सम्पादकीय

अमेरिका व चीन के शिकंजे में घिरा पाक

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चीन के बाद अमेरिका ने भी पाकिस्तान से आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई के लिए शिकंजा कस दिया है। अमेरिकी विदेश मंत्री ने सीधा पाकिस्तान सैना प्रमुख के साथ फोन पर बात करते आतंकवादियों के खिलाफ निष्पक्षता से कार्रवाई करने पर जोर दिया है। इससे पहले चीन ने पाकिस्तान को हाफिज मोहम्मद सईद को देश से बाहर निकालने के लिए कह दिया था।

पाकिस्तान के पुराने साथी रहे अमेरिका व चीन दोनोें देश ही अब पाकिस्तान को नसीहत देने के साथ-साथ चेतावनी भरे लहजे में समझाने लगे हैं। दरअसल आतंकवाद का प्रभाव सिर्फ एशिया तक ही सीमित नहीं रहा। अमेरिका से लेकर यूरोप के ताकतवर देश भी इससे प्रभावित हो रहे हैं।

आतंकवाद की जड़ें अरब देशों से लेकर अफ्गानिस्तान से लेकर पाकिस्तान तक जुड़ती हैं। पाकिस्तान को चीन का साथ खुराक दे रहा था लेकिन अंतरराष्टÑीय स्तर पर आतंकवाद एक बड़ी बुराई के तौर पर उभर रहा है। दूसरी तरफ ताकतवर देशों ने अपना साम्राज्य चेहरा बदलकर इसको आर्थिक साम्राज्यवाद का रूप दे दिया है।

आतंकवाद के प्रयोग से रणनीति कमजोर पड़ रही है। आतंकवाद के खात्मे को अंतरराष्टÑीय स्तर पर सहमति मिल चुकी है। सीरिया में आईएसआईएस के खात्मे के लिए युद्ध जैसी कार्रवाई की गई। अमेरिका, चीन व रूस के बीच हितों का टकराव होने के बावजूद आतंकवाद को मानवता का दुश्मन माना गया है।

ऐसे हालातों में पाकिस्तान पांच दशक पुराने विश्व के भ्रम में रह रहा है। इस लिए नए हालात पाकिस्तान के लिए हैरानीजनक होंगे लेकिन यह हकीकत है जिससे इन्कार नहीं किया जा सकता। खास कर चीन की ओर से घूरना पाकिस्तान को काफी मुश्किल लग रहा है। मौजूदा घटनाकर्म भारत की जीत है।

जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान सेना व आतंकवादियों का गठबंधन हिंसा फैला रहा है। भारत सरकार ने आतंकवाद को मुंहतोड़ जवाब देने के साथ-साथ शांति के प्रयासों का भी पल्ला नहीं छोड़ा। जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी सीमा पर पाकिस्तान की हार देखकर पत्थरबाजों को भड़का रहे हैं।

पाकिस्तान को यह बात समझ लेनी चाहिए कि आतंकवाद अंतरराष्टÑीय स्तर पर हार रहा है। जम्मू-कश्मीर मामले का हल सिर्फ आपसी बातचीत से ही संभव है। गोली व बातचीत एक समय नहीं हो सकती। यह बात अब अमेरिका व चीन के इशारे भी पाकिस्तान को समझा रहे हैं। कश्मीर बारे अड़ियल रवैया अपनाने की बजाए पाकिस्तान को अमन व खुशहाली का रास्ता चुनना चाहिए।

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