कोरोना असर के चलते पानी से सस्ता हुआ तेल

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Oil becomes cheaper than water due to corona effect
मोटरकारों के पाहियों में बेक्र लग जाने से अंतरराश्ट्रीय बाजार में तेल की मांग घट गई है। नतीजतन कच्चा तेल घटकर प्रति बैरल 2212 रुपए रह गया है। एक बैरल में 159 लीटर तेल होता है। इस हिसाब से प्रति लीटर तेल की कीमत 13.91 रुपए बैठती है। यदि इसमें केंद्र और राज्य सरकारों के कर भी जोड़ दिए जाएं, तो 17-18 रुपए प्रति लीटर डीजल-पेट्रौल के भाव बैठते हैं, जो पानी की किसी ब्रांड बोतल के भाव से भी कम हैं।
कोरोना वायरस ने जहां पूरी दुनिया में मानव स्वास्थ्य को खतरे में डाल दिया है, वहीं वैश्विक अर्थव्यवस्था भी लड़खड़ाने लगी है। बाजारों में क्रय-विक्रय थम जाने से भारत समेत दुनियाभर के शेयर बाजारों के हाल बेहाल हैं। इसका सबसे ज्यादा असर ऑटोमोबाइल क्षेत्र में पड़ा है। मोटरकारों के पाहियों में बेक्र लग जाने से अंतरराश्ट्रीय बाजार में तेल की मांग घट गई है। नतीजतन कच्चा तेल घटकर प्रति बैरल 2212 रुपए रह गया है। एक बैरल में 159 लीटर तेल होता है। इस हिसाब से प्रति लीटर तेल की कीमत 13.91 रुपए बैठती है। यदि इसमें केंद्र और राज्य सरकारों के कर भी जोड़ दिए जाएं, तो 17-18 रुपए प्रति लीटर डीजल-पेट्रौल के भाव बैठते हैं, जो पानी की किसी ब्रांड बोतल के भाव से भी कम हैं। एक लीटर की यह बोतल लगभग 20 रुपये की मिलती है। चीन में कोरोना कोविड-19 की दिसंबर-2019 में जब शुरूआत हुई थी, तो यह अंदाजा लगाया गया था कि इसका असर चीन में ही दिखाई देगा, लेकिन इस सूक्ष्म-जीव ने देखते-देखते दुनिया की अर्थव्यवस्था ध्वस्त कर दी। इसी असर के चलते सऊदी अरब ने रूस के साथ कच्चे तेल के उत्पादन संबंधी समझौते को तोड़कर तेल के क्षेत्र में ‘प्राइस-वार’ शुरू कर दिया है।
दरअसल सऊदी अरब पहले कीमतों को स्थिर बनाए रखने के लिए उत्पादन कम करना चाहता था, परंतु अमेरिका द्वारा चीन को तेल की आपूर्ति की घोषणा के बाद सऊदी अरब ने उत्पादन बढ़ाकर तेल के उत्पादक देशों को चकित कर दिया है। तेल के इस खेल को नया रंग दे दिए जाने के कारण ही प्राइस-वार छिड़ने की उम्मीद है। पूरी दुनिया में कच्चा तेल वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं की गतिशीलता का कारक माना जाता है। ऐसे में यदि तेल की कीमतों में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है, तो इसका प्रत्यक्ष कारण है कि दुनिया में औद्योगिक उत्पादों की मांग घटी है। इस मांग का घटना इस बात का संकेत है कि समूचे विश्व पर मंदी की छाया मंडरा रही है। दुनिया का एक तिहाई तेल उत्पादन करने वाले ओपेक देशों के समूह में खलबली है। क्योंकि इन देशों की कमाई घटती जा रही है। इस कारण इन देशों के नागरिक औद्योगिक-प्रौद्योगिकी उत्पाद खरीदने की सार्म्थ्य खो रहे हैं।
भारत 80 प्रतिशत कच्चा तेल अरब देशों से आयात करता है। तेल की कीमतें घटना उपभोक्ता के लिए अच्छी बात तब है, जब भारतीय तेल कंपनियां कच्चे तेल की घटी कीमतों के अनुपात में ईंधनों के दाम घटा दें। किंतु कंपनियों का अर्थशास्त्र भारत सरकार की इच्छा के अनुसार चलता है। सरकार कीमतें इसलिए नहीं घटाती, क्योंकि इसकी बिक्री से उसे बड़ा लाभ होता है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार भी तेल की कीमतों को प्रभावित करता है। कंपनियों को कच्चे तेल को रिफाइनरियों से एक प्रक्रिया से गुजारने के बाद ही यह तेल उपयोग में लाए जाने वाले डीजल, पेट्रोल और कैरोसिन में तब्दील होता है। इस प्रक्रिया में 40 से 45 दिन लगते हैं। इस तैयार तेल के मूल्य और कच्चे तेल की कीमत में जो अंतर होता है, उसे क्रेक कहते हैं। डॉलर और रुपए के अंतर से भी तेल की कीमतें प्रभावित होती हैं। क्योंकि ईरान को छोड़कर अन्य देशों से भारत जो तेल खरीदता है, उसका मूल्य डॉलर में चुकाना पड़ता है।
दरअसल अमेरिका का तेल आयातक से निर्यातक देश बन जाना,चीन की विकास दर धीमी हो जाना,शैल गैस क्रांति, नई तकनीक, तेल उत्पादक देशों द्वारा सीमा से ज्यादा उत्पादन, ऊर्जा दक्ष वाहनों का विकास और इन सबसे आगे बैटरी तकनीक से चलने वाले वाहनों का विकास हो जाने से कच्चे तेल की कीमतें तय करने में तेल निर्यातक देशों की भूमिका नगण्य होती जा रही है। भारत जिस तेजी से सौर ऊर्जा और पराली (धान के डंठल) से एथनॉल बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, उसके चलते कुछ सालों में हर प्रकार के ईंधन के क्षेत्र में भारत आत्मनिर्भर हो जाएगा। इसके लिए भारत राजस्थान के बाड़मेर में 43 हजार करोड़ रुपए की लागत से रिफाइनरी के निर्माण में लगा है। इस आधुनिकतम रिफाइनरी में 90 लाख मैट्रिक टन पेट्रो केमिकल बनाने की क्षमता होगी। इसी के साथ-साथ 12 ऐसे संयंत्र तैयार किए जा रहे हैं, जिनमें पराली से एथनॉल बनाया जाएगा। एथनॉल और बायो फ्यूल के उपयोग को बढ़ावा देकर यह उम्मीद की जा रही है कि भारत में तेल के आयात की मात्रा बहुत कम हो जाएगी। दो से तीन साल के भीतर इन संयंत्रों के तैयार होने की उम्मीद है। इनके शुरू होने के बाद पराली खेतों में जलाए जाने से जो प्रदूषण वायुमंडल में फैलता हैं, उसमें कमी आएगी। साथ ही, पराली के बिकने का सिलसिला शुरू होगा। इससे किसानों की आय में वृद्धि होगी। इस लिहाज से पराली को ईंधन में बदलने के उपाय देश की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद उपयोगी साबित होंगे।
तेल के इस तिलिस्म में कूटनीति भी अपना काम कर रही है। रूस ने तुर्की पर इस्लामिक स्टेट ऑफ़ सीरिया एंड ईराक के साथ मिलकर तेल का व्यापार करने का सनसनीखेज आरोप लगाया है। हालांकि तुर्की इससे इनकार कर रहा है। तेल की गिरती कीमतों के लिए मंदी पड़ी अन्य आर्थिक गतिविधियां भी जिम्मेदार हैं। एक तरफ शैल गैस के उत्पादन से अमेरिका तेल निर्यातक देश बन गया है। वहीं सऊदी अरब और कुछ अन्य खाड़ी देश अपनी जरूरत और वैश्विक मांग के साथ कूटनीति के लिए भी तेल का खेल, खेलते रहते हैं। तेल को इसी कूटनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हुए सऊदी अरब ने रूस के साथ कच्चे तेल की संधि तोड़ दी है।
अमेरिका ने तेल उत्पादक देशों की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने की दृश्टि से ही चीन को तेल बेचने की घोषणा कर दी है। अमेरिका इस तेल को सस्ती दरों में चीन को नहीं बेच पाए, इस कूटनीति के चलते ही तेल का उत्पादन बढ़ा दिया है। इन वजहों से ही लग रहा है कि तेल को लेकर प्राइस-वार शुरू होने जा रहा है। दरअसल कच्चे तेल की गोता लगाती कीमतों का एक कारण अमेरिका और रूस के बीच जारी शह और मात का खेल भी है। यूक्रेन मामले में रूस के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध के चलते रूसी अर्थव्यवस्था बुरे हाल में है। उसकी मुद्रा रूबल लगातार कमजोर हो रही है और यूरोप की अर्थव्यस्था भी संतोशप्रद नहीं है। ब्राजील बीते 100 सालों में अर्थव्यस्था की सबसे गंभीर अवस्था की ओर बढ़ रहा है। इसीलिए वैश्विक स्तर पर दुनिया के देशों का आर्थिक मूल्याकंन करने वाली संस्थाएं आशंका जता रही हैं कि 2020-2021 में हालात और बद्तर होने जा रहे हैं। ऐसे में वह तेल ही है,जो भारतीय अर्थव्यवस्था को कोरोना संकट के बावजूद न केवल स्थिर बनाए हुए है, बल्कि विकास दर को भी बढ़ाने का काम कर रहा है।
प्रमोद भार्गव

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