जेल में उपन्यास

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Novel

पश्चिम जर्मनी के एक नगर में जाइगर नाम का युवक नौकरी की तलाश में था। उसे एक मोटर कंपनी में सफाई का काम मिल गया। वह उसे इतनी निष्ठा और मुस्तैदी के साथ करने लगा कि मालिक के चहेतों में शामिल हो गया। उसके प्रति मालिक का यह भरोसा देख बाकी कर्मचारी उससे जलने लगे। उन्होंने चालबाजी से उसे झूठे इल्जाम में फंसा दिया। पकड़े जाने पर उसे जेल की सजा काटनी पड़ी।

जेल में उसका एक गिरोह तैयार हो गया। यह गिरोह जेल से बाहर निकलने के बाद डकैती डालने लगा। जल्द ही जाइगर दोबारा पकड़ लिया गया। उसे फिर जेल की सजा हो गई। दूसरी बार जब वह जेल पहुंचा तो उसे आत्मग्लानि और पश्चाताप होने लगा। ऐसे ही किन्हीं क्षणों में उसने साबुन के रैपर पर अपनी व्यथा एक कविता के रूप में लिख डाली। उसकी कविता एक दिन अनायास जेल के पादरी के हाथ लग गई। पादरी को लगा कि इस व्यक्ति का विकास और सुधार इसी रचनात्मक रास्ते से किया जा सकता है।उसने जेल के अधिकारियों से आग्रह करके जाइगर के लिए लिखने के साजो सामान का इंतजाम करवा दिया। यह देखकर जाइगर का मन रम गया। उसने जेल में एक उपन्यास लिखना शुरू कर दिया।

जब वह जेल से बाहर आया तो उसने मजदूरी शुरू कर दी।

लेकिन मजदूरी करते हुए भी वह समय मिलने पर उपन्यास लिखता रहा।

उसका वह उपन्यास ‘दि फोर्टेस’ के नाम से प्रकाशित हुआ।

इस उपन्यास ने उसे पूरे जर्मनी में मशहूर कर दिया।

एक सजायाफ्ता से एक प्रसिद्ध लेखक बनना मनुष्य की असीम संभावनाओं की कहानी है।

हममें से प्रत्येक में ये संभावनाएं निहित हैं। जरूरत है, बस कोशिश करके उन्हें साकार करने की।

 

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