की उनकी पेशकश पर विचार किया जाएगा। प्रधानमंत्री मोदी से मिलने से पूर्व उन्होंने प्रेस से बात की और नई दिल्ली में नार्वे के नए राजदूतावास भवन का उद्घाटन किया और इस प्रेस वार्ता में कहा कि भारत और पाकिस्तान को वार्ता करनी चाहिए और कश्मीर की समस्या का कोई सैनिक समाधान नहीं हो सकता है तथा यदि भारत और पाकिस्तान चाहें तो हम मध्यस्थता कर सकते हैं किंतु कश्मीर मुद्दे में किसी तीसरे पक्षकार की भागीदारी के प्रति भारत की संवेदनशीलता को देखते हुए वे अपने बयान से मुकर गयी और नई दिल्ली स्थित नार्वे के राजदूत ने एक ट्वीट कर स्पष्ट किया कि हमने न मध्यस्थता करने के लिए कहा गया है और न ही हमाने मध्यस्थता की पेशकश की है। इस संवेदनशील मुद्दे पर कूटनयिक असंतोष के मद्देनजर नार्वे द्वारामध्यस्थता की पेशकश वास्तव में गंभीर है और उनके इरादे स्पष्ट हैं। वे शांति स्थापना के लिए कार्य करना चाहते हैं।

नार्वे और स्वीडन मिलकर विश्व शांति के लिए नोबल पुरस्कार देते हैं। नार्वे एक समृद्ध और शांतिप्रिय देश है। विश्व खुशहाली सूचकांक में नार्वे पिछले 13 सालों से शीर्ष स्थान पर है। केवल पिछले वर्ष वह फिनलैंड के बाद दूसरे स्थान पर आया है। वहां पर सर्वोत्तम जीवन दशाएं हैं, जीवन प्रत्याशा ऊंची है तथा शिक्षा ओर स्वास्थ्य देखरेख व्यवस्थाएं सर्वोत्तम हैं और नार्वे मानता है कि उनके देश की जनता की तरह विश्व के अन्य देशों की जनता को भी शांति और सुरक्षा के साथ रहना चाहिए। आज के पारस्परिक निर्भर और वैश्विक दुनिया में संघर्ष और हिंसा अन्य देशों को भी प्रभावित करती है। नार्वे का मानना है कि हालांकि उसके पड़ोसी देश शांतिप्रिय हैं और वह विश्व के अशांत देशों से भौगोलिक दृष्टि से बहुत दूर है और इसीलिए शायद नार्वे शांति पर अधिक बल देता है।

शांति के बारे में अध्ययन के बारे में उनके यहां जोहान गालटुंग जैसे प्रसिद्ध विद्वान हुए हैं। 2018 में नार्वे ने कोलंबिया सरकार और वहां के विद्रोही समूह रिवोल्यूशनरी आर्म्ड फोर्सेस कोलंबिया के बीच शांति मध्यस्थता की। उससे पहले श्रीलंका सरकार और लिट्टे के बीच शांति वार्ता में भाग लिया। श्रीलंका में वे सफल नहीं हुए क्योंकि श्रीलंका सरकार की सेनाओं को लिट्टे का विनाश करने की अुनमति दी गयी इसलिए नार्वे के प्रधानमंत्री की पेशकश स्वत: नहीं है अपितु यह सुविचारित राजनीतिक पहल है। हाल ही में 23 नवंबर 2018 को नार्वे के पूर्व प्रधानमंत्री बोंडेविक कश्मीर यात्रा पर आए थे और वे नियंत्रण रेखा पार कर वार्ता के लिए पाक अधिकृत कश्मीर भी गए। उन्होने सैयद अली शाह गिलानी और मीरवाइज उमर फारूख जैसे हुर्रियत नेताओं से भी बात की तथा बोंडेविक की यात्रा भारत सरकार की सहमति के बिना नहीं हो सकती थी और ऐसा समझा जाता है कि इसे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का वरदहस्त प्राप्त था।

भारत की विदेश नीति को ध्यान में रखते हुए नार्वे के प्रधानमंत्री ने भी बोंडेविक की यात्रा को राजकीय स्वीकृति नहीं दी। उन्होंने कहा कि बोंडेविक इंस्टीट्यूट फोर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन नामक एक प्राइवेट संस्था को चलाते हैं और उनकी यात्रा एक अध्ययन दौरा था जिसे उनकी सरकार की स्वीकृति नहीं मिली थी। नार्वे चाहता है कि भारत और पाकिस्तान वार्ता करें और भारतीय उपमहाद्वीप में स्थायी शांति स्थापित हो किंतु पाकिस्तान के साथ शांति वार्ता के बारे में मोदी और उनकी सरकार कितनी गंभीर है?
केन्द्र सरकार की स्वीकृति से बोंडेविक की यात्रा और सोलवर्ग द्वारा कश्मीर पर की गयी टिप्पणी पर विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया न आना और कश्मीर मुद्दे पर मध्यस्थता की पेशकश करने से लगता है भारत कश्मीर के मुद्दे पर अपने मित्र तथा शक्तिशाली और शांतिप्रिय देशों से परामर्श करना चाहता है और इस तरह से वह संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार आयोग की रिपोर्ट में कश्मीर के मुद्दे को उछाले जाने का प्रतिकार कर सकता है।

हालांकि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कश्मीर सहित किसी भी मुद्दे पर भारत के साथ वार्ता करने की अपनी इच्छा व्यक्त कर चुके हैं और उन्होने यह भी स्पष्ट किया कि वे संघर्ष को समाप्त करने के लिए हिंसा को अवैध घोषित करना चाहते हैं किंतु उनकी सेना आतंकवाद को निरंतर बढ़ावा दे रही है। भारत का कहना है कि आतंकवाद ओर वार्ता साथ साथ नहीं चल सकते हैं और वार्ता शुरू करने के लिए उसकी पूर्व शर्त है कि सीमा पार से हिंसा समाप्त हो और यही गतिरोध का मुख्य कारण है। सोलवर्ग की टिप्प्णी का मुख्य भाग यह है कि उन्होने कहा है कि भारत और पाकिस्तान को अपना रक्षा बजट कम करना चाहिए। स्वास्थ्य और शिक्षा पर अधिक व्यय करना चाहिए। ये दोनों पक्ष समझते हैं कि कश्मीर समस्या का सैनिक समाधान नहीं है और यदि पाकिस्तान के प्रध्धानमंत्री कहते हैं कि दक्षिण एशिया में हमें गरीबी का मुकाबला करना चाहिए न कि एक दूसरे का तो फिर हमें सैनिक व्यय के बारे में नार्वे के प्रधानमंत्री के सुझाव को ध्यान में रखना चाहिए जो अत्यधिक है और एक तरह से बहुमूल्य संसाधनों की आपराधिक बर्बादी है।

क्या भारत और पाकिस्तान के समक्ष विकास का गुरूत्तर कार्य नहीं है? ये आंकडे सब कुछ स्पष्ट कर देते हैं। विश्व में प्रति वर्ष परमाणु हथियारों पर 100 बिलियन अमरीकी डॉलर खर्च किए जाते हैं जबकि विश्व से अत्यधिक गरीबी मिटाने और हर किसी को प्राथमिक शिक्षा देने पर भी 100 बिलियन अमरीकी डॉलर का ही खर्च आता है। भारत और पाकिस्तान द्वारा अपने रक्षा बजट में छोटी सी कटौती से भी स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए बहुत सा पैसा मिल सकता है। यह सिद्ध हो चुका है कि विकासशीलदेशों की अर्थव्यवस्था में बंदूक से बेकार चीज कोई नहीं है और उनके सामाजिक विकास में सबसे बड़ी बाधा युद्ध का वित्तीय भार है।

डा. डीके. गिरी
प्रो. अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, जेएमआई

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