महामारी: समेकित कार्यवाही की आवश्यकता

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सरकार ने 3 मई 2020 तक संपूर्ण देश में लॉकडाउन के दूसरे चरण की घोषणा कर दी है। इस लॉकडाउन के दौरान प्रतिबंधों को कडाई से लागू करने की संभावना है। क्या महामारी और लॉकडाउन के बाद जीवन पहले जैसा बना रहेगा? कोरोना का मुकाबला करने के अनेक साइड इफेक्ट देखने को मिल रहे हैं। गृह मंत्रालय ने पश्चिम बंगाल सरकार से लॉकडाउन के उपायों में ढील देने के बारे में रिपोर्ट मांगी है। राज्य में कोरोना से जुडे प्रतिबंधों में कुछ ढील दिखाई दे रही है जिसके कारण राज्य में संक्रमण बढ सकता है।
आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 के अंतर्गत जारी आदेशों के उल्लंघन पर दंड की व्यवस्था है। इस महामारी के नियंत्रण से सामाजिक और प्रशासनिक मुददे भी उठ रहे हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने इस बात पर बल दिया है कि राज्य में मानवीय चेहरे के साथ लॉकडाउन जारी रहेगा किंतु कोरोना जैसी महामारी में नरम मानवीय दृष्टिकोण से काम नहीं चलेगा और प्रतिबंधों को कड़ाई से लागू करना पडेगा। लॉकडाउन से हुए नुकसान और असुविधाओं की भरपाई की जा सकती है किंतु महामारी के प्रसार के कारण हुए नुकसान की भरपाई नहीं की जा सकती है।
पंजाब के पटियाला में कर्फ्यू पास की जांच के दौरान कुछ लोगों द्वारा एक पुलिस उपनिरीक्षक का हाथ काट देना बताता है कि इस महामारी के नियंत्रण में कितने खतरे हैं। इसके अलावा ड्यूटी कर रहे लोगों को भी महामारी के संक्रमण का खतरा है। विश्व भर में इस महामारी पर नियंत्रण के लिए लॉकडाउन को अपरिहार्य बताया जा रहा है और आज इसी के अनुरूप व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन चल रहा है। इस महामारी के विरुद्ध यह एक औजार की तरह है किंतु इसकी शर्तें कठिन हैं और इससे संघर्ष पैदा हो रहा है।
सभी राज्यों में लॉकडाउन के नियमों का उल्लंघन हो रहा है जिसके चलते लाखों रूपए जुर्माने में वसूले जा चुके हैं और अनेक वाहनों को जब्त किया जा चुका है। यह एक ओर सरकार द्वारा लॉकडाउन को कड़ाई से लागू करने का प्रमाण है तो दूसरी ओर हमारी जनता द्वारा अनुशासन का पालन न करने का प्रमाण है। इसलिए सरकार और विधि प्रवर्तन एजेंसियों की जिम्मेदारी बढ गयी है कि वे लॉकडाउन का उल्लंघन करने वालों के प्रति सजग रहें।
इस महामारी ने जहां भी प्रहार किया वहां लोगों के स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव देखने को मिल रहा है। साथ ही गैर-चिकित्सा और गैर-स्वास्थ्य संबंधी मामलों में इसका साइड इफेक्ट बढ़ रहा है और इसके चलते इस महामारी का मुकाबला करने में लोगों की सामाजिक जिम्मेदारी बढ़ जाती है। आज मीडिया और लोगों के बीच इस महामारी के अलावा किसी और खबर की चर्चा नहीं है। इस महामारी ने सारी दुनिया के लोगों को एकजुट कर दिया है। संपूर्ण विश्व में इस महामारी के विरुद्ध लोग टीम वर्क में काम कर रहे हैं। साथ ही राष्ट्रीय स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता को भी बढावा दिया जा रहा है।
संयुक्त राष्ट्र, विश्व खाद्य संगठन और विश्व व्यापार संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि समय पर इस महामारी पर नियंत्रण नहीं पाया गया तो संपूर्ण विश्व में खाद्यान्नों की कमी हो जाएगी। भारत में भी राज्य सरकारें बिना किसी बाधा के कृषि कार्यकलापों को चलाने के लिए कदम उठा रही है। लगभग एक माह पूर्व जब चीन, ईरान और अमरीका में यह महामारी बढ़ रही थी और हमारे द्वार तक पहुंच गयी थी तो विश्व स्वास्थ्य संगठन प्रमुख ने चेतावनी दी थी कि हम एक अनजान राह पर हैं। हमने ऐसा कोई स्वास्थ्य संबंधी पैथोजेन नहीं देखा था जो लोगों में संक्रमण फैलाए।
सभी महामारियों के स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों के साथ साथ सामाजिक प्रभाव भी पडते हैं और इससे अनेक सामाजिक बदलाव भी आते हैं। ये सामाजिक बदलाव मुख्यतया सामाजिक संवाद को लेकर होते हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह महामारी पर नियंत्रण करने में प्रत्यक्ष-परोक्ष योगदान करे और उसे आदेशों और विनियमों का विरोध करने का कोई अधिकार नहीं है। महामारी नियंत्रण आदेशों का उल्लंघन करने के लिए धर्म या परंपराएं बहाने नहीं हो सकती हैं। जानबूझकर की गयी ऐसी कार्यवाही से महामारी बढ़ सकती है और यह राष्ट्र तथा मानवता के विरुद्ध अपराध है।
ऐसे देश में जहां पर सार्वजनिक स्थान पर थूकना लोग अपना अधिकार समझते हैं कोरोना महामारी ने लोगों को स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी नियमों को सीखने का अवसर दिया है। तमिलनाडू में एक गांव में मध्याह्न भोजन लेने से पहले एक स्कूल अध्यापक द्वारा छात्रों को हाथ धोने के लिए कहने पर उस अध्यापक को जातिवादी कहा गया था किंतु आज हम निरंतर सलाह दे रहे हैं कि किस तरह से हम अपने हाथ धोएं।
इस स्वास्थ्य आपातकाल में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों का मार्ग निर्देशन आवश्यक है। डॉक्टर, अर्ध चिकित्सकीय कर्मचारियों, स्वास्थ्य और स्वच्छता कामगारों, अर्थशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों, सामाजिक कार्यकतार्ओं और मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण बन गयी है। राजनेताओं और नौकरशाहों को विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों की सलाह लेनी होगी और उन्हें शासन में समान भागीदार बनाना होगा। इस महामारी का मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी है जो एक समस्या के रूप में पहले ही दिखाई देने लगा है।
इस महामारी के प्रभाव के बारे में समाज के दृष्टिकोण का मूल्यांकन के लिए अध्ययन शुरू किए जा चुके हैं। कुछ राज्यों में शराब की बिक्री पर प्रतिबंध का शराब पीने वालों पर मानसिक प्रभाव पड़ रहा है। केरल सरकार ने कुछ समय के लिए शराब की बिक्री की अनुमति देने का प्रस्ताव किया था किंतु न्यायालय ने इसे स्वीकार नहीं किया है।
अपनी मजदूरी खोने के भय में दिहाडी मजदूरों की मानसिक स्थिति छंटनी, के डर से कर्मचारियों की मानसिक स्थिति, छोटे दुकानदारों द्वारा अपना व्यवसाय न कर पाना, परिवार के सदस्यों का अलग हो जाना आदि के कारण लोगों में भय और अनिश्चितता की भावना पैदा हो गयी है और इसका एकमात्र उपाय यह है कि प्रतिबंधों को और कडाई से लागू किया जाए ताकि यह महामारी शीघा्रतिशीघ्र समाप्त हो। भारत सहित अनेक देशों में लॉकडाउन के दौरान घरेलू हिंसा और तलाक के मामले बढ़े हैं। कोरोना महामारी के विरुद्ध विश्व समुदाय के अभियान के ऐसे अनेक साइड इफेक्ट हैं और विश्व समुदाय को इस महामारी पर एकजुट होकर नियंत्रण करना होगा।
-डॉ. एस. सरस्वती
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