कानून का मखौल उड़ाती पंचायतें

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Panchayats

आजादी के बाद आशा बंधी थी कि वैधानिक प्रयासों से विवाह और जाति के कठोर बंधन में लचीलापन आएगा। पर राजनीतिक दलों ने जिस तरह जाति को सत्ता का साधन बना कर प्रयोग किया, उससे सरकारों की दशा और दिशा का निर्धारण होना शुरू हो गया। सत्ता में चाहे जो रहे, पर आज जाति से जुड़े सम्मान, प्रतिष्ठा और वोट की राजनीति उसे ऐसे सामाजिक मुद्दों के सामने घुटने टेकने को मजबूर करती रही है। पंचायतों के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है।

सच यह है कि इन खाप पंचायतों ने बदलते समय के साथ अपनी संस्थात्मक भूमिका का निर्वहन ठीक से नहीं किया। खाप लोगों का समूह होता है. एक गोत्र या जाति के लोग मिलकर एक खाप-पंचायत बनाते हैं, जो पांच या उससे ज्यादा गांवों की होती है. इन्हें कानूनी मान्यता नहीं है. इसके बावजूद गांव में किसी तरह की घटना के बाद खाप कानून से ऊपर उठ कर फैसला करती है।

किसी भी जाति-बिरादरी की खाप पंचायत का उद्देश्य सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाना होता है, पर आज ठीक इसके विपरीत हो रहा है। हरियाणा, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पंजाब में पिछले एक-दो वर्षों में खाप पंचायतों के फैसलों को लेकर दर्जनों विवाद जन्म ले चुके हैं। उदाहरण के तौर पर मुंह काला करना, गांव में निर्वस्त्र घुमाना, पीट-पीट कर मार डालना, खौलते तेल में हाथ डाल कर सत्य परीक्षण करने या फिर चुड़ैल बता कर मार डालना , ऐसा आर्थिक दंड लगाना जिसे भर पाना ही संभव न हो, सामाजिक बहिष्कार, जाति बाहर कर देना, गांव छोड़ने का हुक्म दे देना आदि।

उसी प्रकार गत वर्ष जब देश में डिजिटल अभियान जोरों पर था, तभी राजस्थान के बाड़मेर जिले में एक खाप ने महिलाओं के मोबाइल इस्तेमाल करने पर पाबंदी का फरमान जारी कर डाला। इस खाप ने लड़कियों के जींस पहनने पर भी रोक लगा दी। इस तरह के कई और उदाहरण दिए जा सकते हैं। ऐसे फैसले, जो न्याय के बजाय अन्याय कर बैठते हैं और गांव के अशिक्षित व सीधे-सादे लोग उसे ईश्वर की मर्जी मान कर चुप्पी साध लेते हैं।

देश में ऐसे सैकड़ों मामले हैं और ऐसे अनेक परिवार हैं जो प्रेम विवाह, टोना करने के आरोप, किसी महिला के दूसरे व्यक्ति के साथ चले जाने, अवैध शराब बेचने या समाज के खिलाफ सूचना का अधिकार का उपयोग करने के कारण सामाजिक बहिष्कार का सामना कर रहे हैं। सामाजिक बहिष्कार होने से दंडित व्यक्ति और उसके परिवार से पूरे गांव और समाज में कोई भी व्यक्ति न बातचीत करता है और न ही उनसे किसी भी प्रकार का व्यवहार रखता है। बहिष्कृत परिवार को हेंडपंप से पानी लेने, तलाब में नहाने और निस्तार करने, सार्वजनिक कार्यक्रमों में शामिल होने, दुकान से सामान खरीदने और अन्य कार्यक्रमों में हिस्सा लेने से वंचित कर दिया जाता है।

वहीं सामाजित पंचायतें कभी कभी सामाजिक बहिष्कार हटाने के लिए भारी जुर्माना, अनाज, शारीरिक दंड और गांव छोड़ने जैसे फरमान जारी कर देती हंै। इस सामाजिक बहिष्कार के कारण विभिन्न स्थानों पर आत्महत्या, हत्या, प्रताड़ना और पलायन करने की घटनाएं भी होती हैं। हरियाणा में तो ऐसे प्रकरण अक्सर हो जाते हैं। पर जाति पंचायतों के मध्ययुगीन नियमों के चलते ऐसे मुद्दों पर विरोध और बहस दब कर रह जाती रही है। यहां तक कि वहां का प्रशासन तक खाप पंचायतों के निर्णयों के सामने बेबस दिखाई देता है।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने भी टिप्पणी की थी कि एक लोकतांत्रिक देश में ऐसा कैसे संभव है कि कुछ लोग अपने को संविधान से ऊपर मान कर चलें। ऐसे समूहों का आचरण पूर्णतया असंवैधानिक है तथा साफ शब्दों में चेतावनी दी कि वे समाज के ठेकेदार न बनें तथा जाति, पंथ या धर्म कोई भी हो, अगर दो वयस्कों ने विवाह करने का निर्णय लिया है, तो कोई तीसरा पक्ष इसमें दखल नहीं दे सकता है। कई लोगों का मानना है कि पंच परमेश्वर होते हैं, यह बात कथा सम्राट प्रेमचंद के जमाने में जरूर सच रही होगी, लेकिन अब के 21 वीं सदी में नहीं। आज परमेश्वर है अपना संविधान। जिसके तहत देश के सभी नागरिक एक समान हैं। सच यह है कि जाति और गोत्र से जुड़े सामंती निर्णयों में खाप पंचायतें अकेली नहीं हैं, राजनीतिक दलों का भी उन्हें समर्थन प्राप्त है।

आज चर्चा भले वैश्वीकरण की हो रही है, पर सामाजिक सोच के दायरे सिंकुड़ रहे हैं। दरअसल, यह स्थिति हमारी संकुचित मानसिकता और झूठी शान का ही नतीजा है। हम अपने ही आसपास के लोगों को एक दोयम दर्जे की जिंदगी बसर करने को विवश करते हैं और फिर भी खुद को सभ्य और साक्षर नागरिक की श्रेणी में गिनते हैं। इससे हमारी सामाजिक प्रगति और एक लोकतांत्रिक और सभ्य देश होने के हमारे दावे पर सवालिया निशान लगता है। संविधान का अनुच्छेद 21 देश के हर व्यक्ति को शांतिपूर्वक और सम्मान से जीने का अधिकार देता है। इस सच को सामने रखते हुए वर्तमान समाज के ढांचे का मूल्याकंन करना समय की मांग है।

आज समाज की यही तस्वीर हमें ‘भारत’ और ‘इंडिया’ में फर्क करने को बाध्य करती है। ऐसे में समरसता का और समावेशी संस्कृति का विकास कैसे संभव है? इस तरह, हम सभ्य समाज का निर्माण कैसे कर पाएंगे? सोचिए जहां मानवाधिकारों का हनन इतने व्यापक स्तर पर हो, वहां समाज की तस्वीर कैसी होगी? आज जबकि हमारे देश की न्यायपालिका इतनी सजग है, सतर्क है और बेखौफ फैसले देने के लिए जन-सामान्य में सम्मान की नजर से देखी जा रही है, तब भी एक तीखा सच अभिशाप की तरह हमारे माथे पर चस्पां है कि न्याय गरीब-साधनहीन तबके से कोसों दूर है। ऐसे में वे पंचायतों की शरण लेते है।

ऐसे समय में जब हमारी विकास दर ऊंची है और जल्दी ही हम एक महाशक्ति बन जाने का दम भरते हैं, हमारे देश में सामाजिक बहिष्कार जैसी प्रथा का जारी रहना एक कलंक ही कहा जाएगा। ऐसी स्थिति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हमारी छवि को नुकसान पहुंचाती है। इसलिए सरकारी एजेंसियों को भी ऐसे मामलों में संवेदनशीलता दिखानी होगी। पुलिस विभाग की यह जवाबदेही बनती है कि वह कमजोर समूहों के उत्पीड़न की शिकायतों को गंभीरता से ले और फौरन कार्रवाई करे। जरूरत इस बात की भी है कि सरकारें पंचायतों की निगरानी करें, उनके फैसलों की समीक्षा करें।
रीतेन्द्र कंवर शेखावत

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