एक ही कामवाली के कई-कई रूप और अनेकानेक व्याख्याएं

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मेरी गली में भी कामवालियों को लेकर रोज ही चकल्लस चला करतीं। गली की मेमसाहबें कभी उनकी तारीफें करते न अघातीं तो कभी बुराइयां करते-करते। एक ही कामवाली के कई-कई रूप और अनेकानेक व्याख्याएं। बुराई-भलाई करने का भी एक अलग निंदारस चला करता जैसे कि शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव चल रहा हो। आलस्य व प्रमाद के चलते कई तो इतनी डौल-बेडौल हो गई थीं, जब वे चक्कलस बाजार लगाने आतीं तो ऐसा लगता कि जैसे कि वे किसी गुफा से निकलकर आ रही हों। सबके ही अपने-अपने भौतिक सुख, अहम और नाज नखरे थे।

मेरे भी एक बहुत घनिष्ठ मित्र हैं सुखलाल जी। सुखलाल जी का अपने नाम के अनुरूप स्वभाव भी था। वह दुख-सुख में हमेशा प्रसन्न रहा रहते। उन्हें समाज के कुछ चुनिंदा लोगों ने बिना वजह खूब परेशान भी किया और अब भी लोग करने से न चूकते जैसे कि बेचारे ईश्वर के यहां से परेशानियों का पट्टा ही लिखवाकर लाए हों। उन्हें कभी कोई पड़ोसी परेशान करता तो कभी दामाद जी, तो कभी बेटी जी, तो कभी पत्नी जी। वह बेचारे दुनिया भर के लोगों के साथ सामंजस्य बिठाने की पूरी कोशिश करते रहते। नदी की तरह बहकर लोगों को सुख ही पहुंचाने का प्रयास करते रहते।

परेशान करने के भी लोगों के पास अलग-अलग हथकंडे थे। कोई विषभरी वाणी और व्यवहार से वेद पाठ करता रहता तो कोई अपनी कार्यशैली से ही। उदाहरण स्वरूप कई पड़ोसी सुबह और शाम के वक्त पतंगबाजों का मजमा लगाकर सुखलाल जी के पढ़ने-लिखने में रंग में भंग डालते रहते तो कभी योग और छत पर सैर करने में। कुछ पड़ोसी रात के बारह बजे तक गली में ऐसा हंगामा काटते कि उनका सोना भी हराम हो जाता। कुछ पड़ोसी जानबूझकर उनके घर के सामने हार्न बजाते तो कभी बम-पटाखेबाजी कर जलती हांडिया ही तोड़ देते। इस तरह तमाम तरह के लोगों ने परेशान करने के आविष्कार कर रखे थे। इसी तरह सुखलाल जी के सगे संबंधी भी करते कि हमेशा अपने-अपने कर्तव्यों से विमुख होकर अधिकारों के लिए उनसे जंग करते रहते और करने के लिए हमेशा आतुर रहते। दूर रहकर भी न स्वयं चैन से रहते और न ही सुखलाल जी को रहने देते।

चलो छोड़ों भी यह सब। यह सब तो वे अपनी जन्म कुंडली में ही लिखवाकर लाए थे, सो सब झेलकर संतोष करते रहते। सुखलाल जी रिटायरमेंट के बाद भी अकेले ही बना-खा रहे थे। उनकी पत्नी जी बहुत दूर अपने ही मधुवन में अकेले ही मस्त रहकर सुख महसूस किया करतीं उन्हें सुखलाल जी के सुख-दुख से कोई मतलब न था। हमेशा ही अधिकारों के लिए जंग करके अपने भौतिक सुखों में मस्त रहा करतीं। उन्हें अपने सुख में सुख नजर आता और अपने दुख में दुख। पति जाए भाड़ में।

अरे ये भी छोड़िए। उनके तो बहुत सारे पशु-पक्षी भी अच्छे दोस्त थे। सुखलाल जी को रिटायर हुए लगभग छह वर्ष से अधिक हो गए थे। आजकल पूरे देश में कोरोना चल रहा था। वे पूरी तरह कोरोना से प्राण बचाने के लिए बहुत सारी सावधानियां बरतते रहते। कामवाली से भी मास्क लगाने की कहते। कदाचित लोगों को देखकर हैरान भी होते कि लोग जानबूझकर कोरोना से पंगा लेने को आतुर हैं, उसे कमजोर समझकर कोई बचाव या सावधानी नहीं बरत रहे हैं, इसलिए देश कोरोना मरीजों के मामले में अव्वल दर्जे पर पहुँचने का रिकार्ड बनाने जा रहा था।

सुखलाल जी के घर पर बर्तन और सफाई करने लिए तीन माह से एक नई कामवाली आ रही थी। नाम भी उसका बड़ा प्यारा-सा लेकिन सुखलाल जी उसका नाम जल्दी बताना नहीं चाहते थे, क्योंकि उसके गुण ही इतने सारे थे कि नाम भी उसके आगे बिल्कुल फीका पड़ जाए।

कामवालियां अक्सर सीधी सादी-सी ही होती हैं, कुछ अपवाद और विवादों को छोड़कर। बेचारी मजबूरी में ही काम करती हैं। किसी का पति शराबी निकल आता तो किसी का आदमी मर जाता लेकिन एकाध ऐसी भी थीं कि घर में अधिक सुख सुविधाएं जुटाने के लिए, महंगा मोबाइल प्रयोग करने के लिए या किसी को अपने जाल में फंसाने के लिए ही दूसरों घरों में घरेलू काम किया करतीं, अर्थात झाडू, पौंछा और खाना बनाने आदि का।

सुखलाल जी की नई कामवाली भी तीसरे प्रकार की कैटेगरी में ही लगी। उसे उनकी एक रिश्तेदार की कामवाली ने बड़े अहसान से लगवाया था जैसे कि वह माह में पगार न ले। उसका आदमी भी दस-पंद्रह हजार रुपये कमाता। उसके तीन बच्चे थे, लेकिन उसके स्वप्न बहुत ही बड़े-बड़े थे जिन्हें पूरा करने के चक्रव्यूह में वह काम पर ही जादू की छड़ी चलाना चाहती कि फूंक मारूं कि काम खत्म हो जाए अर्थात वह इतनी जल्दी काम करती कि पलक झपकी नहीं कि झाडू लग गई। एक-डेढ़ घण्टे का काम वह तिहाई समय में ही पूरा करने की जुगत में अच्छे से कभी काम न करती, बस औपचारिकता भर निभाना चाहती। कुछ टोका टाकी कर दी तो नाक-भौं ऐसी सिकोड़ती कि काम छोड़ने की धमकी तक दे डालती। वह मधुमक्खी की तरह झटपट उड़ती फिरती। जिस कामवाली ने उसे काम पर लगवाया था उसी पर बुराइयों की कीचड़ उछाल कर स्वयं पाक साफ बनने का नाटक किया करती व झूठे ही आनन्द रस लेने में मग्न रहती।

स्वप्न बड़े-बड़े। एंड्रायड स्मार्टफोन रखनेवाली, व्हाट्सएप और फेसबुक का प्रयोग करने वाली। जिस दिन लगी, उस दिन से ही बड़ी-बड़ी बातें जबकि सुखलाल जी तभी बोलते जब कोई काम बिगड़ा हुआ बताना हो। दो-तीन बाद ही एंड्रायड मोबाइल के खराब होने की कहानी बताकर गढ़ी गई, फोन की डिमांड शुरू हो गई। सुखलाल जी बहुत भोले थे, कदाचित दे भी देते क्योंकि उनके पास एक अतिरिक्त मोबाइल था लेकिन ईश्वर ने उनसे मना करा दिया। यदि दे देते तो संभवत: बाद में कुछ अन्य डिमांड शुरू हो जातीं या मांगने पर आरोप-प्रत्यारोप भी मड़ दिए जाते। कुछ भी हो सकता था क्योंकि बेचारे सुखलाल जी को अपनी इज्जत बहुत प्यारी लगती।

पहले तो उसने जाति का रौब दिया कि मैं गुप्ता हूँ, मैं किसी को बताती नहीं हूँ यानी मैं उच्च जाति की हूँ। उसने अपने मायके के बातों-बातों में ऐसे पुल बांधें कि बस पूछिए मत-कोठी, अच्छा बिजनिस और कारें-गाड़ियां और भी बहुत कुछ। भाई पत्रकार और वकील। कुछ दिन बाद ही काम की गिनतियां भी बदलती रहीं, कभी छह, तो कभी चार, रोज नए-नए झूठ गढ़ने में अति प्रवीण। जो काम ठहरा था, उसे भी ठीक से करने में उसे परेशानी होती। एक काम के एवज में कोई दूसरा काम कभी नहीं। टका-सा जवाब। कोई हिचक नहीं, कोई लिहाज नहीं।

कभी हल्की-सी आवाज देकर आती तो कभी बिल्कुल चुपचाप। कभी राम-राम भी कर लेती। सब कुछ रहस्यमय। विगत तीन महीने में काम छोड़ने की दसियों बार धमकियां सुखलाल जी को दे डाली थीं। उसके द्वारा काम ठीक से न करने और धमकियों के कारण सुखलाल जी को कई बार अनावश्यक खीज और तनाव भी इन विगत तीन माहों में कुछ ज्यादा ही हुए लेकिन सहते इसलिए रहे कि विकल्प कोई और न दिखता था। कुछ उम्र का तकाजा तो कुछ पढ़ने- लिखने की प्रवृत्ति। बर्तन और घर की सफाई के अतिरिक्त भी नित्य नाश्ता व खाना आदि बनाने, पंछियों की सेवा, कुछ समाज सेवा आदि के कारण व्यस्तता बनी ही रहती।

कामवाली के छुट्टी करने पर तो सब कुछ करना ही पड़ता। सुखलाल जी बड़े दयालु व क्षमाशील भी थे, वे कामवाली के दुर्व्यवहार को जल्दी भूलकर यदा-कदा और भी छोटी- मोटी मदद करते रहते, उनके इलाज भी करते रहते। उनको जीवन जीने के मंत्र भी बताते रहते। पुस्तकें देते रहते। इससे पहले कामवाली तो साढ़े पाँच साल निरन्तर काम करती रही। उसने भी सुखलाल जी को बीच-बीच में खूब परेशान किया लेकिन उसके भी नाज नखरे सहकर वे काम कराते रहे। जब उसकी खामियों के कारण हटाया तो बहुत नाराज हो गई, धमकी भिजवाती रही कि किसी और को नहीं लगने दूँगी।

घर आकर झगड़ा करूँगी जैसे कि उसे सरकारी नौकरी से हटा दिया गया हो। उसका मुख्य कारण था कि अकेले रहने वाले व्यक्ति को कामवाली जल्दी मिलती नहीं, ऊंच-नीच के डर से लेकिन सुखलाल जी तो ईश्वर भक्त थे। ईश्वर ही उन्हें योग व ध्यान क्रियाएं आदि करवाकर बचाता रहता। पहली वाली कामवाली की तो वे कुछ ज्यादा ही मदद करते रहे, यह सोचकर कि विधवा है, दो बच्चों की विद्यालय की फीस से लेकर अन्य मदद। वे उसे भी इसलिए निभाते रहे कि अकेले हैं, जो चल रहा है चलने दो। सब कुछ ईश्वर ही तो चला रहा है।

अब तो कामवाली ने अपने समय में भी बदलाव कर दिया था। सब कुछ अपने मन से। मन की रानी। वह आठ बजे सुबह एक समय ही आती थी। 6 सितंबर का दिन था। सुखलाल जी दैनिक क्रियाओं, अर्थात योग, भ्रमण, पंछियों का दाना पानी, पौधों की सेवा आदि से निवृत्त होकर नाश्ता कर, अखबार पढ़ रहे थे। समय रहा होगा पौने नौ का। कामवाली घोड़े पर सवार होकर नित्य की भाँति आज भी आई, और आते ही उसने ऊपर की मंजिल पर झाड़ू लगाना शुरू कर दी। कल उसने कहीं भी पौंछा नहीं लगाया था। कई बार तय काम भी छोड़ जाती। कुछ बहाना बनाकर कि मुझे कुछ काम है, मुझे जल्दी जाना है कहकर जल्दी चली गई थी, अर्थात जल्दी में भी बहुत जल्दी।

आधा मिनट ही हुआ होगा कि आधा घर की झाड़ू लग गई थी। सुखलाल जी बरामदे में बैठे अखबार पढ़ ही रहे थे। वे इसलिए उठे कि कुर्सी के नीचे से भी झाड़ू लग जाएगी। उन्होंने कहा, सुनीता आज झीने में भी पौंछा लगा लेना। उसने बिना देर किए टका-सा जवाब दिया, मैं एक जगह ही पौंछा लगाऊँगी। पहले भी कह चुकी हूँ, चाहे झीने में लगवा लो या कमरों में। सुखलाल जी ने कहा, कई दिनों से तुम कुछ न कुछ तय काम भी छोड़ जाती हो तो इसलिए आज दोनों जगह पौंछा लगा देना, गंदा हो रहा है। जैसे ही उसने यह सुना कि वह आग बबूला हो गई क्योंकि उसके मन के विपरीत बात कह दी थी। गुस्से में बोली, काम कराना है तो कराओ नहीं तो मत कराओ।

सुखलाल जी अवाक, करें तो क्या करें? वे मन मसोस कर रह गए।
उन्होंने कहा, आप तो हमेशा गुस्से में ही बात करती हो। तय काम भी नहीं करना चाहतीं।
इतना सुनना था कि कामवाली ने जोर से झाड़ू पटकर कहा, मेरा हिसाब कर दो।
उन्होंने कहा, हिसाब भी हो जाएगा।

इतना सुनना था कि वह गालियां बकती और कोसती हुई झीने से उतरकर बाहर चली गई। तेरे आगे आएगी, मत दे पैसे। इस महीने में उसे कुल जमा पाँच दिन ही हुए थे। इतना भी उन्होंने इसलिए कह दिया था कि शायद इसका मन बदल जाए और दुबारा काम करने लग जाए। वह बाद में बहुतेरा आवाज भी देते रहे कि अपना हिसाब करके रुपये ले जाओ लेकिन उसे तो बिना मतलब बदनामी करनी थी।

कुछ अन्य महिलाओं से वह बात करके सुखलाल जी को कोसती रही। उन्होंने दरवाजे पर खड़े होकर इशारा किया क्योंकि सुखलाल जी की कमजोरी यही थी कि वह किसी भी प्रकार की बदनामी से बहुत डरते थे। उनका संकेत उनकी गली की सफाई वाली ने देख लिया, उसने सुखलाल जी की कामवाली से कहा कि तुम्हें वह बुला रहे हैं। वह तुरंत ही घोड़े पर सवार होकर आई। सुखलाल जी ने पूछा, कितने दिन हो गए इस महीने में। उसने कहा छह। तब सुखलाल जी ने कहा कि आज तो काम हुआ ही नहीं। तब फिर वह ताकने लगी और उन्होंने उसे पाँच दिन के रुपये देकर नमस्कार कर लिया।

सुखलाल जी को आज बहुत कटु अनुभव हुआ और मनन करते रहे कि सच में जमाना अब बहुत बदल गया है। कल ही इसके और इसके बच्चों के लिए जलेबियां दी थीं। इस तरह वे कुछ न कुछ देकर पगार के अलावा मदद करते ही रहते थे। यह सब उनके स्वभाव में सम्मिलित था वरना आजकल लोग महीने की पगार के अलावा कौन कुछ देते हैं, वो भी इस तरह के स्वभाववाली कामवाली को।

आज उन्होंने मन ही मन संकल्प लिया कि फिलहाल कोरोना काल में अब वे कोई कामवाली नहीं रखेंगे। तनाव और अपमान सहने से अच्छा है कि वे सारे ही काम एक कर्मयोगी की भांति स्वयं करते रहेंगे। कदाचित ईश्वर ने यह भी अच्छा ही किया होगा। गीता भी यही कहती है कि जो भी होता है वह अच्छा ही होता है। आज इस संकल्प के साथ वह एक नई राह की ओर बढ़ गए थे।

-राकेश चक्र

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