…इहनां तां सिरे वाली गल्ल कह तीं

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PARAM PITA SHAH SATNAM SINGH JI MAHARAJ

15 सितंबर 1969
पूज्य परम पिता जी गाँव त्योणा पुजारियां जिला भटिण्डा में सत्संग फरमाने के उपरांत भाई चन्द सिंह तथा नन्द सिंह के घर गाँव तंगराली में पधारे। उस घर में परम पिता जी की धर्मपत्नी पूज्य माता गुरदेव कौर जी के ननिहाल है। वहाँ पर परम पिता जी परिवार के सभी सदस्यों से मिले और सभी की कुशलता पूछी। इस घर के पास बरगद के पेड़ लगे हुए थे। परम पिता जी ने उन पेड़ों को देखते हुए वचन फरमाया, ‘‘अपने आश्रम में भी बरगद के पौधे लगाने हैं।’’ इस पर परिवार के सदस्यों ने कहा कि हम बरगद के पौधे दरबार में ले आएंगे।

जब परम पिता जी वहाँ से चलने लगे तो चन्द सिंह जी (परम पिता जी के रिश्तेदार) परम पिता जी को सम्मान के तौर पर कम्बल देने लगे तो परम पिता जी ने फरमाया, ‘‘चन्द सिंह, अब हम संत हैं। इसलिए हम किसी से कुछ नहीं लेते।’’ भाई चन्द सिंह ने विनती की कि पिता जी, हम आपको संत के तौर पर नहीं दे रहे बल्कि हम तो रिश्तेदारी के रूप में दे रहे हैं। परम पिता जी ने सेवादार से कहा, ‘‘ले लो भाई, अब तो इन्होंने सिरे वाली बात कह दी है।’’

जब दिल की तड़फ सतगुरु ने सुनी

17 जनवरी 1976
गाँव महमा सरजा (पंजाब) में सत्संग था। पूजनीय परम पिता जी शाम के समय अधिकांशत: बाहर खेतों में घूमने जाया करते। वहां गुरबचन सिंह फौजी नाम का एक व्यक्ति था, जिसका घर गाँव से बाहर था। उसने सोचा कि काश! उसका घर भी पक्का व सुंदर होता तो वह भी पिता जी से अपने घर पर चरण टिकाने की प्रार्थना कर सकता। पिता जी घूमने के लिए खेतों की तरफ जा रहे थे। जैसे ही उस फौजी भाई का घर आया तो पिता जी उसके घर जाकर वहाँ पर रखे एक मूढ़े पर जा बैठे। फौजी की आँखों से प्रेम व खुशी के आँसू बहने लगे।

उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। पिता जी ने उसकी सच्ची तड़प को पूरा किया तथा स्वयं कहकर उससे चाय बनवाई। पिता जी ने वचन किए, ‘‘परवाह न कर! मालिक खुशियां बख्शेगा।’’ उस इन्सान पर प्यारे मुर्शिद जी ने इतनी रहमत की कि उस फौजी के चार पुत्र सरकारी नौकरी पर हैं। सारा परिवार साध-संगत की सेवा में बढ़-चढ़ कर योगदान देता है। परम पिता जी ने अपने वचनों के द्वारा उसकी निर्धनता दूर करके उसे खुशहाली बख्श दी।

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