बच्चों का खेल नहीं है ऑनलाइन शिक्षा

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Online education is not childs play
ऑनलाइन यानी डिजीटल शिक्षा का हश्र सिर मुढ़ाते ही, ओले पड़ने की शक्ल में दिखाई देने लगा है। लॉकडाउन के बीच शुरू हुआ ऑनलाइन पढ़ाई का चलन स्कूली बच्चों पर भारी पड़ने लगा है। नतीजतन उन्हें कई-कई घंटे कंप्युटरए लैपटॉप और मोबाइल पर आंखें गढ़ानी और दिमाग पर जोर डालना पड़ रहा है। इससे विद्यार्थी अनावश्यक रूप से एकांगी और चिंतित दिखाई देने लगे हैं।
अपने बच्चों में अचानक आए इन लक्षणों की शिकायत अनेक अभिभावकों ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय और केंद्रीय विद्यालय संगठन को की हैं। अब बच्चों को इस मानसिक तनाव से उबारने के लिए मंत्रालय ने श्मानक क्रियाशील प्रक्रिया; स्टेंडर्ड ऑपरेटिव प्रोसीजर अपनाने का निर्ण लिया है। संक्षिप्त में ‘एसओपी’ नाम से जानेए जाने वाले इस मंत्र का इस्तेमाल कंपनियों में विफलता को कम करते हुए दक्षता गुणवत्ताए प्रदर्शन और उत्पादन में वृद्धि व एकरूपता लाने के लिए किया जाता है। अब पहली बात तो यह कि बच्चों का मस्तिष्क कोई कारखाने की भट्टी नहीं है कि आप संख्या में वस्तु का उत्पादन बढ़ाने का काम कर रहे हों। विवेकानंद ने शिक्षा को जीवन के विकास का मंत्र बताते हुए कहा थाए श्मात्र सूचना प्राप्त करनाए पुस्तकों से सीखना या इच्छाओं पर बलपूर्वक रोक लगाकर यांत्रिक बना देना शिक्षा नहीं है। शिक्षा वह हैए जो मनुष्य को साहस और चरित्रवान बनाती है।
देश में शिक्षा और शिक्षा पद्धति को लेकर एक विचित्र विरोधाभास और दुविधा की स्थिति बनी हुई है। एक आदर्श और गुणकारी शिक्षा व्यवस्था में कौन से तत्व शामिल होने चाहिएए इस संदर्भ में पिछले 72.73 साल में कोई एक निश्चित धारणा नहीं बन पाई है। फलत: इस अनिश्चितता का दंड हर नई पीढ़ी भोगती है। ऑनलाइन शिक्षा वर्तमान पीढ़ी को दंड के रूप में मानसिक प्रताड़ना झेलने का सबब बन रही है। मंत्रालय को अभिभावकों की जो थोक में शिकायतें मिली हैंए उनमें कहा है बच्चों को विद्यालयों की ओर से घंटों ऑनलाइन पढ़ाया जा रहा है। होमवर्क भी उसी अनुपात में दिया जा रहा है। परिणामस्वरूप बच्चे दिन-दिन भर कंप्युटरए लैपटॉप और मोबाइल से चिपके रहते हैं। इस अनावश्यक व्यस्तता के चलते उनका व्यवहार बदल रहा है। उनमें चिढ़चिढ़ापन बढ़ रहा है। वे हठी और गुस्सैल भी हो रहे हैं।
मानसिक बोझिलता  से जुड़ा यह एकांगीपन निकट भविष्य में उनके स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है। वे मानसिक अवसाद में आकर उल्टा-सीधा या कोई भयानक कदम भी उठा सकते हैं। कई बच्चे अश्लील कहानी पढ़ते सुनते या देखते भी अभिभावकों ने पकड़े हैं। अभी बहुत दिन नहीं हुएए जब दिल्ली में 27 मित्र छात्र-छात्राएं इंस्ट्राग्राम पर एक समूह बनाकर पोर्न फिल्में देखते हुए अपनी सहपाठी छात्राओं से दुष्कर्म की शड्यंत्रकारी योजना बनाते हुए पकड़े गए थे। शायद ऐसे ही मामलों की निगाह में उच्च न्यायालय दिल्ली के न्यायाधीश डीएन पटेल और हरिशंकर ने कहा है कि ऑनलाइन शिक्षा कोई बच्चों का खेल नहीं है।श् यह दलील लॉकडाउन के दौरान एक जनहित याचिका की वीडियो कॉन्फ्रेसिंग से सुनवाई करते हुए दी गई।
हालांकि कंपनियों ने इस दिशा में पहल पहले से ही कर दी है। नतीजतन कई ऑनलाइन प्रारूपों में ई-लर्निंग सामग्री बाजार में उपलब्ध है। वह भारत ही हैए जिसमें सबसे विशाल के-12 शिक्षा पद्धति एक दशक पहले विकसित हो चुकी है। इसे किंगरगार्डन और 12 वर्षीय बेसिक शिक्षा के नाम से जाना जाता है। के-12 शिक्षा स्वयंप्रभा के 32 चैनलों में से 12 चैनलों के जरिए स्कूलों में दी जाएगी। पीएम-ई-विद्या के तहत वन क्लास-वन चैनल योजना है। इसमें पहली कक्षा से बारहवीं कक्षा तक के लिए अलग-अलग चैनल होंगे। रेडियो पर भी कक्षाएं चलाने की तैयारी की जा रही है जिससे दूर-दराज के अंतिम छोर पर रह रहे छात्रों को शिक्षा मिल सके।
यह सामग्री सीडी एप और सीबीएसई पाठ्यक्रम की वेबसाइटों पर उपलब्ध रहेगी। लेकिन अभी इसका प्रयोग सीमित है। दरअसल ऑफलाइन शिक्षा पद्धति में विद्यार्थी की बुद्धि की परख का परीक्षा एक तरीका हैए वहीं इस के-12 शिक्षा प्रणाली में भी है। महज पुस्तकों के पाठ्यक्रमों को डिजीटल प्रारूप में बदल दिया है। इसलिए यह प्रणाली भी विद्यार्थी के मनोविज्ञान व मनस्थिति को समझने में सक्षम नहीं है। दरअसलए प्रत्येक विद्यार्थी की बौद्धिक क्षमता और रुचियां भिन्न-भिन्न होती हैंए इसलिए पढ़ाई का एक पाठयक्रम और एक जैसा तरीका हरेक छात्र के बौद्धिक विकास का आधार नहीं हो सकता ।
दरअसल भारत में ही नहीं दुनिया में छात्र को पूर्व से सुनिश्चित कर दिए गए अध्ययन-अध्यापन तक ही संयमित रखा जाता है। आज का शिक्षक हो या फिर प्राध्यापकए वह भी विविधतापूर्ण अध्यनशीलता से दूर है। इसलिए शिक्षक और छात्र निर्धारित शिक्षा से आगे की बात सोच ही नहीं पाते। कमोवेश यही मानसिकता अभिभावकों की है। वे भी अपनी संतान को चिकित्साए अभियंता सरकारी अधिकारी या बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकर बना देने का लक्ष्य निर्धारित कर लेते हैं। जबकि किसानए सैनिक लेखक-पत्रकार और आदर्श मूल्यों के प्रवचनकर्ता भी देश के सामाजिक ताने-बाने के लिए आवश्यक होते हैं। आधी-सदी बीतने के बाद यह वास्तविकता एक बार फिर से मुखर होकर स्थापित हुई है कि कोरोना संकट काल में अर्थव्यस्था को आधार केवल खेती-किसानी के बूते मिला है। जबकि बीते पचास सालों में सबसे ज्यादा तिरस्कार व अवमूल्यन इसी व्यवसाय का हुआ है। आज अपने बालक को अन्नदाता बनाने के बात शिक्षक और अभिभावक में से कोई नहीं करता।
शिक्षा के क्षेत्र में ऑनलाइन द्वार खोलने की बड़ी तैयारी है। लेकिन शिक्षा की स्थापित कर दी गईं विषमताएं और संकीर्णताएं तोड़ने का कोई उपाय नहीं है। क्या गुरू से दूर एक कोने में मोबाइल स्क्रीन के सामने बैठे शिष्य के मन-मस्तिष्क में क्या है। यह जब ठीक से आज का शिक्षक नहीं समझ पर रहाए तो तकनीक कैसे समझेगी। क्योंकि तकनीकी शिक्षा में न तो मौलिकता है और न ही पहले से ही लोड कर दी शिक्षा से आगे जाने की क्षमता। गोया, कृत्रिम तरीके से दी गई शिक्षा नैसर्गिक या जिज्ञासु प्रतिभा का स्थान ले पाएगी या फिर नैसार्गिक शिक्षा को कुंठित करने का काम करेगी दरअसल किसी उपकरण ने भर दिए गए ज्ञान की एक सीमा होती है और वह तय कर दिए गए प्रोग्रामिंग के अनुसार चलती है। उसमें कोई लचीलापन नहीं होता। जबकि विद्यार्थी की बुद्धि के विकास का क्रमए कोई एक सीधी रेखा में नहीं चलता। ज्ञान नदी की धारा की तरह प्रवाहमान है। उसमें नए-नए रूप लेते और जीवन-मूल्यों को देखते हुए वैचारिक बदलाव आता है। सोच विसकीत होती है। यह बदलाव प्रतिभा के नैसर्गिक विकास का मूल-आधार है। दरअसल किसी उपकरण में सोच या विचार पनपाने की उर्वरा शक्ति नहीं होती है।
उपरोक्त कथन के सत्यापन के लिए दुनिया के अत्यंत सफल और आविष्कारक व्यक्ति बिल गेट्स की जीवनी पर दृष्टि डालते हैं। हम सब जानते हैं कि आज बिल दुनिया अमीरतम लोगों में से एक हैं। बिल ने उच्च शिक्षा के लिए कॉलेज में प्रवेश तो लिया था लेकिन शिक्षा पूरी नहीं कर पाए थे। वे कॉलेज से आकर अपने घर के गैरेज में घुस जाते थे और कोरे कागजों पर आड़ी-तिरछी लकीरें खींचकर किसी दार्शनिक के लहजे में धीर-गंभीर वैचारिक तल्लीनता में लग जाते थे। उनकी परेशान मां कभी स्कूल के कपड़े बदलने को आवाज लगातीं, तो कभी भोजन के लिए पुकारतीं।
लेकिन धुनी बिल अपनी ही धुन में रमा रहता। अंत में गैरेज की दहलीज पर आकर डपटते हुए मां पूछतीं, आखिर तूं कर क्या रहा है-बिल कहता, सोच रहा हूं मां! वात्सल्यमयी मां सहम गईं। अनुभव किया, बेटा अवसाद में आ रहा है, कहीं पगला न जा, सो मनोचिकित्सक को दिखाया। लेकिन बेटा अस्वस्थ होता, तब न कोई बीमारी निकलती बहरहाल मां हार गईं और बेटा आड़ी-तिरछी लकीरें खींचने में लगा रहा। इस गैरेज में कंप्युटर नहीं, लेकिन जिज्ञासा थी, सोच थी। आखिरकार, बिल की सोच ने आकार लिया और कंप्युटर की वृद्धि अर्थात सॉफ्टवेयर का आविष्कार कर डाला। मसलन वास्तविक बुद्धि ने कृत्रिम बुद्धि की सजीव रचना कर दी। लेकिन हम हैं कि ऑनलाइन शिक्षा के बहाने नैसर्गिक बृद्धि पर अंकुश लगाने के उपाय तलाश रहे हैं, डिजीटल शिक्षा से जुड़ा यह एक बड़ा प्रश्न है, जो विचारनीय है।

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