मेरे लिए नहीं…..मैं खास हूं, तुम कौन?

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Not for me ..... i'm special, who are you
मैं खास हूं तुम कौन? कुछ लोग इसे मैं तुमसे अधिक सम्मानित हूं के ओरवेलियन सिंड्रोम और वीआईपी संस्कृति को औपनिवेशिक और सामंतीं सोच का परिणाम कह सकते हैं किंतु आप सभी इस बात से सहमत होंगे कि यह वीआईपी कल्चर सर्वत्र व्याप्त है और इसमें हमेशा और की मांग करने के ओलिवर डिसऑर्डर का तडका भी लगा हुआ है। वे हमेशा साड्डा हक में विश्वास करते हैं जिसको चाहे उसको धमका सकते हैं, अपनी शक्तियों और सरकारी संसाधनों का दुरूपयोग करते हैं और यही नहीं उन्हें हमारे और आपके पैसों से सुरक्षा उपलब्ध करायी जाती है।
जितनी अधिक चीजें बदलती हैं वे वैसी की वैसी बनी रहती हैं। लॉकडाउन हो या न हो, हमें दैनिक आधार पर अपने शासकों के अविवेकपूर्ण नखरों, कारनामे आदि का सामना करना पडता है और ‘किसी नियम का पालन न करना’ उनके इन कारनामों का अभिन्न अंग है और इसके बजाय वे कानून द्वारा शासन करते हैं और यदि कभी किसी ने जाने-अनजाने उनके इन कारनामों पर प्रश्न उठा दिया तो उनके कोप भाजन के लिए तैयार रहें। मैं खास हूं तुम कौन?
कुछ लोग इसे मैं तुमसे अधिक सम्मानित हूं के ओरवेलियन सिंड्रोम और वीआईपी संस्कृति को औपनिवेशिक और सामंतीं सोच का परिणाम कह सकते हैं किंतु आप सभी इस बात से सहमत होंगे कि यह वीआईपी कल्चर सर्वत्र व्याप्त है और इसमें हमेशा और की मांग करने के ओलिवर डिसऑर्डर का तडका भी लगा हुआ है। वे हमेशा साड्डा हक में विश्वास करते हैं जिसको चाहे उसको धमका सकते हैं, अपनी शक्तियों और सरकारी संसाधनों का दुरूपयोग करते हैं और यही नहीं उन्हें हमारे और आपके पैसों से सुरक्षा उपलब्ध करायी जाती है।
पिछले सप्ताह अनेक सार्वजनिक सभाएं, विवाह और अन्य समारोह रद्द किए गए किंतु हमें अपने नए महाराजाओं की शान शौकत इन समारोहों में देखने को मिली। इनमें सबसे पहले पूर्व प्रधानमंत्री देवगोडा ने लॉकडाउन के सभी नियमों को तोड़ते हुए अपने पोते और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री कुमारास्वामी के बेटे का विवाह बंगलुरू के नजदीक एक फार्महाउस में किया। उन्होंने इस बात की परवाह भी नहीं की कि बंगलुरू रेड जोन में है और वहां राज्य में कोरोना के सबसे अधिक मामले मिले हैं। इस समारोह में लोगों ने न तो मास्क पहने थे, न दस्ताने और न ही सोशल डिस्टैंसिंग का पालन किया जा रहा था। जब इस बारे में कुमारास्वामी से पूछा गया तो उन्होंने कहा ‘‘घर पर सोशल डिस्टैसिंग का पालन करना कठिन था इसलिए हम फार्म हाउस आए। राज्य सरकार से पहले ही सारी मंजूरियां ली जा चुकी हैं और अनेक फैमिली डॉक्टरों से परामर्श किया गया है।’’ पुलिस अधिकारियों का कहना था कि ‘‘ गौडा परिवार न हमसे 60 कारों को वहां ले जाने की अनुमति मांगी थी।’’ कैसे?
यह सब कुछ राज्य के मुख्यमंत्री भाजपा के येदुरप्पा के आशीर्वाद से ही हुआ होगा जिनका कहना है कि इस विवाह समारोह पर नजर रखी गयी तथा इसकी वीडियोग्राफी की गयी। यही नहीं स्वयं येदुरप्पा ने भी पिछले माह भाजपा के एक नेता के विवाह समारोह में भाग लिया था जिसमें दो हजार मेहमान उपस्थित थे। राज्य के अधिकारियों से जब पूछा गया कि इस समारोह में सोशल डिस्टैंसिंग का पालन नहीं किया गया तो उनका कहना था कि इस पर कार्यवाही की जाएगी। किंतु किस पर कार्यवाही की जाएगी और किसे दंडित किया जाएगा? किसी को नहीं।
यह सिलसिला यहीं नहीं समाप्त होता है। देश में लोग अपनी जान बचाने के लिए चिंतित हैं और खाली पेट सो रहे हैं तो चंडीगढ में क्वारंटीन में रखे गए वीआईपी लोगों के नखरे देखने को मिले। वे ताजी स्ट्राबेरी, कीवी, सिलेरी, रेड कैबेज, आधी पकी ब्रेड और आइसक्रीम की मांग कर रहे हैं। उन्हें इस बात से संतोष रखना चाहिए था कि लॉकडाउन में जो कुछ मिल रहा है वह काफी है। कुछ वीआईपी लोगों ने ओलिव आयल की मांग की क्योंकि वे घर पर ओलिव आयल में पका खाना खाते हैं। यही नहीं मार्ग निदेर्शों का उल्लंघन करते हुए वे घूमने जाते, अपने साथियों के साथ गोल्फ खेलने की मांग करते, अपने ब्यूटीशियन, नाई, फल विक्रेता आदि को पास जारी करने की मांग करते और उनके इन नखरों से पहले से कार्य बोझ से दबे सुरक्षा बलों का कार्यभार बढ रहा है। हैदराबाद में एक विधायक ने खाली रोड को अपने बेटे और उसके दोस्तों को मोटर रेसिंग ट्रैक के रूप में उपयोग किया जहां पर वे अपनी फैंसी कारों को सरपट दौड़ाते दिखे और नियमों को ताक पर रखते हुए कर्नाटक के भाजपा विधायक ने अपने जन्म दिन पर सैकड़ों लोगों को बिरयानी परोसी।
इन घटनाओं से आम आदमी का मन खिन्न हो जाता है जो पहले ही लॉकडाउन से उत्पन्न समस्याओं और बेरोजगारी से जूझ रहा है और इन लोगों के ये नखरे कुछ विचारणीय प्रश्न उठाते हैं। पहला, क्या बहुत नहीं हो गया है? क्या उन्हें यह अतिरिक्त महत्व मिलना चाहिए? क्या वे हमारी परवाह करते हैं? इस बात को ध्यान में रखते हुए कि हमारे अधिकतम नेता अपनी जिम्मेदारियों का ईमानदारी और सम्मानजनक ढंग से निर्वहन नहीं करते हैं तो क्या वे असली भारत की वास्तविकता को जानते हैं जिसकी रक्षा करने की वे कसमें खाते हैं। क्या यह अधिकार और सत्य के प्रतीक हमारे संविधान में वर्णित गणतंत्र के बुनियादी सिद्धांतो के विपरीत नहीं हैं। उन्हें जनता द्वारा, जनता का और जनता के लिए लोकतंत्र से कोई लेना देना नहीं है।
लगता है हम ऐसे भारत में रह रहे हैं जहां पर केवल वीवीआईपी को महत्व दिया जाता है और जहां पर हम विशेषाधिकारों के लिए एक संकरी सी आधिकारिक पट्टी पर रह रहे हैं। जहां पर हमारे आम आदमी और खास आदमी के बीच एक गहरी खाई है जिसके चलते लोगों में शासकों के प्रति आक्रोश बढता जा रहा है और जिसके चलते लोग स्वयं भी कानूनों का उल्लंघन करने लगे हैं। हमारे नए महाराजा इस बात को भी ध्यान में नहीं रखते हैं कि वीआईपी संस्कृति मूलत: अलोकतांत्रिक है। यह समानता के सिद्धान्त के विपरीत है क्योकि इसमें नागरिकों को शासकों से निष्कृष्ट कोटि का बना दिया जाता है। जहां पर विशेषाधिकार और पुलिस संरक्षण प्रतिष्ठा का विषय बन जाता है और जहां पर ये चीजें आम नागरिकों की कीमत पर उपलब्ध करायी जाती हैं। वहां पर इस विचार को चुनौती देने के कारण बन जाते हैं। तुम नहीं जानते मैं कौन हूं। मैं वीआईपी हूं जैसे वाक्यांश लोकतंत्र में अप्रचलित हो गए हैं। 130 करोड से अधिक जनता को अन्नदाता के आज्ञाकारक के रूप में देखना लोकतंत्र के अनुरूप नहीं है।
विडंबना देखिए कि जिन लोगों को जनता की सेवा के लिए चुना जाता है वे लोग जनता को उन तक पहुंच से वंचित रखते हैं। इस भावना को न्यायालयों के अनेक आदेशों में भी व्यक्त किया गया है। वीआईपी सुरक्षा अनावश्यक है। यह एक घोटाला है कि आम आदमी सडकों पर मारा जाता है और वृद्ध व्यक्तियों को सुरक्षा नहीं मिलती है जबकि राजनेताओं को करदाताओं के पैसों से सुरक्षा उपलब्ध करायी जाती है। जरा विसंगति देखिए। हमारे देश में एक मुख्यमंत्री 35 कारों के काफिले के साथ चलता है जबकि ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री जॉन मेजर लोकल ट्रेन में स्थानीय लोगों के साथ यात्रा करते थे और कोई उन्हें सीट देने की परवाह भी नहीं करता था। अभी के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसर साइकिल पर मार्केट से खरीददारी कर लेते हैं।
आज हमारे शासकों की नई पीढ़ी आ गयी है। उन्हें इस सच्चाई को ध्यान में रखना होगा कि लोकतंत्र सभी के लिए समानता के बुनियादी सिद्धान्त पर आधारित है। अब वे दिन नहीं रह गए जब नेताओं का सम्मान किया जाता था। आज नेताओं को भारत की सभी समस्याओं का प्रतीक माना जाता है। विशेषकर कोरोना संकट के समय जब सरलता और बुनियादी सिद्धान्तों का पालन आमतौर पर किया जा रहा है। यदि उनमें बदलाव नहीं आता है तो वे अप्रासंगिक बनते जाएंगे। इस संबंध में उन्हें केवल दिखाना नहीं अपितु वास्तविक कदम उठाने होंगे। आपका क्या मत है?
पूनम आई कौशिश
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