सत्ता के जादूगर: बेंजामीन नेतन्याहू

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Magicians of Power Benjamin Netanyahu
2 मार्च को हुए चुनाव के परिणामों के बाद हाल-फिलहाल इज्ररायल में सत्ता के जो समीकरण बन रहे थे, उन्हें देखते हुए इस बात के कयास लगाए जाने लगे थे कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए इज्ररायल की सत्ता से रूखसत होने की बेला आ गयी है। लेकिन अब नेतन्याहू के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी पूर्व सेना प्रमुख जनरल बेन्नी गैंट्ज की ब्ल्यू एंड व्हाइट पार्टी ने नेतन्याहू की पार्टी के साथ गठबंधन की सरकार बनाने का फैसला कर उन्हें राजनीतिक संजीवनी प्रदान कर दी है।
पिछले एक दशक से इज्ररायल की सत्ता पर काबिज प्रधानमंत्री बेंजामीन नेतन्याहू की सत्ता में वापसी किसी ईश्वरीय चमत्कार से कम नहीं हैं। नेतन्याहू इस समय अपने राजनीतिक जीवन के सबसे कठीन दौर से गुजर रहे थे। एक तरफ वह भ्रष्टाचार के आपराधिक आरोपों से जूझ रहे हैं, तो दूसरी ओर देश की सत्ता उनके हाथ से निकलती दिख रही थी। दो मार्च को हुए चुनाव के परिणामों के बाद हाल-फिलहाल इज्ररायल में सत्ता के जो समीकरण बन रहे थे, उन्हें देखते हुए इस बात के कयास लगाए जाने लगे थे कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए इज्ररायल की सत्ता से रूखसत होने की बेला आ गयी है। लेकिन अब नेतन्याहू के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी पूर्व सेना प्रमुख जनरल बेन्नी गैंट्ज की ब्ल्यू एंड व्हाइट पार्टी ने नेतन्याहू की पार्टी के साथ गठबंधन की सरकार बनाने का फैसला कर उन्हें राजनीतिक संजीवनी प्रदान कर दी है।120 सदस्यों वाली इजरायली संसद (नेसेट) में किसी भी दल को सरकार बनाने के लिए 61 सीटे चाहिए। हालांकि नेतन्याहू की दक्षिणपंथी लिकुड पार्टी तीसरी दफा भी 36 सीटे प्राप्त करके सबसे बड़ी पार्टी के रूप में आई है, लेकिन उनका गठबंधन बहुमत के जरूरी आंकड़े तक नहीं पहुंच पाया।
नेतन्हायू की मुश्किलें इस लिए बढ़ती हुई दिखाई दे रही थी क्योंकि परस्पर विरोधी समझे जाने वाली अरब पार्टियों के गठबंधन और पूर्व रक्षामंत्री एविडर लीबरमैन की इज्ररायल बीटीनू पार्टी बेन्नी गैंट्ज के समर्थन को तैयार हो गई थी जिसके बाद गठबंधन के पास संसद में सरकार बनाने के लिए जरूरी 61 सदस्यों का बहुमत का आंकड़ा पुरा हो गया था जबकि नेतन्याहू के पास 58 सदस्यों का समर्थन था। राष्ट्रपति रूवन रिवलिन ने भी गेंट्ज को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर लिया था। लेकिन इस बीच देश में कोरोना वायरस का प्रभाव बढ गया और सरकार के गठन को लेकर विपक्षी दलों में भी मतभेद उभर आए। इसके बाद नेतन्याहू ने अपने सेना प्रमुख रहे गेंट्ज की ओर दोस्ती का हाथ बढाया। नेतन्याहू की पहल पर गेंट्स ने सकारात्मक रूख अपनया जिसका परिणाम यह हुआ कि स्पीकर के चुनाव में गेंट्स को नेतन्याहू की लिकुड पार्टी का समर्थन मिल गया और वह निर्विरोध स्पीकर चुन लिए गए। इसके बाद लंबी वातार्ओं का सिलसिला शुरू हुआ और इसरायल के प्रधानमंत्री के रूप में नेतन्याहू के नाम पर दोनों दलों के बीच सहमति हो गई।
अप्रेल 2019 में हुए चुनाव में लिकुड पार्टी को 36 तथा ब्लेक एंड व्हाइट को 35 सीटे प्राप्त हुई थी। दूसरी बार हुए चुनाव में लिकुड व ब्लेक एंड व्हाइट दोनों को ही 32-32 सीटें मिली थी। पूर्व रक्षामंत्री एविग्डोर लिबरमैन की इज्ररायल ब्येन्टु पार्टी को 9 स्थान प्राप्त हुए । जबकि अरब पार्टियों के गठबंधन ने 13 स्थानों पर जीत दर्ज की थी। यद्वपि राष्ट्रपति रूवन रिवलिन उस वक्त भी राजनीतिक गतिरोध को दूर करने के प्रयास करते रहे। राष्ट्रपति के आग्रह पर नेतन्याहू और बेन्नी गैंट्स द्वारा यूनिटी गर्वेंमेंट के विकल्प पर सहमत होने के भी समाचार उस वक्त आए थे ।
ताजा चुनाव परिणामों में इजरायली जनता ने किसी भी पार्टी को सरकार बनाने के लिए जरूरी 61 सीटें नहीं दी है, ऐसे में अब सवाल यह उठ रहा था कि पिछले एक दशक से सत्ता में बने रहने वाले प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू सत्ता से रूखसत होंगे या किसी ईश्वरीय चमत्कार के चलते वह पांचवी दफा इज्ररायल के प्रधानमंत्री बन सकेंगे। हालांकी नेतन्याहू के गठबंधन को संसद में 58 सीटें हासिल हुई है। इज्ररायल का संसदीय इतिहास इस बात का गवाह है कि वहां के मतदाताओं ने पिछले सात दशकों में किसी भी राजनीतिक दल को पूर्ण बहुमत नहीं दिया है, लेकिन इसके बावजूद सत्ता के जादूगर कहे जाने वाले नेतन्याहू किसी न किसी तरह सत्ता की चैखट तक पहुंचने में कामयाब होते रहे हैं। ताजा चुनाव परिणामों में उन्हें पूर्ण बहुमत तो नहीं मिला है फिर भी साल 2009 में प्रधानमंत्री बनने के बाद यह उनका दूसरा सबसे प्रभावशाली प्रदर्शन है। इससे पहले साल 2009 में उन्हें 27, 2013 में 18 तथा 2015 के चुनाव में 30 सीटें मिली, जबकि अप्रेल 2019 में उन्हें संसद में 35 सीटें मिली थी।
यद्वपि नेतन्याहू के नेतृत्व में इज्ररायल आर्थिक व सामरिक मोर्चें पर खुब फला फुला हैं। अमेरिका सहित दुनिया के सभी बडे़ देशों के नेताओं के साथ नेतन्याहू के अच्छे संबंध है। इसके बावजूद इज्ररायल की जनता ने उनकी पार्टी लिकुड को केवल 36 सीटे दी है। नेतन्याहू के पूरे चुनाव अभियान का बारिकी से विश्लेषण करे तो एक बात तो साफ हो जाती है कि नेतन्याहू को अपने अरब विरोधी रूख की कीमत इस चुनाव में चुकानी पड़ी। नेतन्याहू चाहते थे कि लोकतांत्रिक देश के रूप में इज्ररायल के अस्तित्व को नकारने वाली यहूदी विरोधी अरब पार्टियों की इज्ररायल में कोई जगह न हो। अपने दक्षिणपंथी आधार को मजबूत करने के लिए जिस तरह से उन्होंने अरब नेताओं को नजर अंदाज करना शुरू किया उसके परिणामस्वरूप अरब पार्टियां आपसी मतभेद भुलाकर एक हो गयी। इन पार्टियों ने मिलकर चुनाव लड़ा और बड़ी कामयाबी हासिल की। इज्ररायल में अरबों की संख्या 18 लाख के करीब है जो वहां की आबादी का कुल 20 प्रतिशत है। इसका परिणाम यह हुआ कि वामपंथी और अरब मतदाता बड़ी संख्या में नेतन्याहू को सत्ता से बाहर करने की कोशिशों में जुट गये। चुनाव परिणाम के बाद अब जो समीकरण बने उसे देखते हुए लगता है, उनकी कोशिशें सफल भी हुई। इसके अलावा उनकी सरकार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप और कुशासन से भी जनता नाखुश थी। इन सबके चलते नेतन्याहू मुश्किल में आ गए।
पांचवी बार प्रधानमंत्री पद पर काबिज होने का सपना देख रहे नेतन्याहू अगर सत्ता से बाहर हो जाते तो इसका असर भारत- इज्ररायल संबंधों पर भी पड़ सकता था। इज्ररायल भारत का महत्वपूर्ण रक्षा स्पलायर है। भारत ने इज्ररायल के साथ कई बडे़ रक्षा सौदे किए हंै। भारत के सामने जब भी कोई सामरिक संकट उपस्थित हुआ है तो उस वक्त इज्ररायल ने आगे बढकर हमारी मदद की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नेतन्याहू के बीच काफी अच्छे संबंध है। यह संबंध तब और अधिक मजबूत हुए जब जुलाई 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इज्ररायल गए थे। सिंतबर 2019 में नेतन्याहू भी भारत आने वाले थे लेकिन चुनाव के चलते उन्हें अपनी यात्रा रद्व करनी पड़ी।
इज्ररायल के सत्तर सालों के इतिहास में यह पहला मौका है, जबकि एक साल के भीतर तीन बार चुनाव होने के बावजूद सरकार के सवाल पर संशय बना हुआ था। अब नेतन्याहू और गैंट्स गठबंधन की सरकार बनाने को राजी हुए है, ऐसे में उम्मीद इस बात की कि जा रही है कि देश राजनीतिक स्थिरता से बाहर निकल पाएगा।

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