महर्षि का शिष्य

Maharishi disciples
महर्षि बोधायन शिष्यों के अनुरोध पर उस दिन आश्राम से दूर नदी तट पर वृक्षों की घनी छांव में गोठ पर गए थे। मछलियों की तरह गुरू शिष्य घंटों जल विहार करते रहे। फिर झड़बेरी के साथ पकाए गए सिवार का साग और कोदो भात भरपेट खाकर अपने वस्त्र फैलाकर लेट गए। शीघ्र ही सभी लोग गहरी नींद में लीन हो गए। कई घंटों के बाद जब महर्षि की निद्रा भंग हुई तब सूर्यदेव का रथ पश्चिम दिशा में काफी नीचे उतर चुका था। वे उठे और समीप ही सोए अपने प्रिय शिष्य गार्ग्य को जगाने गए।
उन्होनें देखा-गार्ग्य जागा हुआ है, पर उसके पैरों से लिपटकर एक महासर्प सोया पड़ा है। गार्ग्य ने धीरे से कहा-,‘गुरूजी, जब सर्प की नींद पूरी हो जाएगी, वह स्वयं चला जाएगा, उसकी निंद्रा भंग न करें।’और हुआ भी यही। घंटे भर बाद सर्प जागा, गार्ग्य के पैरों से उतरकर बिल में चला गया। गार्ग्य को अंक में भरकर महर्षि आशीर्वाद देने लगे, वत्स, तुम्हारी यह शील-संपदा अक्षय रहे। इस पर चकित हो दूसरा शिष्य मौत्रायण बोला, ‘भगवान्, गार्ग्य ने तो साहस का परिचय दिया है, शील नहीं।’ महर्षि बोले,‘वत्स, जल का ही घनीभूत रूप तो हिम है। इसी भाँति शील का ही वह घनीभूत रूप, जो विकट विषमताओं और विपरीत परिस्थितियों के बीच भी अपने स्वरूप को बनाए रखता है, साहस है। महिमा शील की ही है।’

न मेरा-न तेरा

संत कहते हैं कि भजन और ध्यान से पाप मिट सकते हैं, परन्तु ऋण नहीं मिट सकता। पाप उतारने के बहुत उपाय हैं किन्तु कर्ज बिना चुकाए नहीं चुकेगा। पाप करने वाला नरक मेें जा सकता है, किन्तु कर्ज, बिना चुकाये, नरक में भी पीछा नहीं छोड़ेगा। जो पुरूष परमात्मा से मिलने की तीव्र इच्छा रखता है, उसे महात्मा समझना चाहिए। परमात्मा अंशी है, वे न तो देवता है, न मनुष्य है, न राक्षस है, न पशु-पक्षी है। वे सबका सब कुछ हैं। वे जगत के ईश ‘जगदीश्वर’है। जगदीश स्वयं जगत बनकर खड़े हैं। सतयुग में न मेरा है न तेरा है की भावना लोगो में रहती थी। अर्थात् न मेरा न तेरा है ये दूनियां रैन बसेरा है। कलयुग में लोगों का सोचना यह है कि मेरा है, जो वह मेरा है ही लेकिन तेरा भी मेरा है। इस बात के कारण ही झगड़े होता है। इसी का नाम माया है। माया ही झगड़े करवाती है।

अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें Facebook और Twitter पर फॉलो करें।