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एचएयू को मिला खजूर के नर व मादा पौधों की पहचान की तकनीक का पेटैंट

Haryana Agricultural University

इस तकनीक को भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा प्रदान की गई परियोजना के तहत विकसित किया है | Haryana Agricultural University

हिसार (एजेंसी)। चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (Haryana Agricultural University) के वैज्ञानिकों की ओर से खजूर के नर एवं मादा पौधों की पहचान करने के लिए विकसित तकनीक को भारत सरकार के पेटैंट आॅफिस द्वारा पेटैंट प्रदान किया गया है। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. के.पी. सिंह ने आज यहां बताया कि खजूर में नर एवं मादा पौधे अलग-अलग होते हैं जिनकी बीज से अंकुरित होने के चार से पांच साल बाद, जब उन पर पहली बार फूल खिलते हैं, पहचान हो पाती है। उक्त तकनीक (स्कार मारकर) से खजूर के नर और मादा पौधों की पहचान अब फूल खिलने की अवस्था की अपेक्षा नर्सरी अवस्था पर ही की जा सकेगी।

कुलपति ने कहा कि यह तकनीक विश्वभर के खजूर उत्पादकों के लिए उपयोगी होगी क्योंकि एक नर पौधा 50 से 60 मादा पौधों को परागकण देने के लिए पर्याप्त रहता है। यह अब तक इस विश्वविद्यालय को प्रदान किया गया 16वां पेटैंट है, जबकि इसके द्वारा यहां विकसित की गई 43 तकनीकों को पेटैंट कराने के लिए आवेदन किया गया है। उन्होंने बताया देश में खजूर की खेती राजस्थान, गुजरात व अन्य शुष्क क्षेत्रों में होती है। उपरोक्त तकनीक खजूर उत्पादक किसानों के लिए बहुत लाभकारी साबित होगी क्योंकि इस तकनीक से समय, जमीन, लागत एवं मेहनत सभी क्षेत्रों में लाभ होगा।

इस तकनीक को प्रो. पुष्पा खरब ने भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा प्रदान की गई परियोजना के तहत विकसित किया है। इस तकनीक के विकास में उनकी पी-एच.डी. की छात्रा चारू मिश्रा ने भी कार्य किया है। प्रो. खरब ने बताया कि बीज से उगाए जाने पर नर एवं मादा पौधों का अनुपात लगभग बराबर होता है। क्योंकि फल केवल मादा पौधे पर लगते हैं, जबकि नर पौधों की आवश्यकता केवल परागकण देने के लिए होती है, इसलिए मादा पौधे अधिक सं या में उगाने की जरूरत होती है।

इस उपलब्धि पर खुशी जताते हुए विश्वविद्यालय के अनुसंधान निदेशक डॉ. एस.के. सहरावत और मौलिक विज्ञान एवं मानविकी महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. राजवीर सिंह ने दावा किया है कि खजूर में लिंग की नर्सरी स्तर पर पहचान करने की यह विश्व में पहली तकनीक है।

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