धान की खेती

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Paddy Farming

धान भारत की एक महत्तवपूर्ण फसल है, जो कि जोताई योग्य क्षेत्र के लगभग एक चौथाई हिस्से में उगाई जाती है और भारत की लगभग आधी आबादी इसे मुख्य भोजन के रूप में प्रयोग करती है। पिछले 45 वर्षों के दौरान पंजाब ने धान की पैदावार में बहुत ज्यादा उन्नति हासिल की है। नई टैकनोलोजी और अच्छी पैदावार करने वाले बीजों के प्रयोग के कारण धान की पैदावार पंजाब में सबसे ज्यादा होती है।

जलवायु-

  • तापमान- 16-30 डिग्र्री सेल्सियस
  • वर्षा- 100-200 सेमी.
  • बुआई के समय तापमान- 20-30 डिग्री सेल्सियस
  • कटाई के समय तापमान-16-27 डिग्री सेल्सियस

मिट्टी-

इस फसल को मिट्टी की अलग-अलग किस्मों, जिनमें पानी सोखने की क्षमता कम होती है और जिनकी पीएच 5.0 से 9.5 के बीच में होती है, में भी उगाया जा सकता है। धान की पैदावार के लिए रेतली से लेकर गारी मिट्टी तक और गारी से चिकनी मिट्टी जिसमें पानी को सोखने की क्षमता कम होती है इस फसल के लिए अच्छी मानी जाती है।

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

पीआर128: धान की यह किस्म पीएयू 201 की उन्नत किस्म है। इसके दाने लंबे पतले और स्पष्ट पारदर्शी होते हैं। इसके पौधे का औसतन कद 110 सैं.मी. होता है, रोपाई के बाद यह किस्म 11 दिनों में पक जाती हैं। यह किस्म पंजाब राज्य बैक्टीरियल ब्लाइट पैथोजन के 10 प्रचलित पैथोटाइप्स के प्रतिरोधक है। इस किस्म की औसतन उपज 30.5 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

पीआर129: धान की यह किस्म पीएयू 201 की उन्नत किस्म है। इसके दाने लंबे पतले और स्पष्ट पारदर्शी होते हैं। इसके पौधे का औसतन कद 105 सैं.मी.होता है। रोपाई के बाद यह किस्म 108 दिनों में पक जाती हैं। यह किस्म पंजाब राज्य बैक्टीरियल ब्लाइट पैथोजन के 10 प्रचलित पैथोटाइप्स के प्रतिरोधक है। इस किस्म की औसतन उपज 30.0 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

जमीन की तैयारी

गेहूं की कटाई के बाद जमीन पर हरी खाद के तौर पर मई के पहले सप्ताह ढैंचा (बीज दर 20 किलोग्राम प्रति एकड़), या सन (बीज दर 20 किलोग्राम प्रति एकड़) या लोबीया (बीज दर 12 किलोग्राम प्रति एकड़) की बिजाई करनी चाहिए। जब फसल 6 से 8 सप्ताह की हो जाए तो इसे खेत में कद्दू करने से एक दिन में ही जोत देना चाहिए। इस तरह प्रति एकड़ 25 किलो नाइट्रोजन खाद की बचत होती है। भूमि को समतल करने के लिए लेजर लेवलर का प्रयोग किया जाता है। इसके बाद खेत में पानी खड़ा कर दें ताकि भूमि के अंदर ऊंचे नीचे स्थानों की पहचान हो सके। इस तरह पानी के रसाव के कारण पानी की होने वाले बर्बादी को कम किया जा सके।

बीज की मात्रा

छींटे द्वारा की जाने वाली बिजाई के लिए 7-8 किलोग्राम प्रति एकड़ बीज का प्रयोग किया जाता है। गड्ढा खोदकर की जाने वाली बिजाई के लिए 7-9 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ डाला जाता है। वैट बैड और सूखे बैड बनाकर लगाई जाने वाली पनीरी के लिए 10-12 किलोग्राम बीज 500 वर्ग मीटर में प्रयोग किया जाता है जो कि एक एकड़ खेत के लिए बहुत होता है। मॉडीफाइड बैड नर्सरी के लिए 8-10 किलोग्राम बीज 200 वर्ग मीटर में प्रयोग किया जाता है जो कि एक एकड़ खेत के लिए बहुत होता है।

बीजों का उपचार

बिजाई से पहले 10 लीटर पानी में 20 ग्राम कार्बेनडाजिम + 1 ग्राम स्ट्रैप्टोसाईक्लिन घोल लें और इस घोल में बीजो को 8-10 घंटे तक भिगोयें। उसके बाद बीजों को छांव में सुखाएं और फिर बीज बिजाई के लिए तैयार हैं। फसल को जड़ गलन रोग से बचाने के लिए नीचे दिए गए फंगसनाशी का प्रयोग किया जा सकता है। पहले रासायनिक फंगीनाशी का प्रयोग करो फिर बीजों का टराईकोडरमा के साथ उपचार करें।

बिजाई का समय

  • इसकी बिजाई के लिए जून का समय अनुकूल होता है।

फासला

  • सही समय पर उगाई जाने वाली फसल के लिए पंक्तियों का फासला 20-22.5 सैं.मी. रखा जाता है।
  • यदि फसल की बिजाई पिछेती होती है। तो फासला 15-18 सैं.मी. रखना चाहिए।

बिजाई का ढंग

इसकी बिजाई छींटे द्वारा की जाती है।

पौधे की गहराई

  • पौधे की गहराई 2-3 सैं.मी. होनी चाहिए।
  • फासला बनाकर लगाने से पौधे ज्यादा पैदावार देते हैं।

पनीरी की देख-रेख और रोपण

बिजाई से पहले 10 लीटर पानी में 20 ग्राम कार्बेनडाजिम @ 1 ग्राम स्ट्रैप्टोसाईक्लिन घोल लें और इस घोल में बीजों को 8-10 घंटे तक भिगोयें। उसके बाद बीजों को छांव में सुखाएं इस तरह बीज बिजाई के लिए तैयार होते हैं।

नर्सरी तैयार करना

नर्सरी तैयार करने के लिए 15 से 30 मई तक का अनुकूल समय होता है।

वैट बैड नर्सरी : यह तकनीक उन क्षेत्रों में अपनाई जाती है जहां पर पानी ज्यादा मात्रा में पाया जाता है। नर्सरी का 1/10 हिस्सा दूसरे खेत में लगाया जाता है। इसकी बिजाई छींटे द्वारा की जाती है। यहां पर खेत की जोताई और खेत को समतल किया जाता है। बैडों पर कईं दिन तक नमी बनाए रखनी चाहिए। पानी से खेत को ज्यादा ना भरें। जब नर्सरी 2 सैं.मी. से वृद्धि कर जाए तब पानी को खेत में लगाते रहना चाहिए। बिजाई के 15 दिन बाद 26 किलो यूरिया डालना चाहिए। जब नर्सरी 25-30 सैं.मी. तक लंबी हो जाए तब उसे 15-21 दिन बाद दूसरे खेत में लगा देना चाहिए और खेत को लगातार पानी लगाते रहना चाहिए।

सूखे बैड वाली नर्सरी : यह तकनीक शुष्क क्षेत्रों में अपनाई जाती है। जो बैड बनाया जाता है वो बिजाई वाले खेत का 1/10 हिस्से में बीज बोया जाता है। बैड का आकार सीमित होना चाहिए और उसकी ऊंचाई 6-10 से.मी होनी चाहिए। धान का आधा जला हुआ छिलका बैड पर बिखेर देना चाहिए। इससे जड़ें मजबूत होती हैं। सही समय पर सिंचाई करते रहना चाहिए और नमी बनाए रखना चाहिए ताकि नए पौधे नष्ट ना हों। तत्वों की पूर्ति के लिए खाद डालना जरूरी है।

पनीरी लगाने का ढंग

1. कद्दू करके लगाई जाने वाली पनीरी : आमतौर पर पंक्ति में लगाए जाने वाले पौधे 20 गुणा 15 सैं.मी. दूरी पर लगाए जाते हैं और देरी से लगाई जाने वाली पनीरी 15 गुणा 15 सैं.मी. पर लगाई जाती है। नए पौधों की गहराई 2-3 सैं.मी. होनी चाहिए।
2. बैड बनाकर लगाई जाने वाली पनीरी : यह बैड भारी जमीनों के लिए बनाए जाते हैं। पनीरी लगाने से पहले खालियों में पानी लगाना चाहिए और फिर पनीरी को खेत में लगाना चाहिए। पौधे से पौधे का फासला 9 सैं.मी. होना चाहिए।
3. मशीनी ढंग से लगाई जाने वाली पनीरी : मैट पनीरी के लिए मशीनों का प्रयोग किया जाता है। यह मशीन 30 गुणा 12 सैं.मी. के फासले पर पनीरी लगानी चाहिए।

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खरपतवार नियंत्रण-

पौध को खेत में बीजने से 2-3 दिन बाद 1200 मि.ली. बूटाक्लोर 50 ई.सी. या 1200 मि.ली. थायोबैनकार्ब 50 ई.सी. या 1000 मि.ली. पैंडीमैथालीन 30 ई.सी. या 600 मि.ली. परैटीलाकलोर 50 ई.सी. प्रति एकड़ नामक बूटीनाशकों का प्रयोग करना चाहिए। इनमें से किसी भी बूटी नाशक को 60 किलोग्राम मिट्टी में मिलाकर 4-5 सैं.मी. खड़े पानी में फैला दें। चौड़े पत्ते वाले नदीनों की रोकथाम के लिए 30 ग्राम मैटसल्फरोन 20 डब्लयू पी को प्रति एकड़ के हिसाब से 150 लीटर पानी में मिलाकर बीजने से 20-25 दिनों के बाद छिड़काव करना चाहिए। छिड़काव करने से पहले खेत में रूके हुए पानी को निकाल दें और छिड़काव करने के एक दिन बाद खेत को फिर पानी दें।

हानिकारक कीट और रोकथाम

जड़ की सुंडी : जड़ को लगने वाली सुंडी की पहचान बूटों की जड़ और पत्तों को पहुंचे नुकसान से लगाई जा सकती है। यह सफेद रंग की बिना टांगों वाली होती है। यह मुख्य तौर पर पौधे की जड़ पर ही हमला करती है। इसके हमले के बाद पौधे पीले होने शुरू होने लगते है और उनका विकास रूक जाता है। इस कारण धान के पत्तों के ऊपर दानों के निशान उभर आते हैं। इसका हमला दिखने पर कार्बरिल (4 जी) @ 10 किलो या फोरेट (10 जी) @4 किलो या कार्बोफियूरॉन (3 जी) @10 किलो को प्रति एकड़ में डालें।

पौधे का टिड्डा : इन कीटों का फसल के ऊपर हमला खड़े पानी वाले या वर्षा पर निर्भर क्षेत्रों में ज्यादा होता है। इनकी मौजूदगी का अंदाजा बूटों के ऊपर भूरे रंग में तबदील होने और पौधों की जड़ों के नजदीक शहद जैसी बूंदों की मौजूदगी से लगता है। यदि इसका हमला दिखे तो डाइक्लोरवॉस 126 मि.ली. या कार्बरील 400 ग्राम को 250 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें या इमीडाक्लोप्रिड 40 मि.ली. या क्विनलफॉस 25 ई सी 400 मि.ली. या क्लोरपाइरीफॉस 1 लीटर को 100 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में छिड़काव करें।

बीमारियां और रोकथाम-

भुरड़ रोग : झुलस रोग के कारण पत्तों के ऊपर तिरछे धब्बे जो कि अंदर से सलेटी रंग और बाहर से भूरे रंग के दिखाई देते हैं। इससे फसल की बालियां गल जाती हैं और उसके दाने गिरने शुरू हो जाते हैं। जिन क्षेत्रों में नाइट्रोजन का बहुत ज्यादा प्रयोग किया जाता है। वहां इस बीमारी का प्रभाव ज्यादा देखने को मिलता है। इसका हमला दिखने पर जिनेब 500 ग्राम को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।

करनाल बंट : लाग की शुरूआत पहले बालियों के कुछ दानों पर होती है और इससे ग्रसित दाने बाद में काले रंग का चूरा बन जाते हैं। हालत ज्यादा खराब होने की सूरत में पूरे का पूरा सिट्टा प्रभावित होता है। और सारा सिट्टा खराब होकर काला चूरा बनके पत्ते दानों पर गिरना शुरू हो जाते है। इस बीमारी की रोकथाम के लिए नाइट्रोजन का ज्यादा प्रयोग करने से परहेज करना चाहिए। जब फसल पर 10 प्रतिशत बालिया निकल जायें, तब टिल्ट 25 ई सी 200 मि.ली. को 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। 10 दिनों के अंतराल पर दोबारा स्प्रे करें।

भूरे रंग के धब्बे : 

पत्तों के भूरेपन के लक्षण की पहचान पत्तों के ऊपर अंदर से गहरे भूरे रंग और बाहरे से हल्के भूरे रंग के अंडाकार या लंबाकार धब्बों से होती है। यह धब्बे दानों के ऊपर भी पड़ जाते हैं। जिस मिट्टी में पौष्टिक तत्वों की कमी पाई जाती है। वहां इस बीमारी का हमला ज्यादा देखने को मिलता है। इस बीमारी की रोकथाम के लिए सही मात्रा में मिट्टी में पौष्टिक तत्व डालते रहने चाहिए। जब बालियां बननी शुरू हो जाए उस समय 200 मि.ली. टैबूकोनाजोल या 200 मि.ली. प्रोपीकोनाजोल को 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। 15 दिनों के अंतराल पर दोबारा स्प्रे करें।

झूठी कांगियारी: इस रोग के कारण फफूंद की तरह हर दाने के ऊपर हरे रंग की परत जम जाती है। उच्च नमी, ज्यादा वर्षा और बादलवाई हालातों में यह बीमारी के फैलने का खतरा बढ़ जाता है। नाइट्रोजन के ज्यादा प्रयोग से भी इस बीमारी का खतरा बढ़ जाता है। इसकी रोकथाम के लिए जब बालियां बननी शुरू हो जाये उस समय 500 ग्राम कॉपर आॅक्सीक्लोराइड को 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। 10 दिनों के अंतराल पर टिल्ट 25 ई सी 200 मि.ली. को 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

तने का झुलस रोग: पत्तों की परत के ऊपर सलेटी रंग के जामुनी रंग की धारी वाले धब्बे पड़ जाते हैं। बाद में यह धब्बे बड़े हो जाते हैं। इस बीमारी का हमला ज्यादा हो तो फसल में ज्यादा दाना नहीं पड़ता। नाइट्रोजन का ज्यादा प्रयोग नहीं करना चाहिए। खेत का साफ सुथरा रखें। यदि इसका हमला दिखे तो टैबुकोनाजोल या टिल्ट 25 ई सी 200 मि.ली. या कार्बेनडाजिम 25 प्रतिशत 200 ग्राम को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें। 15 दिनों के अंतराल पर दोबारा स्प्रे करें।

फसल की कटाई

जब दाने पूरी तरह पक जायें और फसल का रंग सुनहरी हो जाये तो खड़ी फसल की कटाई कर लेनी चाहिए। ज्यादातर फसल की कटाई हाथों से द्राती से या कंबाइन से की जाती है। काटी गई फसल के बंडल बनाके उनको छांटा जाता है। दानों को बालियों से अलग कर लिया जाता है। दानों को बालियों से अलग करने के बाद उसकी छंटाई की जाती है।

कटाई के बाद

धान की कटाई करने के बाद पैदावार को काटने से लेकर प्रयोग तक नीचे लिखी प्रक्रिया अपनाई जाती है।

  • 1.कटाई
  • 2. छंटाई
  • 3. सफाई
  • 4. सुखाना
  • 5. गोदाम में रखना
  • 6.पॉलिश करना और इसके बाद इसे बेचने के लिए भेजना।

दानों को स्टोर करने से पहले इन्हें कीटों और बीमारियों से बचाने के लिए 10 किलोग्राम दानों के लिए 500 ग्राम नीम के पाउडर को मिलाना चाहिए। स्टोर किए गए दानों को कीटों के हमले से बचाने के लिए 30 मि.ली. मैलाथियोन 50 ई.सी. को 3 लीटर पानी में घोल तैयार करके इसका छिड़काव करना चाहिए। इस घोल का छिड़काव 100 वर्ग मीटर के क्षेत्र में हर 15 दिनों के बाद करना चाहिए।

सिंचाई

पनीरी लगाने के बाद खेत में दो सप्ताह तक अच्छी तरह पानी खड़ा रहने देना चाहिए। जब सारा पानी सूख जाए तो उसके दो दिन बाद फिर से पानी लगाना चाहिए। खड़े पानी की गहराई 10 सै.मी. से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। खेत में से बूटी और नदीनों को निकालने से पहले खेत में से सारा पानी निकाल देना चाहिए ओर इस प्रक्रिया के पूरे होने के बाद खेत की फिर से सिंचाई करनी चाहिए। पकने से 15 दिन पहले सिंचाई करनी बंद करनी चाहिए ताकि फसल को आसानी से काटा जा सके।

 

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