स्वैच्छिक रक्तदान को आदत बनाने की आवश्यकता

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Need to make voluntary blood donation a habit

पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां की अगुवाई में डेरा सच्चा सौदा भारत में एकमात्र ऐसी संस्था है जिसने 8 अगस्त, 2010 को मात्र आठ घंटों में सर्वाधिक 43732 यूनिट रक्तदान कर विश्व रिकॉर्ड बनाया। भारत में प्रतिवर्ष 1 अक्टूबर को राष्ट्रीय स्वैच्छिक रक्तदान दिवस मनाया जाता है, बावजूद इसके भारत रक्तदान की कमी से जूझ रहा है। समाज में महान परिवर्तन लाने, जीवनरक्षी उपायों का अनुसरण करने और हिंसा और चोट के कारण गंभीर बीमारी, बच्चे के जन्म से संबंधित जटिलताओं, सड़क यातायात दुर्घटनाओं और कई आकस्मिक परिस्थितियों से निकलने में रक्तदान की महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाना ही इस दिवस का उद्देश्य है।

तंजानिया में 80 प्रतिशत लोग रक्तदान के लिए पैसे नहीं लेते हैं। वहीं, ब्राजील और आॅस्ट्रेलिया में तो यह कानून है कि कोई भी रक्तदान के लिए पैसों की मांग नहीं कर सकता। इसके विपरीत भारत में रक्तदान के लिए पैसे लेने पर किसी प्रकार की रोक नहीं है। यह शर्मनाक है कि भारत जैसे देश में रक्त का व्यापार हो रहा है। समय पर रक्त नहीं मिलने व पैसे नहीं जुटा पाने के कारण भारत में प्रतिवर्ष 15 लाख लोगों की मौत रक्त की कमी के कारण हो जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मापदंड के अनुसार, किसी भी देश में किसी भी स्थिति में उसकी जनसंख्या का कम से कम 1 प्रतिशत रक्त आरक्षित होना ही चाहिए।

उक्त मानक के अनुसार, हमारे देश में कम से कम 1 करोड़ 30 लाख यूनिट रक्त का हर समय आरक्षित भंडार होना चाहिए। लेकिन, पिछले वर्षों के आंकड़ों के अनुसार, हमारे पास प्रतिवर्ष रक्त की औसतन 90 लाख यूनिट ही उपलब्ध हो पाती है। प्रतिवर्ष लगभग 25 से 30 प्रतिशत रक्त की कमी रह जाती है। रक्त की कमी के अलावा दूसरी चिंताजनक बात, रक्त की शुद्धता है। इसलिए संक्रमित रक्त चढ़ाने से होने वाली मौतों को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है। भारत में रक्तदान करने वाले राज्यों के आंकड़ों की बात करें तो मध्य प्रदेश में वर्ष 2006 में 56.2 प्रतिशत, वर्ष 2007 में 65.17 प्रतिशत, वर्ष 2008 में 68.75 प्रतिशत के लगभग रहा।

वहीं, हरियाणा की स्थिति में इजाफा हुआ, जिसने अब तक के सर्वाधिक 210 यूनिट का रिकॉर्ड 256 के साथ तोड़ दिया, जो कि काबिले तारीफ है। जबकि राजस्थान के चूरू का आंकड़ा 80 प्रतिशत तक का है। चुरू में 2015 में 7 हजार 219 रक्तदाता ने रक्तदान किया। अन्य राज्यों की हालत फिसड्डी हैं। चिंताजनक है कि भारत में कुल जनसंख्या के अनुपात में एक प्रतिशत आबादी भी रक्तदान नहीं करती है। जबकि थाईलैण्ड में 95 फीसदी, इण्डोनेशिया में 77 फीसदी और म्यांमार में 60 फीसदी हिस्सा रक्तदान से पूरा होता है। भारत में मात्र 46 लाख लोग स्वैच्छिक रक्तदान करते हैं। इनमें महिलाएं मात्र 06 से 10 प्रतिशत हैं।

सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी से पता चलता है कि पिछले पांच सालों में देश में सभी ब्लड बैंकों ने कुल मिलाकर 28 लाख यूनिट से ज्यादा खून बर्बाद किया है। अगर इसे लीटर से जोड़ा जाए तो पांच सालों में करीब 6 लाख लीटर खून बर्बाद हुआ है, जो पानी के 56 टैंकरों के बराबर है। देश के तेलंगाना राज्य में 31 जिले हैं, जिनमें से 13 जिले में तो ब्लड बैंक हैं ही नहीं। वहीं, छत्तीसगढ़ में 11 जिले, मणिपुर और झारखंड में 9-9 जिले, यूपी के चार जिले ऐसे हैं, जहां ब्लड बैंक का कोई अता-पता ही नहीं है।

अत: सरकारी प्रयासों को भी गति देनी होगी। देश के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में भी सर्वसुविधायुक्त ब्लड बैंक स्थापित करने होंगे। भारत जैसे भौगोलिक विभिन्नता वाले विशाल देश में जहां कई क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक आपदाएं अक्सर दस्तक देती हैं, उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में हमारे जवान कर्तव्य निभाते हुए खून बहाते हैं तथा हमारे अस्थिर पड़ोसी देश हमेशा युद्ध जैसे हालात पैदा करते हैं, ऐसे में रक्त का पर्याप्त आरक्षित भंडार होना अत्यंत आवश्यक हो जाता है।

 

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