अनाथ हुए बच्चों के लिए सार्थक पहल

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कोरोना त्रासदी से मिली पीड़ाओं की फेहरिस्त में माता-पिता के दुनिया से चले जाने के बाद अकेले रह गए बच्चों का दर्द सबसे बढ़कर है। ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा कोविड-19 के कारण अनाथ हुए बच्चों की मदद के लिए कल्याणकारी योजनाओं की घोषणा एक जरूरी और सार्थक पहल है। कोरोना महामारी से जिन बच्चों ने अपने दोनों अभिभावक खो दिए हैं, उनके लिए केंद्र सरकार ने निशुल्क शिक्षा, मासिक भत्ता और स्वास्थ्य बीमा समेत आगे चलकर 10 लाख रुपये का फिक्स्ड डिपोजिट दिए जाने के प्रावधान किये हैं।

सबसे पहले तो महामारी में बेसहारा हुए बच्चों की पढ़ाई जारी रखने को लेकर सोचा गया है। इस योजना के तहत 10 साल से कम उम्र के बच्चे को नजदीकी केंद्रीय विद्यालय या निजी स्कूल में दाखिले के साथ ही निजी स्कूल की फीस , बच्चों की यूनिफॉर्म, किताबें और नोटबुक पर होने वाले खर्च का भुगतान भी ‘पीएम केयर्स फॉर चिल्ड्रन’ से किया जाएगा। साथ ही 11-18 साल के बच्चों को केंद्र सरकार के सैनिक स्कूल या नवोदय विद्यालय जैसे आवासीय स्कूल में प्रवेश दिया जाएगा। बच्चा दादा-दादी या किसी परिचित के साथ रहना चाहे तो उसे नजदीकी केंद्रीय विद्यालय या निजी स्कूल में भर्ती करवाया जाएगा।

साथ ही उच्च शिक्षा और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के लिए वर्तमान शिक्षा ऋण मानदंडों के मुताबिक एजुकेशन लोन लेने में बच्चों की सहायता की जाएगी। 18 साल की उम्र तक के बच्चों के लिए पीएम केयर्स की ओर से प्रीमियम की राशि का भुगतान कर 5 लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा कवर देने का भी ऐलान किया गया है।

मानवीय मोर्चे पर समझा जाय तो माता-पिता को खो देने वाले बच्चों का वर्तमान और भविष्य दोनों ही अनिश्चितता का शिकार हो जाते हैं। बालमन की इच्छाएं तो दूर जरूरतें भर पूरी होना भी मुश्किल होता है। इसीलिए कोरोना आपदा के दंश के बाद बिलकुल अकेले रह गए बच्चों की संभाल देखभाल की इस समय की दरकार भी है और सरकार का दायित्व भी । अच्छी बात है कि केंद्र सरकार के साथ ही राज्य सरकारें भी बेसहारा हुए बच्चों को लेकर गंभीरता से सोच रही हैं। इन भावी नागरिकों के जीवन की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने को लेकर अपनी जिम्मेदारी समझ रही हैं।

बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट ने भी चिंता व्यक्त करते हुए निर्देश दिया है कि राज्य सरकारें महामारी में अनाथ हुए बच्चों की जरूरतों की देखभाल के लिए आगे आयें। न्यायालय ने सभी राज्यों को देशव्यापी लॉकडाउन लगने के बाद अपने माता-पिता या फिर कमाने वाले परिजन को खो देने वाले बच्चों की पहचान करने का निर्देश दिया है। महामारी द्वारा पैदा की गई इस दुखद और अप्रत्याशित स्थिति में न्यायालय ने देश भर के जिला प्रशासनों को आदेश दिया है कि 2020 मार्च के बाद से अनाथ बच्चों की पहचान की जाए।

समझना मुश्किल नहीं कि जिन बच्चों के सिर से माता और पिता दोनों का साया उठ गया है, उनके जीवन में सामाजिक-पारिवारिक रूप से अकेलापन ही नहीं आर्थिक, मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक रूप से भी अनगिनत समस्याएं आ गई हैं। ऐसे में सरकार के प्रयासों को समाज का भी साथ मिले। ऐसे बच्चों की सुरक्षा और मानसिक मजबूती को बनाये रखने में उनका परिवेश अहम् भूमिका निभा सकता है।

वैसे तो कोरोना संक्रमण की आपदा ने दुनियाभर में हर उम्र के लोगों के मन-जीवन पर प्रभाव डाला है पर अध्ययन बताते हैं कि वयस्कों की तुलना में, इस महामारी से बच्चों पर दीर्घकालिक रूप से प्रतिकूल असर और बढ़ सकते हैं। जो कि बच्चों के आयु वर्ग, वर्तमान शैक्षिक स्थिति, आर्थिक स्थिति, पहले से मौजूद मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति, माता-पिता को हुए संक्रमण के कारण संक्रमित होने के भय और अपनों को खो देने की पीड़ा जैसे कई कारकों पर निर्भर है। यही वजह है कि बाल रोग विशेषज्ञों, मनोवैज्ञानिकों और शिक्षकों ने भी आने वाले समय में कई गंभीर खतरों की चेतावनी दी है।

हमारे देश में परिवार ही बच्चों के संबल और सुरक्षा का केंद्र रहा है। अफसोस कि यह विपदा रिश्तों नातों से दूर रहने के हालात तो बना ही रही है, कई परिवारों में करीबियों को भी छीन लिया है। खासकर कोरोना संक्रमण से जीवन गँवा देने वाले अभिभावकों के बच्चों का दु:ख असहनीय ही नहीं भविष्य भी चिंतनीय है। ऐसे में इन कल्याणकारी योजनाओं को बनाना ही नहीं इन्हें सही ढंग से लागू करने की प्रतिबद्धता भी दिखानी होगी। साथ ही समय-समय पर घोषित किये गए प्रावधानों की समीक्षा भी जरूरी है। ऐसा ना हो कि नाते-रिश्तेदार ही सरकारी सहायता को देखते हुए मासूम बच्चों के आर्थिक-भावनात्मक शोषण का मार्ग खोज लें।

स्वार्थी सोच और आपदा में अवसर खोजने की विसंगति हमारे समाज का दुर्भाग्यपूर्ण सच है। बीते डेढ़ साल में यह इलाज से लेकर, दवा की खरीद तक देखने में आया है। इसीलिए बच्चों तक सहायता पहुंचे, उनका भविष्य सुरक्षित हो, इसकी निगरानी भी जरूरी है। साथ ही करीबियों की बच्चों के शोषण की ऐसी प्रवृत्ति के प्रति समाज को भी सजग रहना होगा। महामारी से मिले इस असहनीय दु:ख को झेल रहे बच्चों को गंभीरता पूर्वक चिन्हित करने और उन तक मदद पहुंचाने, दोनों ही मोर्चों पर तत्परता और गंभीरता जरूरी है।

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