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गूंगी हो गई है हमारी राष्ट्रभाषा

Our national language has become dumb

दुनियां भर में हिंदी का उपयोग और प्रचार प्रसार लगातार बढ़ रहा है मगर अपने ही देश में राज भाषा का आधिकारिक दर्जा पाने के बावजूद यह भाषा जनभाषा के रूप में स्थापित होने का अब भी इंतजार कर रही है। गाँधी के शब्दों में बात करें तो राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है। बहरहाल 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस पर देशवासियों को हिंदी की सार्थकता पर गहनता के साथ मंथन की जरुरत है।

हिन्दी के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए पहला विश्व हिन्दी सम्मेलन 10 जनवरी 1975 को नागपुर में आयोजित किया गया था। विश्वभर में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए जागरुकता पैदा करने और इसे अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में प्रस्तुत करने के लिए इस दिन को विश्व हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। हिंदी को 2006 में आधिकारिक दर्जा और वैश्विक पहचान मिली। तत्पश्चात हर वर्ष 10 जनवरी को दुनिया भर में विश्व हिन्दी दिवस मनाया जाता है।

विश्व आर्थिक मंच की एक रपट के अनुसार हिन्दी विश्व की दस शक्तिशाली भाषाओं में से एक है। पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, न्यूजीलैंड, संयुक्त अरब अमीरात, युगांडा, गुयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद, मॉरिशस और साउथ अफ्रीका समेत कई देशों में हिन्दी बोली जाती है। वर्ष 2017 में आॅक्सफोर्ड डिक्शनरी में पहली बार अच्छा, बड़ा दिन, बच्चा और सूर्य नमस्कार जैसे हिन्दी शब्दों को शामिल किया गया। विश्व की करीब 175 यूनिवर्सिटी में हिन्दी में पठन पाठन की सुविधा उपलब्ध है। इसी भांति हिन्दी के नमस्ते शब्द को सबसे ज्यादा बार बोला जाने वाले शब्द माना जाता है। भारत में करीब 77 फीसदी लोग हिन्दी भाषा को लिखते, पढ़ते, बोलते और समझते हैं। एक अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार केवल 70 प्रतिशत चीनी ही मंदारिन भाषा बोलते हैं, जबकि भारत में हिंदी बोलने वालों की संख्या करीब 78 प्रतिशत है। दुनिया में 64 करोड़ लोगों की मातृभाषा हिंदी है जबकि 20 करोड़ लोगों की दूसरी भाषा, और 44 करोड़ लोगों की तीसरी, चौथी या पांचवीं भाषा हिंदी है।

आजादी के 71 साल बाद भी विश्व में हिंदी का डंका बजाने वाले 130 करोड़ की आबादी वाले भारत में आज भी एक दर्जन ऐसे राज्य हंै जिनमें हिंदी नहीं बोली जाती। वहां संपर्क और कामकाज की भाषा का दर्जा भी नहीं है इस भाषा को। आश्चर्य तो तब होता है जब हम अंग्रेजी सीख पढ़ लेते है मगर हिंदी का नाम लेना पसंद नहीं करते। सच तो यह है कि हिंदी भाषी स्वयं अपनी भाषा से लगाव नहीं रखते जहाँ जरुरत नहीं है वहां भी अंग्रेजी का उपयोग करने में नहीं हिचकते। हमारे देश में युवाओं को रोजगार देना सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है।

रोजगार के लिए अंग्रेजी जानना सबसे जरुरी है और यही कारण है की हिंदी लगातार इंग्लिश के मुकाबले पिछड़ती जा रही है। जो बच्चे हिंदी माध्यम से आगे बढेÞ है वे अंग्रेजी जानने वाले बच्चों के मुकाबले हीन भावना का शिकार हो रहे हंै। इसे रोकने के लिए किसी भी स्तर पर कोई ठोस प्रयास देखने को नहीं मिल रहे है जिसका खामियाजा अंततोगत्वा हिंदी को उठाना पड़ रहा है। वर्तमान में हिंदी भाषा जनभाषा बनने से दूर होती जा रही है और अंग्रेजी ने अपना प्रभुत्व जमा लिया है। यदि हालात यही रहे तो वह दिन दूर नहीं जब हिंदी भाषा हमारे बीच से गायब हो जाएगी। हमें यदि हिंदी भाषा को संजोए रखना है तो इसके प्रचार-प्रसार को बढ़ाना होगा। सरकारी कामकाज में हिंदी को प्राथमिकता देनी होगी। तभी हिंदी भाषा को जिंदा रखा जा सकता है।

देशवासियों को विचार करना चाहिए कि जिस भाषा को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया हैै और जो जन जन की मातृभाषा है, उसी के बोलने वाले उसे इतनी हिकारत की निगाह से क्यों देखते हैं। हिंदी की इस दुर्दशा के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है इस पर गहनता से चिंतन और मनन की महती जरूरत है। हिंदी भाषी राज्यों की हालत यह है कि वहां शत प्रतिशत लोग हिंदी भाषी हैं मगर प्रदेश के बाहर से आए चंद अधिकारियों ने अपना कामकाज अंग्रेजी में कर मातृभाषा को दोयम दर्जे की बना रखा है। हम दूसरों को दोष अवश्य देते हैं मगर कभी अपने गिरेबान में झांककर नहीं देखते। सच तो यह है की जितने दूसरे दोषी हैं उससे कम हम भी नहीं हैं। हिन्दी हमारी मातृ भाषा है और हमें इसका आदर और सम्मान करना चाहिये। महात्मा गांधी ने कहा था राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है। आज राष्ट्र तो है मगर हमारी राष्ट्रभाषा गूंगी हो गयी है। जरुरत इस बात की है की हम राष्ट्रभाषा को उसका खोया गौरव बहाल कर उसकी गरिमा और सम्मान को प्रतिस्थापित करें ।

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